Tuesday, 23 September 2014

ऐसा अनूठा प्रयोग पृथ्वी पर फिर कभी दुबारा नहीं हुआ

तो हम दूसरे चरण में उसे गृहस्थ बनाते थे। ऐसा अनूठा प्रयोग पृथ्वी पर फिर कभी दुबारा नहीं हुआ। और जब तक यह प्रयोग दुबारा नहीं होता, पृथ्वी अत्यंत दुख और पीड़ा से भरी रहेगी।

बाहर जाने के पहले भीतर पैर मजबूती से जम जाने चाहिए। धन पर हाथ पड़े इसके पहले स्वयं की संपदा का अनुभव हो जाना चाहिए। फिर धन साधन होगा। फिर हम उसका उपयोग कर लेंगे, लेकिन धन फिर हमारा मालिक न हो पाएगा।

तो ब्रह्मचर्य के बाद हम भेजते थे उसे गृहस्थ में, कि जाए घर में, विवाह करे, संतति हो उसकी। संसार को देखे, संसार को जीए। लेकिन यह व्यक्ति और ढंग से जीता था। इसके जीने का गुण ही अलग था। क्योंकि यह व्यक्ति साक्षी हो पाता था। हम साक्षी नहीं हो पाते, हम भोक्ता हो जाते हैं।

भोक्ता होना पीड़ा है। साक्षी होना परम आनंद है। और साक्षी को अगर हम नर्क में भी डाल दें, तो भी दुख में नहीं डाल सकते। और भोक्ता को हम स्वर्ग में भी रख दें, तो भी हम दुख के बाहर नहीं ले जा सकते। भोगी मन दुखी होगा ही। क्योंकि भोगी मन के लक्षण हैं कुछ। भोगी मन का पहला लक्षण तो यह है कि जो भी मिल जाए वह कम मालूम होता है। भोगी मन का दूसरा लक्षण यह है कि उसे जो भी मिल जाए वह व्यर्थ मालूम होता है; जो नहीं मिलता वही सार्थक मालूम होता है। भोगी मन का तीसरा लक्षण यह है कि उसकी वासना अनंत होती है और वासना की पूर्ति के साधन सदा सीमित हैं।

इसलिए भोगी मन को कभी भी किसी तरह के सुख में प्रविष्ट कराना असंभव है। वह हर जगह दुखी होगा। दुख उसके भीतर पैदा होता है। हर चीज उसके दुख में रंग जाती है।

साक्षी को दुखी करना असंभव है। क्योंकि साक्षी के भी वैसे ही लक्षण हैं। साक्षी का पहला लक्षण तो यह है कि जो भी घटना घटती हो, वह उससे अपने को पृथक मानता है। जो भी घट रहा हो, वह उससे. अपने को फासले पर देखता है। वह जानता है कि मैं सिर्फ देखने वाला हूं। तो अगर दुख घट रहा है तो वह दुख का भी देखने वाला है। वह दुख के साथ एक नहीं हो पाता। और जब तक आप दुख के साथ एक न हों, तब तक दुखी नहीं हो सकते।

साक्षी मन का दूसरा लक्षण है कि जो भी मिल जाए वह उसके लिए अनुगृहीत होता है। जो भी मिल जाए, वह उसे परमात्मा की अनुकंपा मानता है। जो भी मिल जाए, वह उसे अपने कर्तृत्व का फल नहीं मानता, उसकी अनुकंपा मानता है। क्योंकि साक्षी कर्ता तो बनता ही नहीं, इसलिए वह यह तो कह ही नहीं सकता कि मैंने किया इसलिए मुझे मिला! वह सदा यही कहता है कि मैंने तो कुछ भी नहीं किया और यह सब मुझे मिला, इसलिए मैं अनुगृहीत हूं। उसके अनुग्रह की कोई सीमा नहीं है। उसके धन्यवाद का, आभार का अहोभाव अनंत है। इसे समझ लें।

साक्षी का मतलब ही यह है कि वह जानता है, मैंने कभी कुछ नहीं किया। मैं सिर्फ देखने वाला हूं। तो जो कुछ भी हुआ है, वह मेरे द्वारा नहीं हुआ है, उसमें मैं कर्ता नहीं हूं। इसलिए जो भी हो जाए, वह प्रभु की अनुकंपा है।

साक्षी से सुख को छीनना असंभव है। साक्षी उस कला को जानता है, जिससे उसके चारों तरफ सुख फैलता है। जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाले को निकालकर निर्मित करती है, वैसा ही भोक्ता अपने चारों तरफ दुख का जाल निर्मित करता है और साक्षी अपने चारों तरफ सुख का जाल निर्मित करता है।

फिर साक्षी की कोई वासना नहीं है। क्योंकि जब मैं कर्ता हो ही नहीं सकता, तो करने की कोई कामना व्यर्थ है। और जिसकी कोई वासना नहीं है, जिसकी कोई अपेक्षा नहीं है, उसे आप कभी भी दुखी नहीं कर सकते। दुख आता है अपेक्षा के टूटने से।

मैंने सुना है कि एक आदमी बहुत उदास और दुखी बैठा है। उसकी एक बड़ी होटल है। बहुत चलती हुई होटल है। और एक मित्र उससे पूछता है कि तुम इतने दुखी और उदास क्यों दिखाई पड़ते हो कुछ दिनों से? कुछ धंधे में कठिनाई, अड़चन है? उसने कहा, बहुत अड़चन है। बहुत घाटे में धंधा चल रहा है। मित्र ने कहा, समझ में नहीं आता, क्योंकि इतने मेहमान आते—जाते दिखाई पड़ते हैं! और रोज शाम को जब मैं निकलता हूं तो तुम्हारे दरवाजे पर होटल के तख्ती लगी रहती है नो वेकेंसी को, कि अब और जगह नहीं है, तो धंधा तो बहुत जोर से चल रहा है! उस आदमी ने कहा, तुम्हें कुछ पता नहीं। आज से पंद्रह दिन पहले जब सांझ को हम नो वेकेंसी की तख्ती लटकाते थे, तो उसके बाद कम से कम पचास आदमी और द्वार खटखटाते थे। अब सिर्फ दस—पंद्रह ही आते हैं। पचास आदमी लौटते थे पंद्रह दिन पहले; जगह नहीं मिलती थी। अब सिर्फ दस—पंद्रह ही लौटते हैं। धंधा बड़ा घाटे में चल रहा है।

अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा।

मैं एक घर में मेहमान था। गृहिणी ने मुझे कहा कि आप मेरे पति को समझाइए कि इनको हो क्या गया है। बस, निरंतर एक ही चिंता में लगे रहते हैं कि पाच लाख का नुकसान हो गया। पत्नी ने मुझे कहा कि मेरी समझू में नहीं आता कि नुकसान हुआ कैसे! नुकसान नहीं हुआ है। मैंने पति को पूछा। उन्होंने कहा, हुआ है नुकसान, दस लाख का लाभ होने की आशा थी, पांच का ही लाभ हुआ है। नुकसान निश्चित हुआ है। पांच लाख बिलकुल हाथ से गए।

अपेक्षा से भरा हुआ चित्त, लाभ हो तो भी हानि अनुभव करता है। साक्षीभाव से भरा हुआ चित्त, हानि हो तो भी लाभ अनुभव करता है। क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया, और जितना भी मिल गया, वह भी परमकृपा है, वह भी अस्तित्व का अनुदान है।

तो गृहस्थ हम बनाते थे व्यक्ति को, जब वह भीतर के साक्षी की थोड़ी—सी झलक पा लेता था। फिर पत्नी होती थी, लेकिन वह कभी पति नहीं हो पाता था। फिर बच्चे होते थे, वह उनका पालन करता था, लेकिन कभी पिता नहीं हो पाता था। मकान बनाता था, दुकान चलाता था, लेकिन सब ऐसे जैसे किसी नाटक के मंच पर अभिनय कर रहा हो। और प्रतीक्षा करता था उस दिन की, कि वह जो भीतर की यात्रा पच्चीस वर्ष की उम्र में अधूरी छूट गई थी, जल्दी से उसे पूरा करने का कब अवसर मिले। तो पचास वर्ष की उम्र में वह वानप्रस्थ हो जाता था।

यह शब्द बड़ा अनूठा है

सिर्फ भारत ने एक अनूठा प्रयोग किया था कि इसके पहले कि भीड़ पकड़ ले और आदमी बाहर की तरफ बहने लगे, हम उसे गुरुकुल भेज देते थे, ताकि वह उन लोगों के सान्निध्य में बैठ जाए जो भीतर की तरफ बह रहे हैं। उस हवा में वह भी भीतर की तरफ बह पाए। और थोड़ा—सा उसे बोध हो जाए, थोड़ा संगीत सुनाई पड़ने लगे, थोड़ो भीतर की वीणा बज उठे, फिर हम उसे संसार में भेज देते थे, निर्भीक।

हमने इस देश में जीवन के चार चरण किए थे। पहले चरण को हमने ब्रह्मचर्य कहा था। यह शब्द बड़ा अनूठा है। इस शब्द का अर्थ है—ईश्वर जैसी चर्या। ब्रह्म जैसी चर्या। ब्रह्म जैसा आचरण। यह शब्द उतना छोटा नहीं है जैसा कि लोगों ने इसे मान रखा है। लोग तो समझते हैं कि शायद वीर्य का निरोध ब्रह्मचर्य है। यह बड़ी क्षुद्र व्याख्या है। वीर्य का निरोध तो सहज हो जाता है। लेकिन ईश्वर जैसी चर्या अगर हो, तो वीर्य का निरोध तो छाया की भांति पीछे चला आता है। वह कोई मौलिक, वह कोई आधारभूत बात नहीं है। वह तो जो बाहर की तरफ दौड़ रहा है, उसका ही वीर्य भी बाहर की तरफ दौडता है। जो भीतर की तरफ चलने लगा, उसके वीर्य की गति भी अंतर्मुखी हो जाती है।

ईश्वर जैसी चर्या का अर्थ है—जिसकी जीवन—चेतना भीतर, और भीतर, और भीतर की तरफ जा रही है। केंद्र की तरफ जाती हुई चेतना का नाम ब्रह्मचर्य है। अपने से बाहर जाती चेतना का नाम अब्रह्मचर्य है। दूसरे की तरफ जाती हुई चेतना का नाम कामवासना है। अपनी तरफ जाती हुई चेतना का नाम ब्रह्मचर्य है। पच्चीस वर्ष के लिए हम युवकों को भेज देते थे गुरुकुल में, ताकि वे भीतर की तरफ बहना सीखें। इसके पहले कि संसार का स्वाद उन्हें आए वे परमात्मा का थोड़ा—सा स्वाद ले लें। फिर कोई डर नहीं है। फिर संसार उन्हें कभी भी भुला न सकेगा। फिर वह याद बनी ही रहेगी। फिर वह भीतर की पुकार जारी ही रहेगी। फिर भीतर कोई धुन बजती ही रहेगी। और धन फिर कितनी ही आवाज करे, उस भीतर की आवाज को दबाना मुश्किल होगा।

स्त्रियां पुरुषों को कितना ही आकर्षित करें, या पुरुष स्त्रियों को कितना ही आकर्षित करें, वह आकर्षण फीका ही रहेगा। जिसने एक बार भी भीतर के पुरुष या भीतर की स्त्री का दर्शन कर लिया, उसके लिए बाहर फिर छायाएं हैं, फिर बाहर तस्वीरें हैं, फिर बाहर कुछ भी वास्तविक नहीं है। फिर कोई आकर्षण बाहर नहीं है। फिर कोई खींच नहीं सकता। तब हम मानते थे व्यक्ति को इस योग्य कि वह अब संसार में जाए।

बड़ी अजीब बात है। संसार के बाहर का अनुभव ले-ले, फिर संसार में जाए। प्रयोजन कीमती था। फिर कोई संसार में जाता था तो भी संसार उसके भीतर नहीं पहुंच पाता था। जिसने भीतर की थोड़ी—सी भी समझ पैदा कर ली, वह संसार से फिर अछूता निकल जाता था। वह चलता था इस नदी में, लेकिन उसके पैरों में पानी नहीं छूता था। फिर वह गुजरता था इन्हीं सब जगहों से, जहां से आप गुजरते हैं, लेकिन वह गुजर जाता था एक मेहमान की तरह। यह घर उसके लिए धर्मशाला ही होता था। यह परिवार उसके लिए एक नाटक से ज्यादा मूल्य नहीं रखता था। जो भी जरूरी था, वह करता था। लेकिन कोई भी ऐसी वासना नहीं थी जो विक्षिप्तता बन जाए।

मस्तिष्क सब कुछ अनुभव करता है


देलगादो ने रेडियो के द्वारा दूर से लोगों के मन को संचालित करने के प्रयोग किए हैं। तो उसने एक सांड को, उसके मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड डाल दिए… और आप जानकर चकित होंगे कि आपके मस्तिष्क के भीतर अगर कोई चीज डाल दी जाए तो आपको पता नहीं चलेगा। वहां कोई संवेदना नहीं है। अगर आपके ब्रेन की सर्जरी की जाए और वहा कोई चीज छोड़ दी जाए—लोहे का एक टुकड़ा—तो आपको कभी पता नहीं चलेगा कि वहा लोहे का टुकड़ा पड़ा है। क्योंकि आपके मस्तिष्क में संवेदन अनुभव करने वाले कोई स्नायु नहीं हैं।

यह बड़ी हैरानी की बात है कि मस्तिष्क सब कुछ अनुभव करता है, लेकिन भीतर उसके पास कोई स्नायु नहीं हैं। इसलिए तो आपको मस्तिष्क के भीतर क्या चल रहा है, उसका पता नहीं चलता। बहुत बड़ा

काम चल रहा है। बड़ी फैक्ट्री है। कोई सात करोड़ स्नायु हैं। चौबीस घंटे वहां विद्युत की तरह भाग—दौड़ चल रही है। आपको पता नहीं चलता है।

एक सांड के मस्तिष्क में देलगादो ने एक इलेक्ट्रोड रख दिया और उस इलेक्ट्रोड का संबंध उसके रेडियो से है। और वह उस रेडियो के द्वारा उस सांड को संचालित करने लगा। जब वह रेडियो में उस बटन को दबाएगा जिससे सांड को क्रोध आना चाहिए, तो सांड एकदम फुफकार मारकर क्रोध से भर जाएगा। बीच में तार भी नहीं जुड़ा है, वायरलेस से संबंधित है। हजारों मील दूर भी बैठा हो देलगादो तो वहां से वह सांड कों—सांड माउंट आबू में हो और देलगादो अमरीका में—तो वहां से वह उसको क्रोधित कर सकता है। सिर्फ बटन दबाने की बात है कि वह क्रोध में आ जाएगा; फुफकार मारेगा और जो भी आसपास होगा, हमला कर देगा।

उसने जब अपने प्रयोग का प्रदर्शन किया यूरोप में—स्पेन में—तो लोग चकित हो गए। लाखों लोग देखने इकट्ठे हुए थे। सांड फुफकार मारकर भागा, क्योंकि देलगादो भी था वहां मैदान में। वह हाथ में अपना रेडियो लिए खड़ा हुआ है। वह ठीक उसके पास आ गया, एकदम घबड़ाहट का क्षण था, कि वह अपने सींग घुसेड़ देगा उसके पेट में, तभी उसने बटन दबाई। साड वहीं शांत हो गया, एक फीट दूरी पर। खड़ा हो गया, जैसे एकदम ध्यान में चला गया!

यह इतनी खतरनाक स्थिति है कि इसका आज नहीं कल राजनीतिज्ञ उपयोग करेंगे। बच्चों को अस्पताल में पैदा होने के साथ ही इलेक्ट्रोड डाले जा सकते हैं, जिनका उनको कभी पता नहीं चलेगा। सिर्फ दिल्ली से बटन दबाने की जरूरत है कि सब लोग कहेंगे—झंडा ऊंचा रहे हमारा!

जरूर तानाशाही हुकूमतें इसका उपयोग करेंगी। कि मुल्क भूखा मर रहा हो तो भी कोई फिक्र नहीं। लेकिन मुल्क के अगर सुख के संवेदन को संचालित किया जा सके, तो भूखे लोग भी आनंद से भर जाएंगे। कितने ही आप सुखी हों, अगर आपके दुख के केंद्र को संचालित किया जा सके, आप तज्‍क्षण दुखी हो जाएंगे। तो सुख—दुख भी आपकी आत्मा की खबर नहीं देते। सिर्फ आपके यांत्रिक मस्तिष्क की खबर देते हैं। सिर्फ एक ही संभावना है जिससे आदमी यंत्रवत नहीं है, और सभी स्थितियों में हम यंत्रवत हैं। शरीर है भी यंत्र, लेकिन उसके भीतर जो छिपा है, वह यंत्र नहीं है। शरीर है भी एक बहुत काप्लिकेटेड, बहुत सूक्ष्म नाजुक यंत्र। मालिक भीतर छिपा है।

नचिकेता पूछता है कि यह मेरा तीसरा वरदान है कि मैं जानना चाहता हूं कि जब यह सारा यंत्र—शरीर गिर जाएगा, तब भी मैं बचता हूं या नहीं? संशय है बहुत, क्योंकि कुछ कहते हैं कि कोई बचता है पीछे; और कुछ कहते हैं, कोई भी नहीं बचता।

यमराज को विचार हुआ कि अनधिकारी के प्रति आत्मतत्व का उपदेश करना हानिकर होता है

यह थोड़ा समझ लेने जैसा है। अनधिकारी के प्रति, अपात्र के प्रति आत्मतत्व का उपदेश हानिकर होता है। असल में जो अनधिकारी है, वह सत्य का उपयोग भी हानि के लिए ही करेगा। जो अधिकारी है वह असत्य का उपयोग भी कल्याण के लिए करेगा।

मनोवैज्ञानिकों की खोज बड़ी हैरान करने वाली है

आत्मा की अमरता, आत्मा का शेष रहना शरीरे के पार, आत्मा का अतिक्रमण करना शरीर को; दीया मिट जाए लेकिन ज्योति बचती है; यह सवाल नचिकेता उठाता है। नचिकेता कहता है, बड़ा संशय है। कोई कहता है कि आत्मा बचती है और कोई कहता है कि आत्मा नहीं बचती। मृत्यु के बाद क्या होता है? यही मेरा तीसरा वर है, यही मैं जान लेना चाहता हूं।

यही प्रत्येक जान लेना चाहता है। अगर मृत्यु के बाद कुछ बचता है, तो अभी भी आपके भीतर कुछ है। और अगर मृत्यु के बाद कुछ भी नहीं बचता, तो अभी ची आपके भीतर कुछ भी नहीं है। अभी भी आप खाली, कोरे, एक यंत्रवत। एक यंत्र से ज्यादा नहीं हैं। आप अभी भी नहीं हैं—अगर मृत्यु के बाद आप नहीं बचेंगे। तो धोखा है, आपको सिर्फ खयाल है कि आप हैं—अगर आप पदार्थ का एक जोड़ हैं, और एक रासायनिक व्यवस्था हैं, और एक यंत्र की भाति चल रहे हैं।

एक कार चल रही है, एक घड़ी चल रही है, एक मशीन चल रही है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि मशीन है। मशीन सिर्फ एक जोड़ है। कल—पुर्जे अलग कर लेंगे, कुछ भी पीछे बचेगा नहीं।

आदमी भी क्या एक जोड़ है, कि सारे कल—पुर्जे अलग कर लें तो भीतर कुछ भी न बचे? क्योंकि मृत्यु कल—पुर्जे अलग करेगी। और अगर भीतर कुछ भी नहीं बचता, आप सिर्फ एक जोड़ है—तो आप थे ही नहीं। आपका होना ही नहीं है। आप सिर्फ खयाल में हैं। एक वहम है होने का।

न तो आपकी बुद्धि से पता चलता है कि आपके भीतर आत्मा है। क्योंकि आप जितनी बुद्धिमानी का काम करते हैं, उससे ज्यादा बुद्धिमानी का काम करने वाले यंत्र, कंप्यूटर खोज लिए गए हैं। आप जितनी कुशलता से काम करते हैं, उससे कुछ आत्मा का पता नहीं चलता, क्योंकि यंत्र की कुशलता आप नहीं पा सकते। यंत्र ज्यादा कुशल है। और इसलिए जहा भी ज्यादा कुशलता की जरूरत होती है, वहां आदमी का भरोसा नहीं किया जा सकता। वहा यंत्र का भरोसा करना होता है।

आपकी खूबी क्या है? कि आप गणित कर लेते हैं? कि आप भाषा बोल लेते हैं? ये सब काम यंत्र कर सकते हैं। उन्होंने करीब—करीब करना शुरू कर दिया है। आदमी की विशिष्टता, यंत्रों से, इसमें नहीं है कि वह बुद्धिमान है ‘ आइंस्टीन भी जो काम कर रहा है, वह काम भी उससे ज्यादा कुशलता से एक कंप्यूटर कर सकता है। तो फिर आपका मस्तिष्क एक यंत्र, कंप्यूटर से ज्यादा नहीं है। आप भी एक यंत्र हैं।

आदमी बच्चे पैदा करता है। लेकिन अभी वैज्ञानिकों ने ऐसे यंत्र विकसित किए हैं, जो अपने बच्चे पैदा कर सकते हैं। यंत्र खुद ही अपने जैसा यंत्र अपने भीतर से पैदा कर सकता है, निर्मित कर सकता है। तब फिर वह भी कोई बड़ी बात नहीं रह गई। यंत्र अपने जैसा यंत्र स्वयं ही निर्मित कर सकता है, आटोमैटिक। और ऐसी भी व्यवस्था की गई है कि वह आने वाले यंत्र में, जो उससे पैदा होगा, अपने से श्रेष्ठता लाए। और इस तरह हर यंत्र जो उससे पैदा होगा, और आगे पैदा होगा, वह पिछले से श्रेष्ठ होता चला जाएगा। आपका बेटा जरूरी नहीं है कि आपसे श्रेष्ठ हो। अक्सर तो ऐसा नहीं होता। अच्छे बाप अक्सर बुरे बेटों को जन्म देते हैं। यंत्र में ऐसी आंतरिक व्यवस्था की जा सकी है कि वह जो यंत्र पैदा करे, उससे श्रेष्ठ हो। जो —जो उसमें भूल—चूक थीं, वह उसमें न हों। फिर उसके बाद वह जो यंत्र पैदा करेगा, वह और भी श्रेष्ठ होगा। और एक ऐसी जगह आ सकती है कि यंत्र पैदा करते—करते श्रेष्ठतम यंत्र को पैदा कर दे, जो कि आदमी अभी तक सफल नहीं हुआ है।

और आप जिनको सुख—दुख कहते हैं, वे भी सारी यांत्रिक घटनाएं हैं।

स्किनर एक बहुत बड़ा मनसविद है। स्किनर ने बहुत से प्रयोग किए हैं जिनमें आपके सुख—दुख यांत्रिक हैं, इसकी खोज की है। मनुष्य जिस सुख को गहरा से गहरा जानता है, वह संभोग का सुख है। लेकिन स्किनर, देलगादो और दूसरे मनोवैज्ञानिकों की खोज बड़ी हैरान करने वाली है।

चूहों पर स्किनर और उसके मित्र काम कर रहे थे। उन्होंने मस्तिष्क में वे बिंदु खोज लिए हैं जहां सुख का अनुभव होता है—प्लेजर प्याइंट्स, और वे भी बिंदु खोज लिए हैं जहां दुख का अनुभव होता है। तो बिजली का तार जोड़ देते हैं जहां सुख का अनुभव होता है। और उस बिंदु को अगर बिजली से छेड़ा जाए, तो बड़ा सुख मालूम होता है। दुख का बिंदु जोड़ दिया जाए इलेक्ट्रोड से, तो बड़ा दुख मालूम होता है। एक चूहे पर स्किनर प्रयोग कर रहा था। और संभोग के क्षण में चूहे को जो रस और आनंद मालूम होता है, वह मस्तिष्क के किस हिस्से में मालूम होता है उस हिस्से का उसने अध्ययन किया, और उस हिस्से में उसने बिजली से तार जोड़ दिया। और चूहे को बटन बता दी, बटन दबाकर। और जैसे ही बटन दबाई, चूहा बड़ा आनंदित हुआ। फिर तो चूहे ने खुद बटन दबाना सीख लिया। आप चकित होंगे कि एक घंटे में चूहे ने पांच हजार बार बटन दबाई। पांच हजार! रुका ही नहीं, जब तक कि बेहोश होकर नहीं गिर पड़ा। स्किनर का कहना है कि आने वाली सदी में हम हर आदमी के खीसे में रखने वाला छोटा यंत्र दे देंगे। पुरुष को स्त्री की जरूरत नहीं है, स्त्री को पुरुष की जरूरत नहीं है। जब भी वह कामसुख पाना चाहे, जरा—सा बटन को दबाए उसके मस्तिष्क का सुख—केंद्र संचालित हो जाएगा। रास्ते पर चलते हुए आप संभोग करते चले जाएंगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा। और संभोग के लिए जो उपद्रव झेलने पड़ते हैं—घर—गृहस्थी बसाओ; एक स्त्री की परेशानी भोगो; एक पति का उपद्रव झेलो—वह कुछ भी नहीं। आप पूरी तरह मालिक हो जाते हैं।

ठीक ऐसे ही दुख के केंद्र भी मस्तिष्क में हैं। स्किनर कहता है कि वे काटकर अलग किए जा सकते हैं। कोई दुख अनुभव ही नहीं होगा। आप सोचते हैं कि दुख इसलिए अनुभव होता है कि दुख है, तो आप गलती में हैं। सिर्फ आपके पास दुख का केंद्र है, वह अलग कर दिया जाए, आपको दुख अनुभव नहीं होता। जब आपको मारफिया दिया जाता है, या क्लोरोफार्म दिया जाता है, तो दुख का केंद्र आच्छादित हो जाता है। इसीलिए फिर आपका हाथ—पैर भी काटा जाए तो आपको पता नहीं चलता। आपको कोई मार भी डाले तो पता नहीं चलता।

ये सारे केंद्र यांत्रिक हैं। और आप जानकर हैरान होंगे कि ये नई खोजें आदमी को बड़ी खतरनाक स्थिति में ले जाएंगी।

अपने साधारण से शब्दों में बड़े प्यार से उत्तर देता है

अपनी शादी के पहले दिन पति और पत्नी के बीच शर्त रखी जाती है कि किसी के लिए भी दरवाजा नहीं खोला जायेगा !
उसी दिन उस लड़के के माता पिता आये और अन्दर जाने के लिए दरवाजा खट खटाया !
..
पति पत्नी एक दुसरे की तरफ देखते है।
...
पति अपने माता पिता के लिए दरवजा खोलना चाहता है लेकिन उसे शर्त याद आ जाती है। वह दरवाज़ा नहीं खोलता है ओर उसके माता पिता चले जाते है ।
...
कुछ समय के बाद उसी दिन लड़की के माता पिता आते है और अन्दर जाने के लिए दरवाजा ख़त खटाते है ।
..
...
पति पत्नी फिर एक दुसरे की तरफ देखते है और उस समय भी वो शर्त याद करते है ।
..
पत्नी की आँखों में आंसू आ जाते हे वो अपने आंसू पूछते हुए कहती हे : मै अपने माता पिता के लिए ऐसा नहीं कर सकती और दरवाजा खोल देती है ।
..
पति कुछ नहीं कहता है ।।
..
कुछ समय के बाद उनके दो पुत्र जन्म लेते है ।
...
इसके बाद उनको तीसरा बच्चा होता है जो एक लड़की (बेटी) होती है ।।
..
वह पति अपनी पुत्री के जन्म लेने के अवसर पर एक बहुत बड़ी और शानदार पार्टी का आयोजन करता है और अपने सभी दोस्तों और रिश्तेदारों को बुलाता है ।
..

फिर उसकी पत्नी उससे पूछती है कि क्या कारण था जो उसने बेटी के जन्म पर इतनी बड़ी पार्टी का आयोजन किया जबकि इससे पहले दोनों बेटों के जन्म पर ऐसा कुछ नहीं किया ।।
...
पति अपने साधारण से शब्दों में बड़े प्यार से उत्तर देता है :
क्योकि यही वो है जो एक दिन मेरे लिए दरवाजा खोलेगी ।।

Monday, 22 September 2014

जीवन की कुंजी की खोज कर रहे हैं।


सारी साधुता एक ही धारणा पर टिकी है कि शरीर के साथ सब समाप्त नहीं होता। और जीवन का अर्थ इसी बात पर निर्भर है कि शरीर जब गिरता है तो कुछ बिना गिरा भी शेष रह जाता है। शरीर जब मिटता है मिट्टी में, तो सभी कुछ मिट्टी में नहीं गिरता। कुछ मेरे भीतर, कोई ज्योति, किसी और यात्रा पर निकल जाती है। मैं बचता हूं किसी अर्थों में।

अगर मैं बचता हूं तो ही मेरे जीवन का भेद बचता है। अगर मैं ही नहीं बचता, तो क्या भेद है? फिर तो शायद जिन्हें हम बुरा कहते हैं वे ही ज्यादा समझदार हैं। जिन्हें हम भला कहते हैं वे नासमझ हैं।

अगर आत्मा भी मरणधर्मा है, तो साधु मूढ़ हैं, ध्यानी अज्ञानी हैं। मंदिरों में पागलों की जमात है। क्योंकि वे जो भी कर रहे हैं, वह किसी अर्थ का नहीं है। फिर आप प्रार्थना करें या जुआ खेलें, बराबर है।

आत्मा अगर बचती है शरीर के बाद, तो ही मंदिर और गुरुद्वारा; और वेद कुछ अर्थ रखते हैं। महावीर, बुद्ध, कृष्ण में कुछ भेद है, कुछ राज है उनके पास। वे किसी महान जीवन की कुंजी की खोज कर रहे हैं।

लेकिन अगर शरीर के साथ सब समाप्त हो जाता है, तो कैसी कुंजी और किसकी खोज! तब जीवन एक व्यर्थ दौड़धूप

फिर सत्य और असत्य में क्या भेद है?

छोटे बच्चे छोटी—छोटी चीजों पर लड़ते हैं। बड़े—बूढ़े भी कुछ बड़ी चीजों पर लड़ते हुए मालूम नहीं पड़ते। छोटी ही उनकी लड़ाइयां हैं। लेकिन उम्र बड़ी होने के कारण अपनी छोटी बातो को वे बड़ा करके दिखलाते है

यह मैं बड़ा हूं यह खोज ही बचकानी है। मगर बड़े इस बचकानी खोज के लिए तर्क देते हैं। वे ढंग से बताते हैं। वे ऐसा नहीं कहते कि मैं बड़ा हूं। ऐसा कहना बहुत छोटापन मालूम पड़ेगा। वे कहते हैं, मेरा राष्ट्र महान है। लेकिन मेरा राष्ट्र महान क्यों है? क्योंकि मैं इस राष्ट्र में पैदा हुआ हूं। मेरी वजह से। मैं अगर पाकिस्तान में पैदा होता, तो पाकिस्तान महान होता। और मैं अगर अफगानिस्तान में पैदा होता, तो अफगानिस्तान महान होता। जहां मैं हूं वही राष्ट्र महान होता है। मेरा धर्म महान है। मेरा शास्त्र, मेरी गीता, मेरे पुराण, मेरे तीर्थंकर, मेरे भगवान, मेरे अवतार, वे बड़े हैं। उनके पीछे आड़ में हम बड़े हो जाते हैं। और यह पागलपन सारी दुनिया में सभी के ऊपर है।

ऐसा लगता है, मनुष्यता अभी तक प्रौढ़ नहीं हुई। पूरी मनुष्यता की औसत उम्र दस साल के करीब है। इसलिए इतने युद्ध होते हैं, इतनी मूढ़ताएं होती हैं। निपट अज्ञान से भरा हुआ सारा व्यवहार है।

अगर बूढ़े बचकाना व्यवहार करते हैं, तो कभी—कभी कोई बच्चा वृद्धों जैसा गौरवपूर्ण व्यवहार भी करता है। वह दूसरी संभावना ही नचिकेता का सार है। अब हम सूत्र में प्रवेश करें—

नचिकेता तीसरा वर मांगते हुए कहता है : मरे हुए मनुष्य के विषय में यह संशय है— कोई तो यों कहते हैं कि मरने के बाद आत्मा रहता है। और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता है। आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ मैं इसका निर्णय भलीभांति समझ लूं यही तीनों वरों में तीसरा वर है
सारे धर्म की खोज यही है। इस एक बिंदु पर ही सारे धर्मों का अंतस्तल टिका हुआ है कि क्या शरीर की मृत्यु मनुष्य की मृत्यु है? क्या मर जाने के बाद सभी कुछ मर जाता है, या कुछ शेष रहता है? और यह इतना केंद्रीय सवाल है कि इस पर सभी कुछ निर्भर है। जीवन के सारे मूल्य, जीवन का सारा अर्थ, प्रयोजन, अभिप्राय, जीवन की सारी गरिमा, गीत, गौरव, सभी कुछ इस एक बात पर निर्भर है कि क्या शरीर के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है?

अगर शरीर के साथ सभी कुछ समाप्त हो जाता है तो न नीति में कोई अर्थ है, न धर्म में कोई अर्थ है। न अच्छाई है फिर कुछ, न बुराई है फिर कुछ। क्योंकि अच्छे भी मिट्टी में मिल जाते हैं, बुरे भी मिट्टी में मिल जाते हैं। अच्छे आदमी की मिट्टी में और बुरे आदमी की मिट्टी में कोई गुणात्मक फर्क नहीं होता। एक चोर और एक साधु के मरे हुए शरीर में कोई भी तो भेद नहीं है। और अगर चोर भी वहीं पहुंच जाता है और साधु भी वहीं पहुंच जाता है, मिट्टी में, और दोनों समान हो जाते हैं, तो दोनों के जीवन में जो भेद था वह काल्पनिक था। क्योंकि मृत्यु ने प्रगट कर दिया कि सब भेद काल्पनिक थे। तुम अच्छे थे कि बुरे, दो कौड़ी की बात है। अगर मृत्यु के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है, तो इस जगत में कोई नैतिक, कोई धार्मिक, किसी मूल्य का, किसी वैज्यू का कोई अर्थ नहीं है। फिर बेईमानी और ईमानदारी समान हैं। फिर हत्या और जीवनदान बराबर हैं। फिर हिंसा और अहिंसा में कोई भी फर्क नहीं है। फिर सत्य और असत्य में क्या भेद है? फिर मैं अच्छा रहूं या बुरा रहूं जब अंत में सब समान ही हो जाता है, और अच्छे और बुरे दोनों ही मिट्टी में मिलकर खो जाते हैं, तो अच्छे होने की सारी आधारशिला गिर जाती है।