Thursday, 22 May 2014

उससे हमें संतुष्ट रहना सीखना चाहिए

कुछ व्यक्ति इस बात पर टिप्पणी करते है कि भगवान् ने इस श्लोक में धर्मों को छोड़ने की बात क्यों कही। भगवान् अर्जुन को तरह-तरह के मार्ग समझा रहे हैं अब अर्जुन भ्रमित हो जाता है कि वह किस पर चले; इस पर वे अर्जुन को धैर्य प्रदान करते हैं कि वो भगवान् को समर्पण कर दे। इससे उसकी अशान्त स्थिति दूर हो जाएगी। शास्त्र कहते हैं धारणात् धर्मः अर्थात् जिसे हम धारण कर सकें, वह धर्म है। धारयत् इति धर्मः अर्थात् जो हमें धारण कर सकें, वह धर्म है। इससे स्पष्ट होता है कि अर्जुन को विभिन्न प्रकार की धारणाओं, मत-मतान्तरों में ना उलझने का संकेत किया गया है। आज का प्राणी भी विभिन्न प्रकार के टोने-टोटकों, ग्रह-नक्षत्रों, पितृ-दोषों, वास्तु-शास्त्रों देवी-देवताओं, मान्यताओं में उलझ कर अपनी शान्ति खराब कर रहा है। इससे बचने का एक ही उपाय है, प्रभु का सिमरण, उनको सम्पूर्ण व उन पर विश्वास।
संतोष
जिन परिस्थितियों में भी हमें रखा गया है जो कुछ हमें दिया गया है उससे हमें संतुष्ट रहना सीखना चाहिए। इसका यह मतलब भी नहीं है कि हमें अपनी दशा सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए और इसका यह अर्थ नहीं है भाग्यवादी बनकर हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि जो कुछ है उसका होना अनिवार्य है। नहीं योग का समूचा दृष्टिकोण ही इसके विपरीत है। संतोष का अभिप्राय है- दूसरों की बराबरी करने के लिए उद्विग्नता, उत्तेजना और विक्षोभ से अभिभूत न होना। लोग दूसरों से होड़ लगाने के जोश में फंस जाते है। स्पर्धा के द्वारा सफलता की ओर आगे बढ़ने की कोशिश करते है। तो एक आध्यात्मिक जिज्ञासु से कहा गया है कि वह अपनी शक्तियों को व्यर्थ नष्ट न करें। उत्तेजना में स्वयं को खो न दे, ना कुछ उससे मिला है। उसे भगवान् के द्वारा निर्दिष्ट मान कर स्वीकार करें। श्री मां कहती है कि जो साधक इस बात में सच्चे विश्वास के साथ अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करता है कि वे भगवान् के संकल्प के द्वारा निर्दिष्ट है। उसके आध्यात्मिक विकास के लिए वे अवश्य ही सबसे अधिक अनुकूल सिद्ध होती है। अतः जब पतंजलि संतोष की बात कहते हैं तो उनका आशय यही है कि अभाव, आत्म-हीनता, और कुढ़-भावना जो सभी चीजें आत्मा को धूमिल कर देती हैं- अपने भीतर नहीं आने देना चाहिए। हमें एक प्रफुल्ल स्वभाव का निर्माण करना चहियेऋ न तो सफलताओं पर हर्षोन्मित होना चाहिए और न असफलताओं पर व्यर्थ ही खिन्न होना चाहिए। सबसे पहले शांत-अचंचल बने रहकर जीवन बिताना हमारे लिए जरूरी है। कोई भी व्यक्ति शुरू से ही संतोष की वृत्ति धारण नहीं कर सकता यह बहुत ही कठिन है पहले हमें किसी हद तक उदासीनता के भाव का विकास करना चाहिए जिसे युनानी लोगों ने तितिक्षा कहा था चाहे कुछ भी आये चला जाये, हमें धीर-स्थिर बने रहकर उसकी उपेक्षा करनी होगी। आगे चलकर यह मनोवृत्ति समता या धृत्ति में विकसित हो जाती है। जो कुछ भी होता है, उसे हम अनुद्विग्न रहकर उससे अप्रभावित रहते हुए स्वीकार करते है। यह समता स्थापित होने के बाद अगला चरण है। संतोष।
जैसा कि हम कह चुके हैं कि प्रड्डति के द्वारा, प्रारब्ध के द्वारा परिस्थितियों के द्वारा जो कुछ हमें दिया गया है उसे उदासीन भाव से चुपचाप स्वीकार करना ही नहीं अपितु प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करना ही संतोष है। यह संतोष उस चीज का बीज है, जो आगे चलकर एक अविच्छिन्न अह्लाद में अस्तित्व के आनंद में विकसित हो जाता है। जीवन के सभी सुख- दुःखों के पीछे एक हर्ष, एक परमानंद एक आट्टाद विद्यमान है। संपूर्ण सृष्टि के मूल में यही आनंद मौजूद है। हम अपनी आध्यात्मिक उपलब्धि के मुकुट मणि के रूप में इस आनंद का अनुभव कर सकते है। किन्तु उसका बीज यह संतोष ही है। यह एक वास्तविक मनःस्थिति है। जिसे स्वयं में स्वाभाविक बनाना हमें सीखना ही चाहिए।

No comments:

Post a Comment