Wednesday, 16 April 2014

सौ वर्षों में भी मुक्ति नही पा सकते

  हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है- मातृ देवो भव, पितृ देवो भव। माता स्थान तो पिता से भी बढकर माना गया है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगिर्यसी। जन्म देने वाली और जन्म भूमि दोनों ही स्वर्ग से श्रेष्ठ हैं। भगवान श्री गणेश, जिन्होंने यह सिद्ध क्र दिखाया कि माता-पिता के चरणों में ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। प्रत्यक्ष में माता और पिता के द्वारा ही सन्तान के शरीर का निर्माण होता है। अत: शरीर देने वाले सबसे देवता माता-पिता ही हैं। माता सन्तान का पालन-पोषण करने के लिए नौ-दस महीने तक कष्ट सहन करती है और अपने विचारों से संस्कार सम्पन्न सन्तान को जन्म देती है, इसलिए माता-पिता संसार में सर्वाधिक पूजनीय हैं। माता-पिता की इस सेवा के लिए ही हिन्दू धर्म में पितृ-ऋण की व्यवस्था है। इस ऋण को चुकाए बिना अर्थात माता की अनुमति के बैगर पुत्र को गृहस्थ जीवन से विमुख होने की आज्ञा नहीं है। सन्यास गृहण करने के लिए भी यह आवश्यक है। 
       ज्ञान पाने की दृष्टि से हालाँकि गुरु का बड़ा महत्व है, लेकिन माता को सन्तान की पहली गुरु कहकर सम्मानित किया गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था दी गयी है कि- उपाध्यायान्द्शाचार्य आचार्यानाम शतं पिता। श्ह्स्त्र्म तु पितृन्माता गौरवेनणातिरिच्य्ते।। अर्थात उपध्यायों में दस गुना श्रेष्ठ पिता और हजार गुना  श्रेष्ठ माता गौरव से युक्त होती है। इस  श्रेष्ठता का कारण मनु लिखते हैं- यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम। न तस्य निष्कृति: शक्या कर्तु वष्शतैरपि।। अर्थात प्राणियों की उत्पत्ति में माता-पिता को जो क्लेश सहन करना पड़ता है, उस क्लेश से प्राणी सौ वर्षों में भी मुक्ति नही पा सकते। इसलिए मनु ने माता-पिता और गुरु इन तीनों को सदा सेवा से प्रसन्न रखने के निर्देश दिए हैं। प्राणियों की भक्ति से इस लोक का, माता-पिता भक्ति से मध्य और गुरु भक्ति से ब्रह्म लोक का सुख प्राप्त होता है। जिन पर इन तीनों की कृपा नहीं होती, उनके सभी कर्म निष्फल होते हैं। 
         माता-पिता अपनी सन्तान  की ख़ुशी के लिए जीवन पर्यन्त प्रयास करते रहते हैं। जो इनकी सेवा नहीं करता या दोष ढूंढ़ता है, उसका जीवन व्यर्थ है। वह भटकता रहता है उसे कभी सफलता नहीं मिलती। अत: सन्तान को सदैव अपने माता-पिता की सेवा को सर्वोपरि स्थान देना चाहिए।
       

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