Monday, 22 September 2014

अभी भोग देखे नहीं, तो त्याग में क्या अर्थ हो सकता है!

इसलिए नचिकेता की अति गुरु—गंभीर खोज भारतीय मन के लिए चिंता का विषय नहीं है। पश्चिम के विचारक जरूर चिंतित होंगे कि इतना छोटा—सा बच्चा ऐसे प्रश्न कैसे उठा सकता है? क्योंकि ईसाइयत और इस्लाम और यहूदी धर्म, तीनों धर्म जो भारत के बाहर पैदा हुए हैं—शेष सारे महत्वपूर्ण धर्म भारत में पैदा हुए है—ये तीनों धर्म मानते हैं एक ही जन्म है, एक ही मृत्यु है, उसके बाद कोई पुनर्आगमन नहीं है। इसलिए उनकी धारणा में बच्चे तो ऐसे प्रश्न उठा ही नहीं सकते। और बच्चा इतनी गहन चिंतन। भी नहीं कर सकता। उनकी समझ में तो ऐसे चिंतनपूर्ण विचार वृद्धावस्था में ही संभव हैं।

लेकिन नचिकेता सिर्फ कथा नहीं है। और भी हजारों बच्चों ने ऐसे प्रमाण दिए हैं। पश्चिम में भी ऐसे बहुत से प्रमाण हैं।

पश्चिम का बहुत बड़ा संगीतज्ञ मोजर्ट सात वर्ष की उम्र में वैसे संगीत में कुशल हो गया, जैसा व्यक्ति सत्तर वर्ष की उम्र में भी नहीं हो पाता। चौंकाने वाली बात है। क्योंकि जिस संगीत के अभ्यास के लिए सत्तर वर्ष चाहिए, वह संगीत का अभ्यास सात वर्ष में हो कैसे सकता है? और मोजर्ट तीन साल की उम्र में महान संगीतज्ञ होने की संभावना प्रगट करने लगा। निश्चित ही पीछे यात्रा होनी चाहिए। पीछे के अनुभव चाहे स्मरण न हों, पीछे की संपदा चाहे उसका बोध न हो, मोजर्ट के साथ है।

दो वर्ष की उम्र तक में बच्चों ने ऐसे प्रमाण दिए हैं हजारों, जो सिवाय पिछले जन्म की धारणा के अतिरिक्त और किसी तरह से समझाए ही नहीं जा सकते। नचिकेता अनूठा नहीं है। नचिकेता ने जो पूछा है वह इस बात की खबर है कि यह खोज बहुत पुरानी है और यह बच्चा बहुत बूढ़ा है।

लाओत्से के संबंध में कथा है कि लाओत्से बूढ़ा ही पैदा हुआ था। यह नचिकेता भी ऐसा ही बूढ़ा है। इसकी खोज पीछे से जुड़ी है। यह जो पूछ रहा है, इसे खुद भी पता नहीं है कि क्या पूछ रहा है। लेकिन इसने बहुत बार, बहुत—बहुत जन्मों में यह पूछा है, बहुत—बहुत द्वार इसने खटखटाए हैं। बहुत—बहुत गुरुओं के

चरणों में यह बैठा है। यह धारा जो आज प्रगट होकर दिखाई पड़ रही है, भू—गर्भ में बहती रही है।

इस बात को खयाल में ले लें, तो ही नचिकेता के प्रश्न समझने योग्य लगेंगे, अन्यथा अस्वाभाविक मालूम पड़ते हैं। अन्यथा ऐसा लगता है कि नचिकेता के नाम पर ऋषि वे सारी बातें थोप रहा है जो कि वृद्ध भी नहीं पूछते। लेकिन और बच्चों ने भी ऐसा ही पूछा है।

शंकराचार्य तैंतीस वर्ष की उम्र में तो चल ही बसे। तैंतीस वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्म—सूत्र, उपनिषद और गीता पर अपनी महान व्याख्याएं पूरी कर लीं। तीन सौ वर्ष की उम्र भी किसी आदमी को मिले, तो भी शंकर का कोई मुकाबला नहीं है। शंकर ने जो तैंतीस वर्ष की उम्र में लिखा है, वह तीन सौ वर्ष की उम्र भी साधारणत: मिले तो भी लिखने की कोई संभावना नहीं है।

शंकर ने अपनी व्याख्या का सिलसिला सत्रह साल की उम्र में शुरू किया। और शंकर ने नौ वर्ष की उम्र में संन्यस्त होने की कामना प्रगट की।

यह जो नौ वर्ष की उम्र में… नौ वर्ष की उम्र ही क्या है! हम तो नब्बे वर्ष की उम्र में भी बचकाने बने रहते हैं। हमारे चित्त की कोई प्रौढ़ता नहीं हो पाती। वृद्धावस्था में भी हमारा चित्त वैसा ही होता है जैसा नासमझ अज्ञानी का होना चाहिए।

शंकर के नौ वर्ष की उम्र में संन्यस्त होने की धारणा का उदय, जब अभी जीवन देखा नहीं! तो जिस जीवन को अभी देखा नहीं है, उससे मुक्त होने का सवाल भी कहौ उठता है! अभी दुख जाना नहीं, तो दुख से छुटकारे की बात ही क्या अर्थ रखती है! अभी भोग देखे नहीं, तो त्याग में क्या अर्थ हो सकता है!

निश्चित ही भोग बहुत बार देखे गए हैं। बहुत बार देखे गए भोगों का ही यह सार निष्कर्ष है कि नौ वर्ष का बच्चा संन्यस्त हो जाना चाहता है।
तो नचिकेता पूछ रहा है, आत्मा की उम्र से। उसकी मानसिक—उम्र भी बड़ी प्रगाढ़ रही होगी। क्योंकि वह जो सवाल उठा रहा है, वे खबर देते हैं इस बात की कि उसके सवाल गहन अनुभव से निकले हुए हैं।

बूढ़ों को देखें, बच्चों को देखें। बच्चों में जरूर कभी कोई बूढ़ा मिल जाएगा। और को में तो अक्सर बहुत से बच्चे मिलेंगे। फर्क हो जाते हैं उम्र के साथ, पर फर्क ऊपरी हैं। छोटे बच्चे, छोटे लड़के और लड़कियां अपने गुड्डे—गुड्डियों का विवाह कर रहे हैं; बड़े—बूढ़े रामलीला कर रहे हैं! रामचंद्र जी बनाए हैं, सीताजी बनाई हैं, विवाह हो रहा है, जुलूस निकल रहा है। मन की उम्र नहीं बढ़ी। मन की उम्र वही की वही है। गुड्डे—गुड्डी थोड़े बड़े हो गए हैं, उनका नाम राम—सीता रख लिया है। लेकिन विवाह करने का गुड्डे—गुड्डियों का मजा वही है। जुलूस निकल रहा है। शोभायात्राए हो रही हैं। अभी तो सारे मुल्क में हो रही हैं। अभी तो दिन हैं बूढ़े बच्चों के! शादी का मजा ले रहे हैं! शादी करवाने का मजा ले रहे हैं! बारात में सम्मिलित हो रहे हैं!

निश्चित ही के जब बच्चों जैसा काम करते हैं तो उसको रेशनलाइज करते हैं, उसके आसपास तर्क बिठाते हैं। नहीं तो उनको अपने बूढेपन पर शर्म मालूम होगी। उनको बेचैनी लगेगी।

बच्चे के साथ भी अत्यंत सम्मानपूर्वक व्यवहार चाहिए।


नचिकेता तीसरा वर मांगते हुए कहता है : मरे हुए मनुष्य के विषय में यह संशय है— कोई तो यों कहते हैं कि मरने के बाद आत्मा रहता है और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता। आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ मैं इसका निर्णय भलीभांति समझ लूं यही तीनों वरों में से तीसरा वर है।। 20।।

यमराज ने सोचा कि अनधिकारी के प्रति आत्मतत्व का उपदेश करना हानिकर होता है अतएव पहले पात्र— परीक्षा की आवश्यकता है ऐसा विचारकर यमराज ने इस तत्व की कठिनता का वर्णन करके नचिकेता को टालना चाहा और कहा— हे नचिकेता। इस विषय में पहले देवताओं ने भी संदेह किया था परंतु उनकी भी समझ में नहीं आया। क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है सहज ही समझ में आने वाला नहीं है। इसलिए तुम दूसरा वर मांग लो, मुझ पर दबाव मत डालो इस आत्मज्ञान संबंधी वर को मुझे लौटा दो।। 21।।

नचिकेता आत्मतत्व की कठिनता की बात सुनकर घबराया नहीं न उसका उत्साह मंद हुआ वरन् उसने और भी दृढ़ता के साथ कहा हे यमराज। आपने कहा कि इस विषय पर देवताओं ने भी विचार किया था परंतु वे निर्णय नहीं कर पाए और यह सरलता से जानने योग्य भी नहीं है; इतना ही नहीं इस विषय का कहने वाला भी आपके जैसा दूसरा नहीं मिल सकता। इसलिए मेरी समझ में इसके समान दूसरा कोई वर नहीं है।। 22।।

विषय की कठिनता से नचिकेता नहीं घबड़ाया वह अपने निश्चय पर ज्यों का त्यों दृढ़ रहा। इस एक परीक्षा में वह उत्तीर्ण हो गया। अब यमराज दूसरी परीक्षा के रूप में उसके सामने विभिन्न प्रकार के प्रलोभन रखने की बात सोचकर उससे कहने लगे— सैकड़ों वर्षों की आयु वाले बेटे और पोतो को तथा बहुत से गौ आदि पशुओं को एवं हाथी स्वर्ण और घोड़ों को मांग लो भूमि के बड़े विस्तार वाले साम्राज्य को मांग लो। तुम स्वयं भी जितने वर्षों तक चाहो जीते रहो।। 23।।

हे नचिकेता। धन, संपत्ति और अनंतकाल तक जीने के साधनों को यदि तुम इस आत्मज्ञानविषयक वरदान के समान वर मानते हो तो मांग लो और तुम इस पृथ्वीलोक में बड़े भारी सम्राट बन जाओ। मैं तुम्हें संपूर्ण भोगों में से अति उत्तम भोगों को भोगने वाला बना देता हूं।।24।।

इतने पर भी नचिकेता अपने निश्चय पर अटल रहा तब स्वर्ग के दैवी भोगों का प्रलोभन देते हुए यमराज ने कहा—जो—जो भोग मनुष्यलोक में दुर्लभ हैं उन संपूर्ण भोगों को इच्छानुसार मांग लो। रथ और नाना प्रकार के वाद्यों के सहित इन स्वर्ग की अप्सराओं को अपने साथ ले जाओ। मनुष्यों को ऐसी स्त्रियां निःसंदेह अलभ्य हैं। मेरे द्वारा दी हुई इन स्त्रियों से तुम अपनी सेवा कराओ। पर हे नचिकेता। मरने के बाद आत्मा का क्या होता है इस बात को मत पूछो।।25।।

परंतु? नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था। वह जानता था कि इस लोक और परलोक के बड़े से बड़े भोग— सुख की आत्मज्ञान के सुख के किसी क्षुद्रतम अंश के साथ भी तुलना नहीं की जा सकती। अतएव उसने अपने निश्चय का युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनों में यमराज से कहा— हे यमराज! जिनका आपने वर्णन किया, वे क्षणभंगुर भोग (और उनसे प्राप्त होने वाले सुख) मनुष्य के अंतःकरण सहित संपूर्ण इंद्रियों का जो तेज है उसको क्षीण कर डालते हैं। इसके सिवा समस्त आयु चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो अल्प ही है। इसलिए ये आपके रथ आदि वाहन और ये अप्सराओं के नाच— गान आपके ही पास रहे (मुझे नहीं चाहिए)।। 26।।

मनुष्य धन से कभी भी तृप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि हमने आपके दर्शन पा लिए हैं तब धन को तो हम पा ही लेने और आप जब तक शासन करते रहेंगे तब तक तो हम जीते भी रहेंगे। इन सबको भी क्या मांगना है। अत: मेरे मांगने लायक वर तो वह आत्मज्ञान ही है।। 27।।

इस प्रकार भोगों की क्षणभंगुरता का वर्णन करके अब नचिकेता अपने वर का महत्व बतलाता हुआ उसी को प्रदान करने के लिए दृढ़तापूर्वक निवेदन करता है—यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और मरणधर्मा है इस तत्व को भलीभांति समझने वाला मनुष्यलोक का निवासी कौन ऐसा मनुष्य है जो कि बुढ़ापे से रहित न मरने वाले आप सदृश महात्माओं का संग पाकर भी स्त्रियों के सौदर्य—क्रीड़ा और आमोद—प्रमोद का बार—बार चिंतन करता हुआ बहुत काल तक जीवित रहने में उत्सुकता रखेगा?।। 28।।

हे यमराज! जिस महान आश्चर्यमय परलोक संबंधी आत्मज्ञान के विषय में लोग यह शंका करते हैं कि यह आत्मा मरने के बाद रहता है या नहीं उसमें जो निर्णय है वह आप मुझे बतलाए। जो यह अत्यंत गूढ़ता को प्राप्त हुआ वर है इससे दूसरा वर नचिकेता नहीं मांगता।। 29।।

छोटे से नचिकेता के संबंध में एक बात ध्यान मेले लेनी चाहिए,तो ही मृत्यु के साथ उसका यह अन्वेषण हमारी समझ आ सकता है। नचिकेता कितना ही छोटा हो, कितना ही उसकी शरीर की उम्र कम हो, उसकी आत्‍मा की उम्र अनंत है। कोई भी बच्‍चा-बच्‍चा नहीं है। और कोई भी बच्‍चा सिर्फ कोरी स्‍लेट की भांति नहीं है। इसलिए बच्चे के साथ भी अत्यंत सम्मानपूर्वक व्यवहार चाहिए।

यह शरीर नया हो, लेकिन इसके भीतर छिपी चेतना नई नहीं है। जितनी इस संसार की उम्र है, उतनी ही उम्र इस चेतना की भी है। यह चेतना हजारों बार शरीरों में जन्मी है और विदा हुई है। सुख और दुख, जीवन की उलझनें और सुविधाएं, जीवन के रहस्य और रस, जीवन के भ्रम और सत्य, सब इस चेतना ने भी अनुभव किए हैं।

सच्चिदानंदघनरूप परमात्मा के नाम का स्मरण करके

ओम इस सच्चिदानंदघनरूप परमात्मा के नाम का स्मरण करके कठोपनिषद का आरंभ करते हैं

प्रसिद्ध है कि यश का फल चाहने वाले वाजीश्रवा के पुत्र उद्दालक ने (विश्वजित यज्ञ में) अपना सारा धन (ब्राह्मणों को) दान कर दिया। उसका नचिकेता नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र था।। 1।।

(जिस समय ब्राह्मणों को) दक्षिणा के रूप में देने के लिए गौवें लाई जा रही थी उस समय छोटा बालक पर भी नचिकेता में श्रद्धा का आवेश हो गया और उन जराजीर्ण गायों को देखकर वह विचार करने लगा।। 2।।

जो अंतिम बार जल पी चुकी हैं जिनका घास खाना समाप्त हो गया है जिनका दूध अंतिम बार दुह लिया गया है जिनकी इंद्रियां नष्ट हो चुकी हैं ऐसी निरर्थक मरणासन्न गौवों को देने वाला वह दाता तो नीच योनियों और नरकादि लोक जो सब प्रकार के सुखों से शून्य हैं उनको प्राप्त होता है! (अत: पिताजी को सावधान करना चाहिए)।। 3।।

यह सोचकर वह अपने पिता से बोला कि हे प्यारे पिताजी! आप मुझे किसको देंगे? (उत्तर न मिलने पर उसने वही बात,) दुबारा—तिबारा कही तब पिता ने उससे क्रोधपूर्वक कहा कि तुझे मैं मृत्यु को देता हूं।। 4।।

(यह सुनकर नचिकेता मन ही मन विचारने लगा कि) बहुतो में मैं प्रथम श्रेणी के आचरण पर चलता आया हूं और बहुतो में मध्यम श्रेणी के आचार पर चलता हूं ( कभी भी नीची श्रेणी के आचरण को मैने नहीं अपनाया फिर पिताजी ने ऐसा क्यों कहा। ) यम का ऐसा कौन— सा कार्य हो सकता है जिसे आज मेरे द्वारा ( मुझे देकर) (पिताजी) पूरा करेगे?।। 5।।

उसने अपने पिता से कहा : आपके पूर्वज पितामह आदि जिस प्रकार का आचरण करते आए हैं उस पर विचार कीजिए और ( वर्तमान में भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण कर रहे हैं उस पर भी दृष्टिपात कर लीजिए (फिर आप अपने कर्तव्य का निश्चय कर लीजिए। ) यह मरणधर्मा मनुष्य अनाज की तरह पकता है अर्थात जराजीर्ण होकर मर जाता है तथा अनाज की भांति ही फिर उत्पन्न हो जाता है।। 6।।

अतएव इस अनित्य जीवन के लिए मनुष्य को कभी कर्तव्य का त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिए। आप शोक का त्याग कीजिए और अपने सत्य का पालन कर मुझे मृत्यु ( यमराज) के पास जाने की अनुमति दीजिए। पुत्र के वचन सुनकर उद्दालक को दुख हुआ परंतु नचिकेता की सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराज के पास भेज दिया। नचिकेता को यमसदन पहुंचने पर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गए हुए हैं अतएव नचिकेता तीन दिनों तक अन्न— जल ग्रहण किए बिना ही यमराज की प्रतीक्षा करता रहा।

यमराज के लौटने पर उनकी पत्नी ने कहा—हे सूर्यपुत्र! स्वयं अग्निदेवता ही ब्राह्मण अतिथि के रूप में गृहस्थ के घरों में प्रवेश करते हैं साधुपुरुष उनका सत्कार किया करते हैं अत: आप उनके लिए जल आदि अतिथि— सत्कार की सामग्री ले जाइए।। 7।।

जिसके घर में ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन किए निवास करता है उस मंदबुद्धि मनुष्य की नाना प्रकार की आशा और प्रतीक्षा उनकी पूर्ति से होने वाले सब प्रकार के सुख सुंदर भाषण के फल एवं यह दान आदि शुभ कर्मों के फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदि वैभव, इन सबको वह नष्ट कर देता है।। ८।।

पत्नी के वचन सुनकर यमराज नचिकेता के पास गए और उसका यथोचित सत्कार कर बोले. हे ब्राह्मण! आप अतिथि हैं। आपको नमस्कार हो। हे ब्राह्मण! मेरा कल्याण हो। आपने जो तीन रात्रियों तक मेरे घर पर बिना भोजन किए निवास किया है इसलिए (आप मुझसे) प्रत्येक रात्रि के बदले (एक— एक करके) तीन वरदान मांग लीजिए।। 9।।

यमराज ने जब इस प्रकार कहा तब पिता को सुख पहुंचाने की इच्छा से नचिकेता बोला : हे मृत्युदेव! मेरे पिता गौतमवशीय उद्दालक मेरे प्रति शांत संकल्प वाले प्रसन्नचित्त और क्रोध एवं खेद से रहित हो जाएं तथा आप के द्वारा वापस भेजे जाने पर जब मैं उनके पास जाऊं तो वे मुझ पर विश्वास करके पुत्र— भाव रखकर मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें। यह मैं अपने तीनों वरों में पहला वर मांगता हूं। 10।।

यमराज ने कहा : तुमको मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखकर मुझसे प्रेरित तुम्हारे पिता उद्दालक पहले की भांति ही यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है ऐसा समझ करके दुख और क्रोध से रहित हो जाएंगे और वे अपनी आयु की शेष रात्रियों में सुखपूर्वक शयन करेगे।। 11।।

इस वरदान को पाकर नचिकेता बोला हे यमराज! स्वर्गलोक में किंचितमात्र भी भय नहीं है; वहां मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं वहां कोई बुढ़ापे से भी भय नहीं करता। स्वर्गलोक के निवासी भूख और प्यास इन दोनों से पार होकर दुखों से दूर रहकर सुख भोगते हैं।। 12।।

हे मृत्युदेवा आप उपर्युक्त स्वर्ग की प्राप्ति के साधनरूप अग्नि को जानते हैं अत: आप मुझ श्रद्धालु को वह अग्निविद्या भलीभांति समझाकर कहिए जिससे कि स्वर्गलोक के निवासी अमरत्व को प्राप्त होते हैं। यह मैं दूसरे वर के रूप में मांगता हूं।। 13।।

तब यमराज बोले, हे नचिकेता! स्वर्गदायिनी अग्निविद्या को अच्छी तरह जानने वाला मैं तुम्हारे लिए उसे भलीभांति बतलाता हूं; तुम उसे मुझसे भलीभांति समझ लो। तुम इस विद्या को स्वर्गरूपी अनंत लोकों की प्राप्ति कराने वाली तथा उसकी आधारस्वरूपा और (बुद्धिरूप) गुफा में छिपी हुई समझो।। १४।।

उस स्वर्गलोक की कारणरूपा अग्निविद्या का उस नचिकेता को उपदेश दिया। उसमें कुंड— निर्माण आदि के लिए जो— जो और जितनी ईटें आदि आवश्यक होती हैं तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है वे सब बातें भी बताईं। तथा उस नचिकेता ने भी वह जैसा सुना था ठीक उसी प्रकार समझकर यमराज को पुन: सुना दिया। उसके बाद यमराज उस पर संतुष्ट होकर फिर बोले।। 15।।

(उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हो महात्मा यमराज नचिकेता से बोले : अब मैं तुम्हें यहां पुन: यह अतिरिक्त वर देता हूं कि यह अग्निविद्या तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी तथा इस अनेक रूपों वाली रत्नों की माला को भी तुम स्वीकार करो।। 16।।

(उस अग्निविद्या का फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं : )

इस अग्नि का शास्त्रोक्त रीति से तीन बार अनुष्ठान करने वाला तीनों ऋक् साम यजुर्वेद के साथ संबंध जोड़कर यह दान और तपरूप तीनों कर्मों को निष्कामभाव से करने वाला मनुष्य जन्म— मृत्यु से तर जाता है। वह ब्रह्मा से उत्पन्न सृष्टि के जानने वाले स्तवनीय इस अग्निदेव को जानकर तथा इसका निष्कामभाव से विधिपूर्वक चयन करके इस अनंत शांति को पा जाता है, (जो मुझको प्राप्‍त है)।। 17।।

(ईटों के स्वरूप, संख्या और अग्नि—चयन—विधि) इन तीनों बातो को जानकर तीन बार नाचिकेत अग्नि विद्या का अनुष्ठान करने वाला तथा जो कोई भी इस प्रकार जानने वाला पुरुष इस नाचिकेत अग्नि का चयन करता है वह मृत्यु के पाश को अपने सामने ही (मनुष्य शरीर में ही) काटकर शोक से पार होकर स्वर्ग लोक में आनंद का अनुभव करता है।।18।।

हे नचिकेता यह तुम्हें बतलाई हुई स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि विद्या है जिसको तुमने दूसरे वर से मांगा है। इस अग्नि को अब से लोग तुम्हारे ही नाम से स्मरण करेंगे। हे नचिकेता अब तुम तीसरा वर मानो।।19।। 
एक परदेसी मेरा दिल ले गया
जाते जाते मीठा मीठा गम दे गया
कौन परदेसी तेरा दिल ले गया
मोटी मोटी अखियों में आँसू दे गया
मेरे परदेसीयां की यही हैं निशानी
अखियाँ बिलोर की, शीशे की जवानी
ठंडी ठंडी आहों का सलाम दे गया
ढूँढ रहे तुझे लाखों दिलवाले
कर दे ओ गोरी ज़रा आँखों से उजाले
आँखों का उजाला परदेसी ले गया
उस को बुला दू, सामने ला दू 
क्या मुझे दोगी जो तुम से मिला दू 
जो भी मेरे पास था वो सब ले गया

पूर्वजन्म सन्तान फल

पूर्वजन्म सन्तान फल 

*पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में
माता-पिता, भाई-बहिन,पति पत्नी- प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते है। सब मिलते है।
क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ
देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है।
वेसे ही संतान के रूप में हमारा कोई पूर्व जन्म
का सम्बन्धी ही आकर जन्म लेता है।
जिसे शास्त्रों में चार प्रकार का बताया गया है।
1) ऋणानुबन्ध :- पूर्व जन्म का कोई एसा जीव
जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो तो वो आपके घर में संतान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो।
2) शत्रु पुत्र :-पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में संतान बनकर आयेगा औए बडा होने पर माता पिता से मारपीट झगडा या उन्हे सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार
से सताता ही रहेगा !
3) उदासीन :-इस प्रकार की सन्तान माता पिता को न तो कष्ट देती है ओर ना ही सुख।
विवाह होने पर यह माता- पिता से अलग होजाते है।
4)सेवक पुत्र :-पूर्व जन्म में यदि आपने
किसी की खूब सेवा कि है तो वह अपनी कि हुई सेवा का ऋण उतारने के लियेआपकी सेवा करने के लिये पुत्र/पुत्री बनकर आता है।

आप यह ना समझे कि यह सब बाते केवल मनुष्य पर ही लागु होती है। इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव भी आ सकता है। जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा कि है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है। यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसके दूध देना बन्द करने के पश्चात उसे घर से निकाल दिया हो तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि आपने किसी निरपराध जीव
को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा। इस लिये जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं करे। क्यों कि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे। उसे वह आपको सौ गुना करके देगी। यदि आपने किसी को एक रूपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रूपये जमा हो गये है। यदि आपने किसी का एक रूपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रूपये निकल गये।

Sunday, 21 September 2014

जन्म हुआ और जगत के हो गये

ईश्वर के अत्यन्त प्रिय होने का दावा रखने और हो-हल्ला के बाबजूद भी सत्य तो यह है कि हमें अंधकार प्रिय है। हम इससे दूर होने की कल्पना में ही कष्ट और पीड़ा का अनिभव करने लगते हैं और अंत में उस "कल्पना" के स्वप्न को ही तिलांजलि दे देते हैं। हाँ बिना किसी कष्ट/प्रयन्त/साधन/आचरण के मिल जाये तो कृपा है। स्वयं को योग्य बनाकर तो हम "पा" ही लेंगे। हमने अंधकार में "प्रकाश" की अपनी ही कल्पना कर ली है और हमें अंधकार में भी प्रकाश प्रतीत होने लगता है क्योंकि हमने मान लिया है कि उसका "अस्तित्व’ है। प्रत्येक वस्तु और पदार्थ/प्राणी को देखने की हमारी अतिन्द्रिय़ क्षमता [जागतिक] विकसित हो गयी है। हम अंधकार में ही दर्पण देखते हैं और स्वयं पर मन्त्र-मुग्ध हो जाते हैं - "अहा ! कैसा दिव्य-रुप ! कैसे दिव्य-भाव ! अपना सभी सुन्दर ! कोई दोष नहीं; सर्वथा निर्दोष ! कौन ऐसा? अभी कुछ और भी संभावनायें हैं सुन्दर होने की; अब यही प्रयत्न करने हैं; बस और क्या?" हम स्वयं को अंधकार में देख रहे हैं; सुन्दर, गुणवान और अपने प्रियजनों को छोड़कर हमें संसार में किसी में यह गुण दृष्टिगोचर नहीं होते। किसी के उचित गुणों की प्रशंसा में भी यह भावना रहती है कि हम कितने उदार और विनम्र हैं। यह भावानायें हमारे जागतिक स्वभाव के अनुकूल होने के कारण हमें प्रिय हैं किन्तु हमारी मूल प्रकृति के विपरीत हैं।
जन्म हुआ और जगत के हो गये। स्वाभाविक; किन्तु कभी तो स्मरण हो कि ईश्वर ने हमें अपने सभी गुणों और क्षमताओं के साथ भेजा है; कभी तो स्वप्न से "जागने" की भी इच्छा जगे ! हमारी स्थिति ऐसी ही है जैसे किसी आवास में सभी मूलभूत सुविधायें हों किन्तु विध्युत-बोर्ड के ऊपर लगे खटके [स्विच] किसी कलाकृति की तरह लग रहे हों और न ही हमें विध्युत के अपने जीवन में उपयोग और प्रयोग का ज्ञान हो। जीवन चल रहा है, बिना विध्युत के भी। अत्यन्त सुख से क्योंकि ज्ञान ही नहीं है। ज्ञान "सुख और दु:ख:" का। ज्ञान जो मिला है अपने कल्याण के लिये दोहन का। अचानक किसी दिन उस विध्युत-बोर्ड को देखते-छूते हाथ से कोई स्विच दब गया और कक्ष की छत में छिपी किसी वस्तु से प्रकाश फ़ूट पड़ा। अरे यह क्या? प्रकाश में कक्ष में रखी सभी वस्तुयें अब एक अलग ही रुप में दिख रही हैं। दर्पण में अब कुछ और भी दिख रहा है; सुन्दरता के साथ-साथ असुन्दरता भी। प्रकाश सीमित ही है परन्तु अब कक्ष के भीतर स्थित वस्तु-पदार्थ के नवीन-रुप से परिचय हो रहा है।
कभी संसार को छोड़कर स्वयं के लिये भी चिंतन करें और पायेंगे कि कहीं कोई स्विच दब गया और प्रकाश दिख रहा है। अपनी वास्तविक स्थिति दिख रही है और साथ ही साथ इस असार संसार की भी। लगन लगी रही तो कोई आवेगा/मिलेगा और तुम्हें उस पूरे विध्युत-बोर्ड की जानकारी देगा ताकि कक्ष या आवास ही नहीं; तुम स्वयं भी भर जाओ प्रकाश से, जो तुम्हारा वास्तविक स्वरुप है। गुरु तुम्हें बताता है कि तुम्हारे पास क्या है? सभी ज्ञान तुम्हें है, तुम केवल इसे भूले हुए हो; गुरु तुम्हें इस बात का ज्ञान करा देते हैं। वे तुम्हारे भीतर स्थित विध्युत-बोर्ड का स्विच दबाकर तुम्हें प्रकाश का अनुभव करा देते हैं। वे स्मरण करा देते हैं कि अंधकार में जीने की प्रकृति जागतिक है। तू तो स्वयं प्रकाश है ! पन्च-भूत से परे भी तू है !
एक नयी दृष्टी ! नया अनुभव ! असत्य से सत्य की यात्रा ! अंधकार से प्रकाश की ओर ! जगत भी है पर हम जगत के नहीं ! उस पूर्ण का होने से जगत हमारा है; सभी अपने ही स्नेही-स्वजन है ! पराया है ही कौन? इतना ही अंतर है कि कोई जान गया और बाकी नहीं जानते। तो क्या? जो जान गया, उसकी जिम्मेदारी बढ़ गयी। तेरे भावे जो करै, भलो-बुरो संसार। नारायण तू बैठके अपनो भुवन बुहार॥ और फ़िर? माध्यम हो गया वो ! उसे तो पुकारना ही है - "जागते रहो ! जागते रहो।" उसे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कोई जागे न जागे अथवा नींद में खलल डालने के लिये अपशब्द ही कहे। उसे तो अपना कार्य करना है; वह भी स्वयं के लिये। ध्यान से सुनोगे तो चराचर ब्रह्मांड में एक ही गूँज है - "जागते रहो !  जय श्री राधे !

तुझे सच ही उत्तर चाहिए।

बुद्ध के पास एक व्यक्ति आया है। और बहुत सवाल पूछता है। तो बुद्ध ने कहा, ऐसा कर, तू सवालों के उत्तर ही चाहता है? उसने कहा, उत्तर ही चाहता हूं। बुद्ध ने कहा, और कितने लोगों से तूने पूछा है? उसने कहा, मैं बहुत लोगों से पूछकर थक चुका हूं, अब आपके पास आया हूं। बुद्ध ने कहा, इतने लोगों से पूछकर तुझे उत्तर नहीं मिला, तो तुझे यह खयाल नहीं आता कि पूछने से उत्तर मिलेगा ही नहीं! उसने कहा कि नहीं, यह खयाल नहीं आया। मुझे तो इतना ही खयाल आता है कि अब और किसी से पूछें, अब और किसी से पूछें, अब और किसी से पूछें। बुद्ध ने कहा, तो कब तक तू पूछता रहेगा? मैं भी तुझे उत्तर दे दूं उसी तरह, जैसे दूसरों ने तुझे दिए थे? या कि तुझे सच ही उत्तर चाहिए। उसने कहा, मुझे सच ही उत्तर चाहिए।

तो बुद्ध ने कहा, फिर तू रुक जा; फिर तू सालभर पूछ ही मत। उसने कहा, बिना पूछे उत्तर कैसे मिलेगा? बुद्ध ने कहा, तू प्रश्न छोड़। सालभर बाद पूछना। सालभर पूछ ही मत, सालभर सोच ही मत, सालभर बात ही मत कर, सालभर मौन ही हो जा। उसने कहा, लेकिन इससे क्या होगा? यह, बुद्ध ने कहा, सालभर बाद ठीक इसी दिन पूछ लेना। जब बुद्ध ने उससे यह कहा कि ठीक इसी दिन पूछ लेना, तो एक भिक्षु वृक्ष के नीचे बैठा था, खिलखिलाकर हंसने लगा।

उस आदमी ने उस भिक्षु से पूछा, हंसते हैं आप, क्या बात है? हंसने की क्या बात है? उस भिक्षु ने कहा, पूछना हो तो अभी पूछ लेना, क्योंकि इसी धोखे में हम भी पड़े। हम साल बिता चुके हैं। जब सालभर बाद खुद ही जान लेते हैं, तो पूछने को बचता नहीं है। पूछना हो तो अभी पूछ लेना, नहीं तो फिर पूछ ही न पाओगे। ये बुद्ध बड़े धोखेबाज हैं। मै भी इसी धोखे में पड़ा और पीछे मुझे पता चला कि और लोग भी इस धोखे में पड़े हैं। बुद्ध ने कहा, मैं अपने वचन पर अडिग रहूंगा। अगर सालभर बाद तू पूछेगा, तो मैं उत्तर दूंगा। साल बीत गया। फिर वही दिन आ गया। और बुद्ध ने उस आदमी को कहा कि मित्र, अब खड़े हो जाओ और प्रश्न पूछ लो! वह हंसने लगा और उसने कहा कि जाने दें, बेकार की बात—चीत में कोई सार नहीं है। पर बुद्ध ने कहा, वायदा था मेरा, तो मैं तुम्हें याद दिलाए देता हूं। पीछे मत कहना कि मैंने धोखा दिया।

उसने कहा कि नहीं, आप उस दिन उत्तर देते तो ही धोखा होता। क्योंकि जब मैं चुप हुआ, तब मैंने देखा कि सारे प्रश्न विचार से निर्मित थे, क्योंकि विचार ने अस्तित्व को खंड—खंड में तोड़ा हुआ था। और अस्तित्व था अखंड। अब जब मैं भीतर निर्विचार हुआ, तो मैंने पाया कि सारे प्रश्न झूठे थे; क्योंकि अस्तित्व को तोड़कर खड़े किए गए थे।

उस अव्यक्त में, उस अखंड में सब प्रश्न गिर जाते है, लेकिन व्यक्त में सब प्रश्न उठते है। तो या तो हम प्रश्न पूछते रहें, तो जिंदगी दर्शनशास्त्र बन जाती है। और या हम भीतर उतरें, तो जिंदगी धर्म बन जाती है। और अधर्म धर्म के खिलाफ उतना नहीं है, जितनी फिलासफी है, जितना दर्शन है धर्म के खिलाफ। क्योंकि वह विचार, और विचार, और विचार में ले जाता है। और हर विचार चीजों को तोड़ता चला जाता है। आखिर में सब चीजें टूट जाती हैं; प्रश्न ही प्रश्न रह जाते हैं; कोई उत्तर नहीं बचता।

भीतर उतरें, वहां एक ही है, वहां दो नहीं हैं। और जहां दो नहीं हैं, वहा प्रश्न नहीं हो सकता। प्रश्न के लिए कम से कम दो का होना जरूरी है कम से कम। पूछा जा सके, इसलिए कम से कम दो का होना जरूरी है।

वह जो पहले था अव्यक्त, वह जो बाद में रह जाएगा अव्यक्त, वह अभी भी है। उसमें उतरना, उसमें डूबना ही मार्ग है।