Thursday, 2 October 2014

आवश्यकता इन्हें पहचानने की है

एक साधु गंगा किनारे झोपड़ी बनाकर रहते थे। सोने के लिए बिस्तर, पानी पीने के लिए मिट्टी का घड़ा और दो कपड़े- बस, यही उनकी जमा पूंजी थी। उन्होंने एक कछुआ पाल रखा था। सुबह स्नान कर वे पास की बस्ती में जाते और वहां कोई न कोई गृहस्थ उन्हें रोटी दे देता। कछुए के लिए वे थोड़े चने भी मांग लेते थे। वे रोटी खाते और कछुआ भीगे चने खाता। उनकी पहचान उस कछुए से हो गई थी। बहुत से लोग उन्हें कछुआ वाला बाबा भी कहते थे। पर एक दिन एक व्यक्ति ने उनसे पूछा- आपने यह गंदा जीव क्यों पाल रखा है? इसे गंगा में डाल दीजिए। उस व्यक्ति की बात सुनकर साधु बोले- कृपया ऐसा न कहें। इस कछुए को मैं अपना गुरु मानता हूं। साधु की बात सुनकर व्यक्ति हंसते हुए बोला- भला कछुआ भी किसी का गुरु बन सकता है? साधु बोले- देखो, किसी तरह की आहट पाकर या किसी के स्पर्श से यह अपने सभी अंग भीतर खींचकर गुड़ी-मुड़ी हो जाता है। चाहे जितना हिलाओ, यह अपना एक अंग तक नहीं हिलाता। मनुष्य को भी इस प्रकार लोभ, क्रोध, हिंसा आदि दुर्गुणों से स्वयं को बचाकर रखना चाहिए। ये चीजें उसे कितना भी आमंत्रण दें, किंतु इनसे अप्रभावित रहना चाहिए। इस कछुए को जब-जब देखता हूं, मुझे यह बात याद आ जाती है। यह कछुआ मुझे सदैव ही प्रेरणा देता है। ईश्वर ने संपूर्ण प्रकृति की रचना सोद्देश्य की है। मानव जीवन को सुख व शांति से परिपूर्ण करने वाले सभी प्रेरक तत्व प्रकृति में मौजूद हैं। आवश्यकता इन्हें पहचानने की है। वह व्यक्ति लज्जित हो गया। उसने साधु से अपनी बात के लिए क्षमा मांगी। 

Wednesday, 1 October 2014

जीवात्मा सहज स्वभाव सोऽहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ

जिस प्रकार हंस स्वच्छन्द होकर आकाश में उड़ता है उसी प्रकार इस हंसयोग का साधक सर्व बन्धनों से विमुक्त होता है।
‘ह’ और ‘स’ अक्षरों की पृथक्-पृथक् विवेचना भी शास्त्रकारों ने अनेक प्रकार से की है। इन अक्षरों से कई प्रकार के अर्थ निकलते हैं और दोनों के योग से ‘साधक’ को एक उपयुक्त दिशा धारा मिलती है।
हकारो निर्गमे प्रोक्तः सकारेण प्रवेशनम्। हकारः शिवरुपेण सकारः शक्तिरुच्यते-शिव स्वरोदयं
श्वास के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में सकार होता है। हकार शिव रूप और सकार शक्ति रूप कहलाता है।
हकारेण तु सूर्यः स्यात् सकारेणेन्दुरुच्यते। सूर्य चन्द्रमसोरै क्यं हठ इव्भिधीयते॥
हठेन ग्रस्यते जाडद्य सर्वदोष समुद्भवम्। क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तपोरैक्य तदाभवेत्-योग शिखोपनिषद्
हकार से सूर्य या दक्षिण स्वर होता है और प्रकार से चन्द्र या बाम स्वर होता है। इस सूर्य चन्द्र दोनों स्वरों में समता स्थापित हो जाने का नाम हठयोग है। हम द्वारा सब दोषों की कारणभूत जड़ता का नाश हो जाता है और तब साधक क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) से एकता प्राप्त कर लेता है।
जीवात्मा सहज स्वभाव सोऽहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ साथ अनायास ही करता रहता है। यह संख्या औसतन चौबीस घण्टे में इक्कीस हजार छः सौ के लगभग हो जाती है।
हकारेण बहिर्यात सकारेण विशेत्पुनः। हंस हंसेत्यसु मन्त्र जीवो जपति सर्वदा॥
शट् शतानि त्वहोरात्रे सहस्राष्येकविंशतिः। एतत्संख्यान्वित मन्त्र जीवो जपति सर्वदा-गोरक्षसंहिता 
यह जीव (प्राणवायु) हकार की ध्वनि से बाहर आता और सकार की ध्वनि से भीतर जाता है। इस प्रकार व सदा हंस हंस मन्त्र का जप करता रहता है।
इस भाँति वह एक दिन रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र सदा जपता रहता है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर सोऽहम् का संक्षिप्त रूप ‘ऊँ’ हो जाता है।
सकारं चहकारं च लोपयित्व प्रयोजनत। संधि च पूर्व रुपाख्याँ ततोऽसौ प्रणवो भवेत्॥
सोऽहम् पद में से सकार और हकार का लोप करके सन्धि की योजना करने से वह प्रणव (ऊँ कार) रूप होता है।

समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर हैं

प्राणिनाँ देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एवंत सत्यकम्॥
हंस एव परं वाक्यं हंस एवंत वैदिकम्। हस एवं परो रुद्रो हंस एवं परात्परम्॥
सर्वदेवस्य मध्यस्थो हंस एवं महेश्वरः। हंसज्योतिरनूपम्यं देवमध्ये व्यवस्थितम्-ब्रह्मा विद्योपनिषद्
प्राणियों की देह में भगवान ‘हंस’ रूप अवस्थित हैं हंस ही परम सत्य हैं हंस ही परम बल है।
समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर हैं हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम रुद्र है, हंस ही परात्पर है।
समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बनकर विद्यमान् है।
सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए।
नभस्स्थ निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात्। अनाहतध्वनियुत हंसं यो वेद हृद्गतम॥
स्व प्रकाशचिदानन्द स हसं इति गीयते। नाभिकन्दे समं कृत्वा प्राणापानौ समाहितः मस्तकस्थामृतास्वादं पीत्वा ध्यानेन सादरम्॥
हंसविद्यामृते लोके नास्ति नित्यत्वसाधनम्। यो ददाति माहविद्या हंसाख्याँ पावनीं पराम्॥
हंसहंसेति यो ब्रू याद्धं सो ब्रह्मा हरिः शिव। गुरु वक्रात्तु लभ्येत प्रत्यक्षं सर्वतोमुखम्-ब्रह्म विद्योपनिषद्-
जो हृदय में अवस्थित अनाहत ध्वनि सहित प्रकाशवान चिदानन्द ‘हंस’ तत्त्व को जानता है सो ‘हंस’ ही कहा जाता है।
जो अमृत से आय सिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्त्व का जप करता है उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है।
इस संसार में ‘हंस’ विद्या के समान और कोई साधन नहीं। इस महाव़ा को देने वाला ज्ञानी सब प्रकार सेवा करने योग्य है।
जो ‘हंस’ तत्त्व की साधना करता है वह त्रिदेव रूप है। वह सर्वव्यापी भगवान को जान ही लेता है।
मनसो हंसः सोऽहं हंस इति तन्मयं यज्ञो नादानुसंधानम्-पाश्पत ब्रह्मोपनिषद्-
मानस ब्रह्म का रूप-हंस है। यही सोऽहम् है। यह हंस बाहर भ्रमण करता है भीतर भी। यह परमात्म स्वरूप है। इसका तन्मयता यज्ञ-नादानुसन्धान है।
हंसात्ममालिका वर्णब्रह्माकालप्रचोदिता। परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी-पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्
हंस यह वर्ण ब्रह्म है। इसी से ब्रह्म की प्राप्ति होती है। पुरुष और परमात्मा यही है।
हंसविद्यामविज्ञाय मुक्तो यत्र करोति यः । स नभोभक्षणेनैव क्षुन्नितृर्ति करिष्यति-सूत संहिता
हंसयोग को जान कर जो प्रयत्न करता है वह सब प्रकार की क्षुधाओं से निवृत्त हो जाता है।
पाशान् छित्वा यथा हंसो निविशकं खमुत्पतेत्। छिन्नपाश्स्तथा जीवः संसार तरते सदा-क्षूरिकोपनिषद्

जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार

ॐ सोऽहं योग* हंस योग *अजपा जप ॐ ॐ

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्रयुक्त होने वाली सोऽहम् साधना-अजपा गायत्री के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को हंसयोग कहते हैं। हंसयोग साधना का महत्त्व और प्रतिफल बताते हुए योगविद्या के आचार्यों ने कहा है-
सर्वेषु देवेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः कष्ठेषु तिलेषु तैलमिव। त दिवित्वा न मृत्युमेति-हंसोपनिषद्
जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार समस्त देहों में ‘हंस’ ब्रह्म रहता है। जो उसे जान लेता है सो मृत्यु से छूट जाता है।
सोऽहम् ध्वनि को निरन्तर करते रहने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है जो उलट कर हंस सदृश प्रतिध्वनित होता है। इसी आधार पर उस साधना का एक नाम हंसयोग भी रखा गया हैं।
हंसो हंसोहमित्येवं पुनरावर्तन क्रमात्। सोहं सोहं भवेन्नूनमिति योग विदो विदुः-योग रसायनम्
हंसो, हंसोहं-इस पुनरावर्तित क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही सोह-सोह ऐसा जप होने लगता है। योग वेत्ता इसे जानते हैं।
अभ्यासानंतरं कुर्याद्गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्नति। चितनं हंसमंत्रस्य योगसिद्धिकरं परम्-योग रसायनम् 
अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस मन्त्र का चिन्तन, (साँस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो’ या ‘सोह’ मंत्र कहते हैं।
हंससयाकृतिविस्तारं भुक्तिमुक्तिफलप्रदमः। सर्वेषु देहेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव। तं दिवित्वा न मृत्युमेति।
अग्नीषीमौ पक्षावोंकारः शिर उकारों बिन्दुस्त्रिनेत्रं मुखं रुद्रो रुद्राणि चरणौ द्विविधं कण्ठतः कुर्यादित्युन्माः अजपोपसंहार इत्याभिधीयते।
तस्मान्मनों विलीने मनसि गते संकल्पविकल्पे दग्धे पुण्यपापे सदाशिवः शक्त्यात्मा सर्वत्रावस्थितः स्वयं ज्योति शुद्धो बुद्धों नित्यों निरंजनः शान्ततमः प्रकाशयतीत वेदानुवचनं भवतीत्युपनिषत्-हंसोपनिषद्
‘हंस’ तत्त्व का आकार विस्तार भुक्ति और मुक्ति दोनों ही देने वाला हैं यह तत्त्व सम्पूर्ण देहधारियों में उसी तर व्याप्त हैं जैसे काष्ठ में अग्नि एवं तिलों में तेल समाया रहता है।
अग्नि और सोम इस हंस के पंख है। ओंकार मस्तक, बिन्दु नेत्र, रुद्र मुख, रुद्राणी चरण, काल भुजाएँ, अग्नि बगलें, तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्म उसके दोनों पार्श्व है।
जब मन उस हंस तत्त्व में लीन हो जाता है तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और शक्ति रूप, ज्योति रूप, शुद्ध-बुद्ध नित्य निरंजन ब्रह्म का प्रकाश, प्रकाशवान होता है।

प्रत्येक व्यक्ति अपने ही जगत में रहता है

पहली बात, हमें वही दिखता है जो हमारी वासना में छिपा होता है। जो मौजूद है, जरूरी नहीं कि हमें दिखे। हमारी आंख उसी को देख लेती है, जिसे हमारी वासना चाहती है। देखने में भी चुनाव है, सुनने में भी चुनाव है। हम वही सुन लेते हैं जो सुनना चाहते हैं। जो हम नहीं सुनना चाहते हैं, वह हमारे कानों से चूक जाता है। और जो हम नहीं देखना चाहते, उसे हमारी आंखे नहीं देख पातीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने ही जगत में रहता है, अपने ही वासना के जगत में।

पागलखाने में जाएं, अकेला आदमी बात कर रहा है किसी से। वह जिससे बात कर रहा है वह आपके लिए नहीं है, उसके लिए पूरी तरह है। वह जवाब भी पा रहा है, वह झगडू भी सकता है। और उसके लिए उस व्यक्ति की मौजूदगी में जरा भी संदेह नहीं है। वह व्यक्ति उसने खुद ही निर्मित किया है। किसी प्रबल कामना के वश में, वह कल्पना प्रगाढ़ हो गई है।

तो इस जगत में दो घटनाएं घट रही हैं। लोग उन चीजों को देख रहे हैं, जो नहीं हैं। और उन चीजों को चूक रहे हैं, जो हैं। यह पहली बात समझ लेनी जरूरी है।

अगर आपको परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, तो इससे केवल एक ही बात पता चलती है कि उसकी प्यास आपके भीतर नहीं है। अन्यथा परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। और जिस दिन प्यास होगी, उस दिन सब चीजें क्षीण पड़ जाएंगी। और सभी चीजें पारदर्शी हो जाएंगी। और उनके भीतर परमात्मा का ही दर्शन शुरू हो जाएगा। वृक्ष तब भी दिखाई पड़ेगा, लेकिन बस परमात्मा का एक आकार। आकाश में बदलिया तब भी बहेंगी, चलेंगी, लेकिन बस परमात्मा का एक रूप। चारों तरफ व्यक्ति भी होंगे—पत्नी होगी, पति होंगे, बच्चे होंगे, मित्र होंगे—लेकिन बस परमात्मा की अनेक छबियां हैं, उसके प्रतिबिंब। वह प्रमुख हो जाएगा। वह केंद्र पर हो जाएगा। और सभी उसकी छायाएं हो जाएंगी। सभी उसकी प्रतिलिपियां हो जाएंगी। वही दिखाई पड़ेगा, शेष सब गौण होता चला जाएगा। 

आप उसे पहचान न पाएंगे।


यहां इतने लोग हैं, मैं जो बोल रहा हूं र इसके उतने ही अर्थ हो जाएंगे जितने लोग यहां हैं। प्रत्येक वही सुन लेगा जो सुनना चाहता है। चुन लेगा, मतलब की बात निकाल लेगा। गैर—मतलब की बात अलग कर देगा। या ऐसे अर्थ निकाल लेगा जो उसकी वासना के अनुकूल हों।

जगत में हमें वही दिखाई पड़ता है जो हमने अपनी वासना में छिपा रखा है। लोग पूछते हैं, परमात्मा कहां है? यह पूछना ही गलत है। असली सवाल यह है कि परमात्मा को पाने की वासना कहा है? और जब तक परमात्मा को पाने की वासना न हो, वह गहन प्यास न हो, तब तक वह दिखाई नहीं पड़ेगा। नहीं दिखाई पड़ता, इसलिए नहीं कि वह नहीं है, बल्कि इसलिए कि आपकी आंखे उसे देखना ही नहीं चाहतीं। अगर वह सामने भी हो तो आप बच जाएंगे। अगर वह आपके द्वार पर दस्तक भी दे, तो भी आप कुछ और ही अर्थ निकाल लेंगे। आप उसे पहचान न पाएंगे।

नदी बह रही हो लेकिन प्यास न हो, तो नदी दिखाई नहीं पड़ेगी। प्यास हो तो दिखाई पड़ती है। और जिस चीज की प्यास हो, वह दिखाई पड़नी शुरू हो जाती है। और इतनी जटिल है यह घटना कि बहुत बार प्यास अगर बहुत प्रबल हो, तो जो नहीं है वह भी दिखाई पड़ सकता है। और प्यास क्षीण हो, तो जो है वह भी दिखाई नहीं पड़ेगा।

हम अपनी वासना के जगत में जीते हैं। और उस वासना के फैलाव से हम चीजों को देखते और पहचानते हैं। पूरब का योग तो इस सत्य को बहुत दिनों से जानता रहा है। लेकिन पश्चिम के मनसविद अब इस सत्य को स्वीकार करते हैं।

पश्चिम में विगत पचास वर्षों में मनोविज्ञान ने जो खोजें की हैं, उनमें एक खोज यह है कि सौ में से केवल दो प्रतिशत चीजें हमें दिखाई पड़ती हैं। सौ घटनाएं घटती हैं, तो उसमें से दो हमें दिखाई पड़ती हैं। अट्ठान्नबे से हम चूक जाते हैं। हमारी आंख चुन रही है, कान चुन रहे हैं, हाथ चुन रहे हैं, मन चुन रहा है।

तो जो हम जानते हैं, वह हमारी च्वाइस है, हमारा चुनाव है। हम वही नहीं जानते जो मौजूद है। और अगर हमारा चुनाव बहुत गहन हो, तो हम उस जगत का निर्माण कर लेंगे अपने आसपास, कल्पनालोक का, जो है ही नहीं। पागलखानों में बंद लोगों ने क्या किया है ई उन्होंने एक जगत निर्माण कर लिया है, जो कहीं भी नहीं है। लेकिन उनके मन के लिए है।

ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके

                          हवन के नियम
कोई भी अनुष्ठान के पश्चात हवन करने का शास्त्रीय विधान है और हवन करने हेतु भी कुछ नियम बताये गए हैं जिसका अनुसरण करना अति - आवश्यक है , अन्यथा अनुष्ठान का दुष्परिणाम भी आपको झेलना पड़ सकता है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है हवन के दिन 'अग्नि के वास ' का पता करना ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके ।
जिस दिन आपको होम करना हो , उस दिन की तिथि और वार की संख्या को जोड़कर १ जमा करें फिर कुल जोड़ को ४ से भाग देवें
-यदि शेष शुन्य (०) अथवा ३ बचे , तो अग्नि का वास पृथ्वी पर होगा और इस दिन होम करना कल्याणकारक होता है ।
-यदि शेष २ बचे तो अग्नि का वास पाताल में होता है और इस दिन होम करने से धन का नुक्सान होता है ।
-यदि शेष १ बचे तो आकाश में अग्नि का वास होगा , इसमें होम करने से आयु का क्षय होता है ।
अतः यह आवश्यक है की होम में अग्नि के वास का पता करने के बाद ही हवन करें