Monday, 5 May 2014

श्री कुंडलिनि शक्ति

श्री कुंडलिनि शक्ति:- योगवेत्ताओं के अनुसार जब कुण्डलिनी जागृत हो जाती है तो शरीस्थ मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विषुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, को भेदती हुर्इ सहस्त्रार चक्र में पहुंचती है। जीव के शरीर में ये सात चक्र कहीं दादा गुरू मत्स्येन्द्रनाथ और महायोगी गोरक्षनाथ से इतर शेष सात नाथों के स्थान तो नहीं? यदि यत पिण्डे तत ब्रहमाण्डे की अवधारणा के दृषिटकोण से देखा जावे तो मानव शरीर में मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विषुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्त्रार चक्र क्रमष: उदयनाथ, सत्यनाथ, सन्तोषनाथ, अचलनाथ, गजबेली कन्थडनाथ, चौरंगीनाथ और आदिनाथ के स्थान हैं और वृहद रूप में जिस प्रकार सृषिट को संचालित करते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म रूप में जीव के नियन्ता हैं। मत्स्येन्द्रनाथ शरीस्थ सिथतियों, सिथतियों के प्रति हमारी पृवृति और व्यवहार तथा गोरक्षनाथ उक्त सभी द्वारा संचालित की जाने वाली इनिद्रयों को नियन्त्रक होकर भी उन इनिद्रयों के कि्रयाकलापों से निर्लिप्त विवेक शक्ती है। श्रीमदभगवतगीता के पांचवें अध्याय के सातवें श्लोक अनुसार योग की शाष्वत सिथति को प्राप्त योगी जिसका अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध हो गया है, जिसकी दृषिट समस्त तत्वों में अपनी छवि देखती है वह प्रकटत: कि्रया करते हुए भी अपने कमोर्ं से नहीं बन्धता। योगयुक्तो विषुद्धात्मा विजितात्मा जितेनिद्रय:, सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।
नवनाथों के स्वरूप के संबंध में विचार और चिन्तन करते हुए अनेक अनुमान उद्वेलित हुए हैं। शरीर में किसी भौतिक अंग की भांति नहीं होने पर भी चक्रों के सिथतिक्रम और उनकी ऊर्जा से नवनाथों को संबद्ध करते हुए एक ऐसा वैज्ञानिक सत्य प्रकट होता है जिसके लिये शोध किया जाकर एक पृथक ग्रन्थ लिखा जा सकता है।

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