गौ माता के बारे में
1)गाय धरती पर एकमात्र ऐसा प्राणी है
जो आक्सीजन ग्रहण करता है. साथ
ही आक्सीजन ही छोड़ता है.
2)गाय के मूत्र में पोटाशियम, सोडियम,
नाइट्रोजन, फॉस्फेट, यूरिया एवं यूरिक
असिड होता है.
3)दूध देते समय गाय में मूत्र में लाक्टोसे
की वृद्धि होती है, जो हृदय रोगों के लिए
लाभकारी है.
4)गौ माता का दूध फेट रहित परन्तु
शक्तिशाली होता है. उसे
कितना भी पीने से
मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर
रोग में भी लाभदायक होता है.
5)गौ माता के गोबर के उपले जलने से
मक्खी मछर आदि कीटाणु नहीं होते
तथा दुर्गन्ध का भी नाश होता है.
मान्यता है कि गौ के पैरों में लगी हुई
मिट्टी का तिलक करने से तीर्थ-स्नान
का पुण्य मिलता है। यानी सनातन धर्म में
गौ को दूध देने वाला एक निरा पशु न
मानकर सदा से ही उसे देवताओं
की प्रतिनिधि माना गया है।
गोमाता,
पृथ्वी की साक्षात् देवी
गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है।
यह गंगा, गायत्री, गीता, गोवर्धन और
गोविन्द की तरह पूज्य है।
शास्त्रों में कहा गया है- ‘मातर:
सर्वभूतानां गाव:’ यानी गाय समस्त
प्राणियों की माता है। इसी कारण आर्य-
संस्कृति में पनपे शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य,
जैन, बौद्ध, सिख आदि सभी धर्म-
संप्रदायों में उपासना एवं कर्मकांड
की पद्धतियों में भिन्नता होने पर भी वे
सब गौ के प्रति आदर भाव रखते हैं।
हम गाय को ‘गोमाता’ कहकर संबोधित
करते हैं। मान्यता है कि दिव्य
गुणों की स्वामिनी गौ पृथ्वी पर
साक्षात देवी के समान हैं।
सनातन धर्म के ग्रंथों में कहा गया है- ‘सर्वे
देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।’
गाय की देह में समस्त देवी-देवताओं
का वास होने से यह सर्वदेवमयी है।
मान्यता है कि जो मनुष्य प्रात: स्नान करके
गौ स्पर्श करता है, वह पापों से मुक्त
हो जाता है।
गाय के अंगों में देवी-देवताओं
का निवास
पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में
चारों वेदों का निवास हैं। उसके सींगों में
भगवान शंकर और विष्णु सदा विराजमान
रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में
ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में
इन्द्र, दोनों कानों में अश्विनीकुमार,
नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़,
जिह्वा में सरस्वती, अपान (गुदा) में सारे
तीर्थ, मूत्र-स्थान में गंगा जी, रोमकूपों में
ऋषि गण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण
पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में
महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व,
नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले
भाग में अप्सराएं स्थित हैं।
संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं और वेदों में
भी गाय की महत्ता और उसके अंग-प्रत्यंग में
दिव्य शाक्तियां होने का वर्णन
मिलता है।
गाय के गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी,
चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता,
रंभाने की आवाज़ में प्रजापति और थनों में
समुद्र प्रतिष्ठित हैं।
1)गाय धरती पर एकमात्र ऐसा प्राणी है
जो आक्सीजन ग्रहण करता है. साथ
ही आक्सीजन ही छोड़ता है.
2)गाय के मूत्र में पोटाशियम, सोडियम,
नाइट्रोजन, फॉस्फेट, यूरिया एवं यूरिक
असिड होता है.
3)दूध देते समय गाय में मूत्र में लाक्टोसे
की वृद्धि होती है, जो हृदय रोगों के लिए
लाभकारी है.
4)गौ माता का दूध फेट रहित परन्तु
शक्तिशाली होता है. उसे
कितना भी पीने से
मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर
रोग में भी लाभदायक होता है.
5)गौ माता के गोबर के उपले जलने से
मक्खी मछर आदि कीटाणु नहीं होते
तथा दुर्गन्ध का भी नाश होता है.
मान्यता है कि गौ के पैरों में लगी हुई
मिट्टी का तिलक करने से तीर्थ-स्नान
का पुण्य मिलता है। यानी सनातन धर्म में
गौ को दूध देने वाला एक निरा पशु न
मानकर सदा से ही उसे देवताओं
की प्रतिनिधि माना गया है।
गोमाता,
पृथ्वी की साक्षात् देवी
गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है।
यह गंगा, गायत्री, गीता, गोवर्धन और
गोविन्द की तरह पूज्य है।
शास्त्रों में कहा गया है- ‘मातर:
सर्वभूतानां गाव:’ यानी गाय समस्त
प्राणियों की माता है। इसी कारण आर्य-
संस्कृति में पनपे शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य,
जैन, बौद्ध, सिख आदि सभी धर्म-
संप्रदायों में उपासना एवं कर्मकांड
की पद्धतियों में भिन्नता होने पर भी वे
सब गौ के प्रति आदर भाव रखते हैं।
हम गाय को ‘गोमाता’ कहकर संबोधित
करते हैं। मान्यता है कि दिव्य
गुणों की स्वामिनी गौ पृथ्वी पर
साक्षात देवी के समान हैं।
सनातन धर्म के ग्रंथों में कहा गया है- ‘सर्वे
देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।’
गाय की देह में समस्त देवी-देवताओं
का वास होने से यह सर्वदेवमयी है।
मान्यता है कि जो मनुष्य प्रात: स्नान करके
गौ स्पर्श करता है, वह पापों से मुक्त
हो जाता है।
गाय के अंगों में देवी-देवताओं
का निवास
पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में
चारों वेदों का निवास हैं। उसके सींगों में
भगवान शंकर और विष्णु सदा विराजमान
रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में
ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में
इन्द्र, दोनों कानों में अश्विनीकुमार,
नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़,
जिह्वा में सरस्वती, अपान (गुदा) में सारे
तीर्थ, मूत्र-स्थान में गंगा जी, रोमकूपों में
ऋषि गण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण
पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में
महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व,
नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले
भाग में अप्सराएं स्थित हैं।
संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं और वेदों में
भी गाय की महत्ता और उसके अंग-प्रत्यंग में
दिव्य शाक्तियां होने का वर्णन
मिलता है।
गाय के गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी,
चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता,
रंभाने की आवाज़ में प्रजापति और थनों में
समुद्र प्रतिष्ठित हैं।
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