तत्व ज्ञान
-=-=-=-=- पुराण मंथन -=-=-=--=-
पवित्र हिन्दू धर्म के अनुयाई पुराणों के ज्ञान पर पूर्ण रूप से आश्रित हैं। इन्हीं को आधार बताकर हिन्दु धर्म के धर्म गुरु प्रजा में प्रवचन करते हैं। जिन्होंने भगवान विष्णु जी, भगवान शिवजी आदि देवों को सर्वेश्वर, अजन्मा, सृष्टी, स्थिती संहार कर्ता। सर्वशक्तिमान बताया है तथा यह भी कहा है कि श्री विष्णु जी तथा श्री शिवजी आदि के कोई माता-पिता नहीं हैं। हिन्दू धर्मगुरुओं ने यह भी दृढ़ता से कहा है कि श्री विष्णु जी व श्री शिवजी ही पूज्य हैं। इनसे अन्य कोई परमात्मा नहीं है जिस कारण से श्री शिव जी भगवान में आस्था रखने वाले श्रद्धालु श्री शिव पुराण को श्रद्धा से पढ़ते हैं तथा साथ में श्री विष्णु जी की भी साधना अवश्य करते हैं तथा पुराणों में वर्णित भक्ति विधि के अनुसार अन्य देवों का अनुष्ठान व पूजा भी करते हैं। इसी प्रकार श्री विष्णु जी में आस्था रखने वाले
श्रद्धालु श्री विष्णु पुराण को श्रद्धा से पढते हैं। इसी विष्णु पुराण में वर्णित साधना भी करते हैं, साथ में शिव जी की भी पूजा करते हैं तथा अन्य देवों की पूजा भी पुराण के अनुसार करते हैं। पवित्र गीता जी का भी पठन-पाठ्न करते हैं।
उपरोक्त दोनों प्रभुओं के भक्त श्री देवी भागवतपुराण व ब्रह्म पुराण के ज्ञान को सत्य मानते हैं। उनके अनुसार देवी पूजा तथा तीर्थ भ्रमण भी करते हैं इसके साथ-साथ लोकवेद (सुना-सुनाया ज्ञान) के आधार से पीपल, जांटी, बड़ आदि वृक्षों की पूजा, समाध-पूजा, मजार पूजा, शीतला माता आदि की पूजा भी चाव के साथ करते हैं। श्री हनुमान पूजा, भैरो पूजा, भूत पूजा, श्राद्ध क्रिया भी पूरी लगन से करते हैं। जिसे कल्याणकारी मानते हैं।
सर्व प्रथम पुराण क्या है। पुराणों की रचना किस प्रकार हुई? पुराणों पर आसक्त होकर श्रद्धालु वेदों को छोड़ कर इन्हीं पर पूर्ण रूप से आधारित हो गए।
पुराणों का ज्ञान दाता कौन है? यह जानते हैं :-
प्रश्न:- पुराणों की रचना किस कारण हुई। वेदों को छोड़ कर श्रद्धालु पुराणों पर ही किस कारण से आसक्त हो गए।
उत्तर:- श्री शिव पुराण, श्री विष्णु पुराण, श्री ब्रह्म पुराण तथा श्री देवी पुराण आदि इन पुराणों का ज्ञान दाता श्री ब्रह्मा जी भगवान हैं। श्री देवी पुराण के तीसरे स्कन्ध (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित है जिसके अनुवादकर्ता श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा चिमन लाल गोस्वामी) में ब्रह्माण्ड की रचना का ज्ञान देते समय श्री ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद से कहा बेटा नारद जब मेरी उत्पति हुई तो मैं कमल के फूल पर बैठा हुआ था। मुझे नहीं पता कि मेरा उत्पति कर्ता कौन है? इस अगाध जल में मैं कैसे उत्पन्न हो गया- - - - - - ’’
श्री ब्रह्मा जी द्वारा दिया गया पुराणों का ज्ञान अधूरा है। सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि श्री ब्रह्मा जी ने ब्रह्माण्ड की रचना का ज्ञान भी देने का प्रयत्न किया है। जो संस्य युक्त तथा सुना सुनाया है जो तोड़-मरोड़ कर बताया है। क्योंकि श्री ब्रह्माजी को पूर्ण परमात्मा एक ऋषि के रूप में अग्नि ऋषि के नाम से प्रकट होकर मिले थे तथा पांचवें शवस्म (सुक्ष्म) वेद से सृष्टी रचना का ज्ञान व काल का जाल समझाया था। श्री ब्रह्मा जी ने उस ऋषि से उपदेश ग्रहण किया। परन्तु बाद में काल रूपी ब्रह्म ने श्री ब्रह्मा जी की बुद्धि बदल दी, अन्दर से प्रेरणा की कोई पांचवां वेद नहीं है केवल चार ही वेद हैं। इन्हीं का ज्ञान श्रेष्ठ है अन्य किसी की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए। तू जगत का ज्ञान दाता है तुझे किसी से ज्ञान ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। इस कारण से श्री ब्रह्मा जी ने परमेश्वर से सुने ज्ञान को सत्य न मानकर अपनी बुद्धि द्वारा काल रूपी ब्रह्म की गुप्त प्रेरणा से उसे तोड़-मरोड़ कर अपने वंशियों को बताया जो पुराणों में लिपीबद्ध है। श्री ब्रह्म जी ने अपने जन्म के पश्चात् ही सत्य घटनाओं का सत्य विवरण बताया है। जो पूर्वोक्त पुराणों में लिखा है।
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पवित्र हिन्दू धर्म के अनुयाई पुराणों के ज्ञान पर पूर्ण रूप से आश्रित हैं। इन्हीं को आधार बताकर हिन्दु धर्म के धर्म गुरु प्रजा में प्रवचन करते हैं। जिन्होंने भगवान विष्णु जी, भगवान शिवजी आदि देवों को सर्वेश्वर, अजन्मा, सृष्टी, स्थिती संहार कर्ता। सर्वशक्तिमान बताया है तथा यह भी कहा है कि श्री विष्णु जी तथा श्री शिवजी आदि के कोई माता-पिता नहीं हैं। हिन्दू धर्मगुरुओं ने यह भी दृढ़ता से कहा है कि श्री विष्णु जी व श्री शिवजी ही पूज्य हैं। इनसे अन्य कोई परमात्मा नहीं है जिस कारण से श्री शिव जी भगवान में आस्था रखने वाले श्रद्धालु श्री शिव पुराण को श्रद्धा से पढ़ते हैं तथा साथ में श्री विष्णु जी की भी साधना अवश्य करते हैं तथा पुराणों में वर्णित भक्ति विधि के अनुसार अन्य देवों का अनुष्ठान व पूजा भी करते हैं। इसी प्रकार श्री विष्णु जी में आस्था रखने वाले
श्रद्धालु श्री विष्णु पुराण को श्रद्धा से पढते हैं। इसी विष्णु पुराण में वर्णित साधना भी करते हैं, साथ में शिव जी की भी पूजा करते हैं तथा अन्य देवों की पूजा भी पुराण के अनुसार करते हैं। पवित्र गीता जी का भी पठन-पाठ्न करते हैं।
उपरोक्त दोनों प्रभुओं के भक्त श्री देवी भागवतपुराण व ब्रह्म पुराण के ज्ञान को सत्य मानते हैं। उनके अनुसार देवी पूजा तथा तीर्थ भ्रमण भी करते हैं इसके साथ-साथ लोकवेद (सुना-सुनाया ज्ञान) के आधार से पीपल, जांटी, बड़ आदि वृक्षों की पूजा, समाध-पूजा, मजार पूजा, शीतला माता आदि की पूजा भी चाव के साथ करते हैं। श्री हनुमान पूजा, भैरो पूजा, भूत पूजा, श्राद्ध क्रिया भी पूरी लगन से करते हैं। जिसे कल्याणकारी मानते हैं।
सर्व प्रथम पुराण क्या है। पुराणों की रचना किस प्रकार हुई? पुराणों पर आसक्त होकर श्रद्धालु वेदों को छोड़ कर इन्हीं पर पूर्ण रूप से आधारित हो गए।
पुराणों का ज्ञान दाता कौन है? यह जानते हैं :-
प्रश्न:- पुराणों की रचना किस कारण हुई। वेदों को छोड़ कर श्रद्धालु पुराणों पर ही किस कारण से आसक्त हो गए।
उत्तर:- श्री शिव पुराण, श्री विष्णु पुराण, श्री ब्रह्म पुराण तथा श्री देवी पुराण आदि इन पुराणों का ज्ञान दाता श्री ब्रह्मा जी भगवान हैं। श्री देवी पुराण के तीसरे स्कन्ध (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित है जिसके अनुवादकर्ता श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा चिमन लाल गोस्वामी) में ब्रह्माण्ड की रचना का ज्ञान देते समय श्री ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद से कहा बेटा नारद जब मेरी उत्पति हुई तो मैं कमल के फूल पर बैठा हुआ था। मुझे नहीं पता कि मेरा उत्पति कर्ता कौन है? इस अगाध जल में मैं कैसे उत्पन्न हो गया- - - - - - ’’
श्री ब्रह्मा जी द्वारा दिया गया पुराणों का ज्ञान अधूरा है। सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि श्री ब्रह्मा जी ने ब्रह्माण्ड की रचना का ज्ञान भी देने का प्रयत्न किया है। जो संस्य युक्त तथा सुना सुनाया है जो तोड़-मरोड़ कर बताया है। क्योंकि श्री ब्रह्माजी को पूर्ण परमात्मा एक ऋषि के रूप में अग्नि ऋषि के नाम से प्रकट होकर मिले थे तथा पांचवें शवस्म (सुक्ष्म) वेद से सृष्टी रचना का ज्ञान व काल का जाल समझाया था। श्री ब्रह्मा जी ने उस ऋषि से उपदेश ग्रहण किया। परन्तु बाद में काल रूपी ब्रह्म ने श्री ब्रह्मा जी की बुद्धि बदल दी, अन्दर से प्रेरणा की कोई पांचवां वेद नहीं है केवल चार ही वेद हैं। इन्हीं का ज्ञान श्रेष्ठ है अन्य किसी की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए। तू जगत का ज्ञान दाता है तुझे किसी से ज्ञान ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। इस कारण से श्री ब्रह्मा जी ने परमेश्वर से सुने ज्ञान को सत्य न मानकर अपनी बुद्धि द्वारा काल रूपी ब्रह्म की गुप्त प्रेरणा से उसे तोड़-मरोड़ कर अपने वंशियों को बताया जो पुराणों में लिपीबद्ध है। श्री ब्रह्म जी ने अपने जन्म के पश्चात् ही सत्य घटनाओं का सत्य विवरण बताया है। जो पूर्वोक्त पुराणों में लिखा है।
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