Wednesday, 2 April 2014

इंद्रियाँ उसे पा नही सकती

जो जाना ना जा सके अनुभव रूप (ब्रहां तत्व ) की गति उसका स्वरूप कुछ कहते नहीं बनता,,,,, वह आवर्णीय है,,,,, जेसे गूंगा मनुष्य मीठे फल के रस को ह्रदय मैं ही अनुभव करता है,, उसका वह वर्णन नही कर सकता,,, वेसए ही वह आत्म तत्व परम आनन्दरूप है,,सर्वथा सब मैं एक रस है तथा अपार तुष्टि देता है,, लेकिन मन वाणी के लिय सदा ही अगम्य है इंद्रियाँ उसे पा नही सकती,, उसे जो प्राप्‍त कर चुका है ,, वही जानता है,, जहाँ तक वर्णन की बात है,,, रूप रेखा रहित निराकार, निरगुन,, जाति रहित ( सर्व भेद शून्य ) ,, युक्तियों से भी परे उस परम तत्व कोई सहारा न होने से ( वाणी ) केसे उसका वर्णन करे,,, अता उस निरगुन तत्व को सब प्रकार से अगम्य जानकर मैं तो (  उस परमात्म तत्व के ) सगुण स्वरूप की लीला का ही गान करता हूँ
जे श्री कृष्णा 

एक कंगाल भी सिर पर छत्र धारण करके चलने वाला नरेश हो जाता है

सर्वेश्वर श्री ह्रिजी के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ, जिनकी किरपा से पंगु ( दोनो पेर से लंगड़ा ) भी पर्वत को पार करने मैं समर्थ हो जाता है,, जिनकी किरपा से अंधे को भी सब कुछ दिखने लगता है,, जिनकी किरपा से बहरा भी सुनने लगता है ,,,ओर गूंगा  फिर से बोलने लगता है,, वह चाहें तो एक कंगाल भी सिर पर छत्र धारण करके चलने वाला नरेश हो जाता है,,,उस करुणामये स्वामी के चरणों की मैं बार बार वंदना करता हूँ
जय श्री कृष्णा

इतने बड़े पापी के लिए मेरे यहाँ कोई नरक नहीं है

हे नाथ, मेरी कोन सी गत्ति आप करोगे ,, मैं तो कुटिल, मलिन , कुदर्शन ( जिसका मुख देखना अशुभ हो ) हूँ ओर सदा विषय भोग मैं लिप्त रहता हूँ , कुल ओर कुटुम्ब के लिय धन की लालसा मैं ही मेरे दिन बीतते हैं सारी रात घोर निद्रा मैं पशु के समान ज्ञान हीन होकर सोता हूँ , प्रथ्वि को कागज बनाकर ओर कल्प व्रक्ष को लेखनी बनाएँ ओर समुंद्र के जल मैं ही स्याही घोल कर गणेश जी जन्म भर मेरे कर्मों को लिखते रहें , तब भी मेरे दोषों का अंत नहीं मिलेगा , आपने गजराज ,, गणिका , ओर अजामिल , जेसे अगणित अधम लोगों का उधार किया है यही जानकार मेनएउनसे भी महान अपराध किय मेरे जीवन के अपराधों का विवर्ण लिखते लिखते चित्रगुप्त व्याकुल हो गये,, यमराज ने भी मेरे लिए कह दिया की इतने बड़े पापी के लिए मेरे यहाँ कोई नरक नहीं है,,, हे किरपा निधान,, आप तो परम पुनितो को भी पवित्र करने वाले है,, आपका नाम तक पवित्र करने वाला कहा गया है आप का यही यश सुना तो मन मैं धेर्य आ गया की प्रभु मुझे भी पवित्र करके अपना लेंगे
जय श्री कृष्णा

संसार की उलझनों मैं ही पड़ा पड़ा ही जन्म बीत गया

भोग अथवा भगवान ! अमृत अथवा सुरा ! मोक्ष अथवा जन्म ! देव अथवा असुर ! योगी अथवा भोगी ! पुण्य अथवा पाप ! धर्म अथवा अधर्म ! सज्जन अथवा दुर्जन ! भक्त अथवा संसारी !
चुनो, तुम्हें जो चुनना हो। जो प्रिय हो। स्वतन्त्रता है तुम्हें, श्रीहरि की ओर से। किसी के साथ कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं। स्वेच्छा से जो चाहो, चुनो। श्रीहरि की अहैतुकी कृपा के कारण हमें सब दिया गया है, पिपासा भी और अमृत-कुन्ड भी। सभी तो है हमारे पास किन्तु गुप्त रुप में। अपने-अपने "सिस्टम" में पड़े हुए "साँफ़्टवेयरों" के "पासवर्ड" खोजो। उन्हें खोजे बिना ये न जान पाओगे कि तुम्हारे पास क्या था। संभव है जीवन भर श्रीहरि को भी उलाहना देते रहो कि हमें कुछ नहीं दिया। जिस दिन पिपासा तीव्र हो जायेगी, खोज आरंभ होगी; तब मृग-मरीचिका भी दिखायी देगी किन्तु धैर्य रखना। मृग-मरीचिका से पार पाओगे तभी तो अमृत-कुन्ड मिलेगा। वे भेजेंगे किसी को अथवा स्वयं ही कोई रुप धर लें हमारी सहायता के लिये ! वे तो सबकी ही सहायता करते हैं, अर्जुन की भी और दुर्योधन की भी ! "निहत्थे" को कौन रखेगा, यह हमें तय करना है ! कौन चाहिये? श्रीहरि अथवा माया !हे प्रभु जी मैं संसार की उलझनों मैं ही पड़ा पड़ा ही जन्म बीत गया, बिना विचार के ज्ञान हीन हो कर राज,, काज ,, पुत्र,,, ओर धन के फंदे मैं ही पड़ा भटकता रहा ,, माया की जो कठिन गाँठ पद गई  है,, वह झटका देने से नहीं टूटती,, न तो भगवान जी आप का भजन ही किया,, ना संतों का संग ही किया ,, माया के भिच ही अटका रह गया,,, जेसे नट विविध स्वांग सजकर बहुत सी कलाएँ दिखाता है परन्तु उसका लोभ नहीं छूटता,, वेसे ही मैं भी त्याग ओर वेराग्य की बातें करके वेश धारण करके भी आसक्ति नहीं जाती,,, हे प्रभु जी पतिविहिन ( विधवा ) स्त्री नाना प्रकार के हाव भाव दिखाने से शोभा नही पति ,,,, उसी तरहा भगवत् प्रेम से शून्य मैं नीच भगति का स्वांग करना क्या मुझ नीच को शोभा देता है
जय श्री कृष्णा

Tuesday, 1 April 2014

जागरण माँ भवानी जी का

जागरण माँ  भवानी  जी का 

क्या गुरु का होना ज़रूरी है

क्या गुरु का होना ज़रूरी है
भाव यह की यदि शिष्य को ध्यान लगाने या मन मैं कोई धुविधा हो तो वह उस का समाधान किस से पुछेगा ,,,फिर तो उसे भटकना ही पड़ेगा, हमारे पास एसे लोग आते हैं, जिनके गुरु जिवित हैं लेकिन उनकी वहाँ तक पहुँच नहीं है ,यदि किताबों से समाधान मिल सकता तो वेद गर्न्थ उपनिषद् बहुत है
उपाय,,,,
रात का भटका हुआ मुसाफिर दिन निकलने की प्रतीक्षा करता है ओर जब सूर्य निकलता है तो उस प्रकाश मैं उसे बहुत से रास्ते दिखाई देते हैं , तो क्या वह सब रास्तों पर चलेगा,,,यदि चलेगा तो अपनी मंज़िल पर कब ओर केसे पहुँचेगा उस समय उस मुसाफिर को किसी से रास्ता पूछना ही पड़ेगा, यदि बताने वाले ने सही रास्ता बता दिया तो मंज़िल पर पहुँचने मैं देर नहीं लगेगी,,, यदि वह उस रास्ते का जानकार हुआ तो फिर कहना ही क्या ,,,,,ओर यदि वह अंजान हुआ किताबी ज्ञानी हुआ तो भटकना लाजमी है यदि जानकार हुआ तो ,,,,,
बस उसी को गुरु कहते है
जय श्री कृष्णा

वह चाहे तो पानी मैं भी आग लगा देता है

अविगत प्रमात्मा की गति जानी नहीं जाती, मन वचन ओर कर्म से वह अगम्य ओर अगोचर है, बुद्धि किस प्रकार  उनमे  प्रवेश करे,, अत्यन्त प्रचंड पुरषार्थ ओर बल पाकर भी सिंह भूखा मरता है ओर बिना प्रयास तथा बिना उध्योग किये अजगर अपना पेट भर लेता है,,, वही लीलामय जो खाली है, उन्हें भर देता है ,ओर भरे हूय हो फिर खाली कर देता है,, भगवान की इच्छा से तिनका भी पानी मैं डूब जाता है ओर उनकी इच्छा से पत्थर भी पानी मैं तेरने लगता है,,, कभी वह बहुत उँची भूमि को भी समुंद्र बना डालता है,, कभी उसके चारों ओर पानी भर देता है ,वह पत्थरों के भीतर भी कमल खिला देता है, भगवान की  इच्छा से समुंद्र मैं भी लावा फूटने लगता है ( वह चाहे तो पानी मैं भी आग लगा देता है,,,, राजा को कंगाल ओर कंगाल को राजा बना देता है,,, यदि भगवान अपनी किरपा करे तो मुझ जेसे पतित को भी एक क्षण मैं भव सागर से पार लगा दे यह तो मेरे प्रभु की इच्छा पर ही सब कुछ निर्भर करता है
जय श्री कृष्णा