Tuesday, 13 May 2014

वो ठिकाना याद है


तुमसे मिलते ही वो कुछ बेबाक़ हो जाना मेरा 
और तेरा दांतों में वो ऊंगली दबाना याद है~~

तुमको जब तनहा कभी पाना तो अज़राहे लिहाज़ 
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है~~

खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ़ातन 
और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छुपाना याद है~~

ग़ैर की नज़रों से बचके सबकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ 
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है~~

आ गया जब वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे फ़िराक 
वो तेरा रो रोके मुझको भी रुलाना याद है~~

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए 
वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है~~

बेरुखी के साथ सुनना दर्द ए दिल की दास्ताँ 
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद है ~~

वक़्त ए रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए 
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है~~

चोरी चोरी हमको तुम आकर मिले थे जिस जगह 
मुद्दतें गुज़री पर अबतक वो ठिकाना याद है~~~~

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