हे धर्मदास ! फ़िर बृह्मा ने 88 000 ऋषियों को उत्पन्न किया । जिससे काल निरंजन का बहुत प्रभाव बङ गया ( क्योंकि वे उसी का गुण तो गाते हैं ) बृह्मा से जो जीव उत्पन्न हुये । वो ब्राह्मण कहलाये । ब्राह्मणों ने आगे इसी शिक्षा के लिये शास्त्रों का विस्तार कर दिया ( इससे काल निरंजन का प्रभाव और भी बङा । क्योंकि उनमें उसी की बनाबटी महिमा गायी गयी है )
बृह्मा ने स्मृति । शास्त्र । पुराण आदि धर्म गृन्थों का विस्त्रत वर्णन किया । और उसमें समस्त जीवों को बुरी तरह उलझा दिया ( जबकि परमात्मा को जानने का सीधा सरल आसान रास्ता " सहज योग " है ) जीवों को बृह्मा ने भटका दिया । और शास्त्र में तरह तरह के कर्म कांड । पूजा । उपासना की नियम विधि बताकर जीवों को सत्य से विमुख कर भयानक काल निरंजन के मुँह में डालकर उसी की ( अलख निरंजन ) महिमा को बताकर झूठा ध्यान ( और ज्ञान ) कराया । इस तरह " वेद मत " से सब भृमित हो गये । और सत्यपुरुष के रहस्य को न जान सके ।
हे धर्मदास ! निरंकार ( निरंकारी ) निरंजन ने यह कैसा झूठा तमाशा किया । उस चरित्र को भी समझो ।
काल निरंजन आसुरी भाव ( मन द्वारा ) उत्पन्न कर प्रताङित जीवों को सताता है । देवता । ऋषि । मुनि सभी को प्रताङित करता है । फ़िर अवतार ( दिखावे के लिये ।निज महिमा के लिये ) धारण कर रक्षक बनता है ( जबकि सबसे बङा भक्षक स्वयँ हैं ) और फ़िर असुरों का संहार ( का नाटक ) करता है । और इस तरह सबसे अपनी महिमा का विशेष गुणगान करवाता है । जिसके कारण जीव उसे शक्ति संपन्न और सब कुछ जानकर उसी से आशा बाँधते हैं कि - यही हमारा महान रक्षक है ???
विशेष - कुछ पाठकों ने कहा था कि लिखा है - अवतार विष्णु लेते हैं ।.. ऐसा काल निरंजन खुद विष्णु को मायाशक्ति से भरमाता है । यानी खुद को छिपाये रखने हेतु अवतार में जिक्र विष्णु ( खुद विष्णु से भी ) का करता है । और राम ..कृष्ण ये दो अवतार खुद लेता है । यह बात यहाँ स्पष्ट हो गयी । )
वह अपनी रक्षक कला दिखाकर अन्त में सव जीवों का भक्षण कर लेता है ( यहाँ तक कि अपने पुत्र बृह्मा विष्णु महेश को भी नहीं छोङता ) जीवन भर उसके नाम ज्ञान जप पूजा आदि के चक्कर में पङा जीव अन्त समय पछताता है । जब काल उसे बेरहमी से खाता है ( मृत्यु से कुछ पहले अपनी आगामी गति पता लग जाती है )
हे धर्मदास ! अब आगे सुनो । बृह्मा ने 68 तीर्थ स्थापित कर पाप पुण्य और कर्म अकर्म का वर्णन किया । फ़िर बृह्मा ने 12 राशि । 27 नक्षत्र । 7 वार और 15 तिथि का विधान रचा । इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र की रचना हुयी । अब आगे की बात सुनो ।
बृह्मा ने स्मृति । शास्त्र । पुराण आदि धर्म गृन्थों का विस्त्रत वर्णन किया । और उसमें समस्त जीवों को बुरी तरह उलझा दिया ( जबकि परमात्मा को जानने का सीधा सरल आसान रास्ता " सहज योग " है ) जीवों को बृह्मा ने भटका दिया । और शास्त्र में तरह तरह के कर्म कांड । पूजा । उपासना की नियम विधि बताकर जीवों को सत्य से विमुख कर भयानक काल निरंजन के मुँह में डालकर उसी की ( अलख निरंजन ) महिमा को बताकर झूठा ध्यान ( और ज्ञान ) कराया । इस तरह " वेद मत " से सब भृमित हो गये । और सत्यपुरुष के रहस्य को न जान सके ।
हे धर्मदास ! निरंकार ( निरंकारी ) निरंजन ने यह कैसा झूठा तमाशा किया । उस चरित्र को भी समझो ।
काल निरंजन आसुरी भाव ( मन द्वारा ) उत्पन्न कर प्रताङित जीवों को सताता है । देवता । ऋषि । मुनि सभी को प्रताङित करता है । फ़िर अवतार ( दिखावे के लिये ।निज महिमा के लिये ) धारण कर रक्षक बनता है ( जबकि सबसे बङा भक्षक स्वयँ हैं ) और फ़िर असुरों का संहार ( का नाटक ) करता है । और इस तरह सबसे अपनी महिमा का विशेष गुणगान करवाता है । जिसके कारण जीव उसे शक्ति संपन्न और सब कुछ जानकर उसी से आशा बाँधते हैं कि - यही हमारा महान रक्षक है ???
विशेष - कुछ पाठकों ने कहा था कि लिखा है - अवतार विष्णु लेते हैं ।.. ऐसा काल निरंजन खुद विष्णु को मायाशक्ति से भरमाता है । यानी खुद को छिपाये रखने हेतु अवतार में जिक्र विष्णु ( खुद विष्णु से भी ) का करता है । और राम ..कृष्ण ये दो अवतार खुद लेता है । यह बात यहाँ स्पष्ट हो गयी । )
वह अपनी रक्षक कला दिखाकर अन्त में सव जीवों का भक्षण कर लेता है ( यहाँ तक कि अपने पुत्र बृह्मा विष्णु महेश को भी नहीं छोङता ) जीवन भर उसके नाम ज्ञान जप पूजा आदि के चक्कर में पङा जीव अन्त समय पछताता है । जब काल उसे बेरहमी से खाता है ( मृत्यु से कुछ पहले अपनी आगामी गति पता लग जाती है )
हे धर्मदास ! अब आगे सुनो । बृह्मा ने 68 तीर्थ स्थापित कर पाप पुण्य और कर्म अकर्म का वर्णन किया । फ़िर बृह्मा ने 12 राशि । 27 नक्षत्र । 7 वार और 15 तिथि का विधान रचा । इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र की रचना हुयी । अब आगे की बात सुनो ।
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