प्रार्थना में बडी शक्ति है। यह वह साधना है, जिससे व्यक्ति प्रभु की कृपा पाकर सभी कष्टों से दूर हो सकता है। प्रार्थना जीवन को आनंद देती है। ईश्वर से मिलन होता है। यह कोई सिद्धांत नहीं वरन ऋषियों-मुनियों, योगियों, संन्यासियों आदि ने का अनुभव किया है। उन्होंने कहा कि सांसारिक सुख सुविधा भले ही सबको मिल जाए पर किसी को भी शारीरिक या मानसिक शांति नहीं है। व्यक्ति भूल गया है कि इस सृष्टि की रचना करने वाली कोई शक्ति अवश्य है। जिसने इतने जीव-जंतु और वनस्पतियों को पैदा किया है। वह सर्वशक्तिमान, सर्व दृष्टा, सर्वव्यापक और सृष्टि का नियंता है। इस संसार में सबसे श्रेष्ठ जीव मनुष्य है। क्योंकि यही एक ऐसा प्राणी है जो बुद्धि और विवेक से सम्पन्न है। शास्त्र कहते हैं कि जब कई जन्मों के पुण्य उदय होता है तब मनुष्य योनि प्राप्त होती है। इसे पाकर यदि किसी ने इस अवसर को गंवा दिया है तो वह जीवन भर दुखी ही रहेगा। अंत: जीवन का आनंद प्राप्त करने के लिए एक ही साधन है। ईश्वर से प्रार्थना करना। प्रभु की कृपा मिलती है। जो जीवन में सुख ही सुख देती है। यह सृष्टि प्रभु की अद्भुत रचना है। वह अपने हर जीव को समान रूप से देखते हैं। प्रभु कभी किसी का बुरा नहीं चाहते। जब सभी उनकी ही संतान है तो किसी का बुरा चाहने का प्रश्न ही नहीं उठता। हां, यदि किसी के जीवन में कुछ बुरा घटित होता है तो वह उसके पूर्व जन्म के कर्मो का फल है। उसे तो भोगना ही है। इसमें प्रभु का क्या दोष। हां प्रभु से प्रार्थना करते हुए याचना करनी चाहिए कि हे प्रभु कृपा कर ऐसी स्थिति पैदा करे कि अपने कर्मो के फल यथाशीघ्र भोग लें। उन्होंने कहा कि प्रार्थना की शक्ति से कर्मो के फलों को भोगना सरल हो जाता है। जैसे धूप में छतरी रक्षा करती है वैसे ही विपत्ति में ईश्वर की प्रार्थना रक्षा करती है।
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