हम लोगो ने तो अनादि काल से '' संसार में , संसारी वस्तुओ में ही सुख है '' ये माना हुआ है" और यही पर हमारी गाडी अटकी पड़ी है।
अनादी काल से अब तक हमने ये ही किया है ,संसारी भोग पदार्थो में ही सुख है , ये बात संस्कार रूप से हमारे अंदर बेठी हुई है और बड़े होते होते भी हम ये ही देखते हैं जिससे हमारी ये धारणा और पुष्ट होती जाती है , जबकि हम प्रत्यक्ष ही देखते हैं कि संसारी सुख ( जो की जड़ है ) प्रतिक्षण घटता जाता है, उसे सुख नहीं कहा जा सकता , उसे तो मृग मरीचिका ही कहा जा सकता है। जिस तरह एक व्यक्ति एक रूपये के नोट को नहीं देना चाहता लेकिन यदि उसे उस एक रूपये के नोट के बदले हजार रूपये का नोट दिया जाए तो वो उस एक रूपये के नोट को छोड़ देता है , ऐसे ही यदि हमे इस संसार में सुख्बुद्धि से ऊपर उठना है तो हमे सदगुरु की भक्ति का आश्रय लेना होगा , भक्ति करते करते जब अन्तः करण शुद्ध हो जाएगा और उसमे सदगुरुकृपा से गुरु का प्रेम प्रकट होगा तब हमे उसी अनुपात में दिव्य , प्रतिक्षण वर्धमान , अनंत भगवद आनंद का अनुभव होता चला जाएगा और त्यों ही त्यों उसी अनुपात में हम इन संसारी गर्हित , तुच्छ आनंद को छोड़ते चले जायेंगे , हमे इसके लिए कोई कोशिश नहीं करनी पड़ेगी , संसार अपने आप छूटता चला जाएगा , हम उतरोत्तर ऊपर उठते चले जायेंगे , हर साधक को साधना के दौरान इसका अनुभव होता है ।
जो लोग ये बात समझ जाते हैं वे मानव जीवन के अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेते ह और वे ही लोग तुलसीदास , मीरा , नानक , सूरदास , कबीर , ज्ञानेश्वर , तुकाराम आदि बन जाते हँ , हमने ये बात नहीं समझी इसलिए हम लोग आज भी संसारी वस्तुओ के पीछे भाग रहे हैं।
अनादी काल से अब तक हमने ये ही किया है ,संसारी भोग पदार्थो में ही सुख है , ये बात संस्कार रूप से हमारे अंदर बेठी हुई है और बड़े होते होते भी हम ये ही देखते हैं जिससे हमारी ये धारणा और पुष्ट होती जाती है , जबकि हम प्रत्यक्ष ही देखते हैं कि संसारी सुख ( जो की जड़ है ) प्रतिक्षण घटता जाता है, उसे सुख नहीं कहा जा सकता , उसे तो मृग मरीचिका ही कहा जा सकता है। जिस तरह एक व्यक्ति एक रूपये के नोट को नहीं देना चाहता लेकिन यदि उसे उस एक रूपये के नोट के बदले हजार रूपये का नोट दिया जाए तो वो उस एक रूपये के नोट को छोड़ देता है , ऐसे ही यदि हमे इस संसार में सुख्बुद्धि से ऊपर उठना है तो हमे सदगुरु की भक्ति का आश्रय लेना होगा , भक्ति करते करते जब अन्तः करण शुद्ध हो जाएगा और उसमे सदगुरुकृपा से गुरु का प्रेम प्रकट होगा तब हमे उसी अनुपात में दिव्य , प्रतिक्षण वर्धमान , अनंत भगवद आनंद का अनुभव होता चला जाएगा और त्यों ही त्यों उसी अनुपात में हम इन संसारी गर्हित , तुच्छ आनंद को छोड़ते चले जायेंगे , हमे इसके लिए कोई कोशिश नहीं करनी पड़ेगी , संसार अपने आप छूटता चला जाएगा , हम उतरोत्तर ऊपर उठते चले जायेंगे , हर साधक को साधना के दौरान इसका अनुभव होता है ।
जो लोग ये बात समझ जाते हैं वे मानव जीवन के अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेते ह और वे ही लोग तुलसीदास , मीरा , नानक , सूरदास , कबीर , ज्ञानेश्वर , तुकाराम आदि बन जाते हँ , हमने ये बात नहीं समझी इसलिए हम लोग आज भी संसारी वस्तुओ के पीछे भाग रहे हैं।
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