निगुणा-कृतघ्न और सगुणा- कृतज्ञ दोनों मार्ग में मिल गये और साथ-साथ चलने लगे । आगे एक कूप आया । सगुणा ने कहा- प्यास लगी है, पानी पीकर आगे चलेंगे । सगुणा ने पानी निकाला और पहले निगुणा को पिलाया । फिर अपने लिये निकालने लगा तब निगुणा ने सगुणा के धक्का मारकर उसे कूप में पटक दिया और स्वयं चल दिया । सगुणा को कोई सहारा मिल गया । इससे वह कूप के पानी में डूबा नहीं । इतने में ही फिर सगुणा उस दिन सायंकाल एक नगर के बाहर एक विशाल वट वृक्ष के नीचे पहुँचा और रात्रि को वहां ठहर गया । आधी रात को वहां एक जिन्द और एक काला सर्प दोनों बातें करने लगे । सर्प ने जिन्द से पू़छा- आजकल कहां रहते हो ? जिन्द ने कहा- राजकन्या में रहता हूँ और सब प्रकार का सुख भोगता हूँ । फिर जिन्द ने सर्प से पू़छा- तुम कहां रहते हो ? सर्प ने कहा मैं तो यहां ही अमुक स्थान में लाख रुपयों पर रहता हूँ । जिन्द ने कहा- तुम्हारी बाम्बी में गर्म तेल डालकर तुम को जलाकर, वे लाख रुपये कोई ले जायगा । सर्प बोला- अमुक जगह अमुक बूटी है उसे ले जाकर राज कन्या के गले में कोई बाँध दे तो तुम भी कन्या छोड़कर भागोगे । जिन्द ने कहा- तब तो मुझे कन्या को त्यागकर भागना ही होगा । दोनों की बातों को सगुणा सुन रहा था । अतः प्रातः वह उस बूटी को लेकर राजमहल के पास पहुँचा । उसे पू़छा - तुम कौन हो ? उसने कहा- भूत, प्रेत, जिन्द निकालने वाला हूँ । तब उस को राजा के पास ले गये । राज ने इससे जाति पू़छी इसने कहा- राजपूत हूँ । तब राजा ने कहा- मेरी पुत्री का जिन्द निकाल दो तो उसका विवाह तुम्हारे साथ कर दूंगा । इसने लड़की के गले में वह बूटी बाँध दी तब जिन्द लड़की को छोड़कर चला गया । राजा ने पुत्री का विवाह इसके साथ कर दिया और यह वहां ही रहने लगा । एक दिन यह भ्रमण करने गया तब इसको इसे कूप में डालने वाला निगुणा मिल गया ।
उसको अपने साथ ले आया और अपनी पत्नी को कहा- यह मेरा मित्र है, इसे अच्छी प्रकार जिमाना । वह जिमाने लगी तब निगुणा ने उसे पू़छा- तुम कौन हो ? तब उसने सब बता दिया । फिर निगुणा ने कहा- यह तुम्हारा पति तो हमारे ग्राम का भंगी है । इसने मेरा स्वागत इसीलिये कराया है कि यह मेरी पोल न खोल दे । तुम्हारा जन्म तो भ्रष्ट हो गया । भोजन करके सगुणा के पास आया और बोला - मैंने तो तुमको कूप में डाल दिया था फिर तुम कैसे निकले और यह सम्पत्ति कैसे मिली ? तब सगुणा ने उक्त कथा सुनादी । फिर वह वहां से चल दिया । राजकन्या ने अपनी माता से कहा- मेरा विवाह तो भंगी के साथ कर दिया गया । रानी ने राजा से कहा और राजा ने सगुणे से कहा- तुम अपनी राजपूत जाति का प्रमाण दो । तुम्हारे मित्र ने तुमको भंगी बताया है । वह बोला- मैं तो मेरे पूर्वजों की धन राशि अमुक स्थान पर गडी है। उसको लेने आया था वह धन ही मेरी राजपूत जाति होने का प्रमाण है फिर उसने अपनी धन राशि निकालने का उपाय जो उक्त जिन्द ने बताया था वह भी बता दिया । गर्म तेल से सर्प भाग गया फिर एक लाख रुपयें वहां से निकाल लिये । राजा ने जान लिया कि वह द्वेष के कारण ही ऐसा कह गया है । निगुणा सगुणे की बताई हुई बात के अनुसार उस बड़ वृक्ष के नीचे एक रात को रहा । रात को जिन्द और सर्प दोनों मिले तब बोले- उस दिन हमारी बातें कोई सुनता था इसी से हम दोनों की जगह छूट गई है । यह सुनकर निगुणा बोला- मुझे भी कु़छ बताओ । यह सुनते ही जिन्द और सर्प उस के पास आये, सर्प ने काट लिया तथा जिन्द ने गला घोट कर मार दिया । सगुणा कितने ही गुण करे किन्तु निगुणा नहीं मानता तब उक्त निगुणे के समान उसकी मृत्यु ही होती है ।
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