दो शब्द क्रिया -योग पर
जब हम योग शब्द के अर्थ पर विचार करते हैं,
तो इसके मुख्यतः दो अर्थ निकलते हैं, प्रथम
जीव और ईश्वर या आत्मा और
परमात्मा का मिलन, अर्थात अद्वैत होने
की अनुभूति, दूसरा, अभ्यास व वैराग्य के
द्वारा चित्तवृतियों को एकाग्र कर
समाधी की स्थिती में पहुँच कर परम
पिता परमेश्वर से एकाकार होना . जैसा की योग
शब्द का शाब्दिक अर्थ ऊपर
लिखा जा चूका है, की आत्मा जिस मार्ग पर
चल कर परमात्मा का दर्शन लाभ करता है उस
मार्ग को क्रिया योग कहते हैं, अथवा यों कहें
कि चित्तवृतियों के विकारों को दूर कर के
अपने अभीष्ट और अंतिम लक्ष्य
परमात्मा के साथ एकाकार होने की क्रिया को
क्रिया योग कहते हैं. जब कि आज कल शरीर
को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया व्यायाम
को ही योग नाम दे दिया गया है, व्यायाम
सम्पूर्ण योग नहीं है, यह मात्र सम्पूर्ण योग
का एक अन्श या पक्ष मात्र है .
परमात्मा के साक्षात्कार के अनेक
साधनात्मक मार्ग हैं, उन सभी के साथ भी योग
नाम जुड़ गया है. इस प्रकार प्राचीन काल से
ही योग कि अनेक शाखायें प्रचलित हैं उनमे से
कुछ निम्न हैं :-
(1 )क्रिया योग (2) राज योग (3) हठ योग (4)
जप योग (5) लय योग (6) मन्त्र योग (7)
शब्द योग (8) ज्ञान योग (9) कर्म योग (10)
भक्ति योग (11) प्राण योग (12) हंस योग
(13) तंत्र योग (14) स्वर योग (15) शिव योग
(16) भृगु योग (17) ध्यान योग. … इत्यादी-
इत्यादी.
क्रिया योग को व्यावहारिक व सरल इस लिए
भी कहते हैं, कि इसमें जो भी विषय वस्तु बताई
व सिखाई जाती है उसकी प्रत्यक्ष
अनुभूति साधक कर सकतें हैं. इसी कारण
क्रिया योग को सर्वोच्च माना गया है,
क्रिया योग कि इन्ही विशिष्टताओं को देख
हम कह सकते हैं कि यह कोई चमत्कार
नहीं मात्र एक विज्ञान है, जो विज्ञान
की धरातल पर प्रमाणित है. हमारे ऋषियों,
महयोगियों न भारत कि इस अनमोल धरोहर
क्रिया योग को आज भी बचा कर रखा है
जिसकी महत्ता आज के वैज्ञानिक
भी स्वीकार करते हैं.
हजारो वर्षो से योग बल से सशरीर उपस्थित
कालजयी, इतिहास पुरुष महायोगी महावतर
बाबा ने क्रियायोग विज्ञान को अपने योग्य
शिष्यों के माध्यम से समस्त विश्व
को अवगत कराया, महावतर बाबा व उनके
शिष्यों जिन्होंने इतिहास रच दिया व इतिहास
पुरुष बन गए, उनके सम्बन्ध में कुछ
लिखना सूरज को दीपक दिखाने के समान
होगा .
पुरुष (आत्मा) सदैव दुखों से मुक्ति का प्रयास
करता रहता है, अर्थात यह सिद्ध हुआ
कि दुःख आत्मा का निज स्वरूप नहीं है, दुःख
आत्मा का धेय नहीं. आत्मा सुद्ध निर्मल
स्वरुप है जो दुखो से मुक्ति के लिये ज्ञान
प्राप्ति की खोज निरंतर करती रहती है. ज्ञान,
दुखों से मुक्ति का कारण है, इसके विषय में हम
यह कह सकते हैं, हमें ज्ञान कि प्राप्ति पांच
प्रकार से होती है, पहला ज्ञान हमारे माता-
पिता देतें हैं, अर्थात पहले गुरु हमारे माता-
पिता हुए, दूसरा ज्ञान अच्छी पुस्तके देती हैं,
अर्थात दूसरी गुरु पुस्तके होती हैं,
तीसरा ज्ञान हमें हमारा वास्तविक गुरु देतें हैं,
चाहे वह अध्यात्मिक हो या व्यवहारिक,
चौथा ज्ञान हमारा अनुभव होता है, जिसे
प्रतिदिन हम अनुभव जनित ज्ञान के रूप में
प्राप्त करते रहते हैं, पांचवा ज्ञान हमें ध्यान
“समाधी” कि स्थिती में प्राप्त होता है,
समाधी कि अवस्था में आत्मा का परमात्मा से
साक्षात्कार होता है, अर्थात आत्मा और
परमात्मा का मिलन होता है और जब
ऐसा होता है तब जानने, समझने के लिए कुछ
शेष नहीं बचता-नहीं बचता क्यूँ कि,
परमात्मा अपना निज स्वरुप स्वयं प्रकट कर
देता है, और जब ऐसा होता है तो जानने के लिए
कुछ शेष बचा नहीं रहता, क्यूँ कि समस्त
ब्रह्माण्ड के जनक परमात्मा के आगे कुछ
नहीं है. सदैव हमें प्रयाश करना चाहिये
कि उपरोक्त पांचो प्रकार का ज्ञान हमारे
जीवन में रहें.
महाविस्फोट (Big-Bang) की धारणा पर
विचार करें तो समस्त अणु एक पिंड से अलग
हो अपनी यात्रा क्रम में वर्तमान ब्रह्माण्ड
की शक्ल धारण कर अस्तित्व में हैं. इन्ही अणु
से निर्मित हम जीवों ने भी अपने क्रमिक
विकास कि यात्रा को वर्तमान तक सम्पूर्ण
की है, चार्ल्स डार्विन का क्रमिक विकाश
का सिद्धांत भी यही प्रतिपादित करता है.
अतः यह सुनिश्चित हुआ कि महाविस्फोट से
आज तक की यात्रा की समस्त अनुभूतियाँ/
स्मृतियाँ हमारे मस्तिक में समाहित है . जब एक
क्रिया योगी ध्यान व समाधी की अवस्था में
जा कर अपने अवचेतन मस्तिस्क
की गहराइयों में पड़ी इन सुसुप्त स्मृतियों/
अनुभूतियों को चैतन्य कर लेता है तो योगी के
लिए कुछ भी अज्ञेय नहीं रह जाता, योगी इस
सृष्टी के गोपनीय रहस्यों से परिचित
हो जाता है, वह इसके आदि और अंत
का ज्ञाता हो अर्थात उसके दिव्य चक्षु खुल
जाते हैं. और वह त्रिकालदर्शी हो जाता है.
(svetasvatara upanishad 2.12)
जब पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश प्रकट
होतें है, अर्थात पांच तत्वों का जय हो जाता है,
तब फिर न योगी के लिए रोग है, न जरा है, न
दुःख है, क्यूँ कि उसने वह शारीर पा लिया है,
जो योग की अग्नि से बना है.
पास्चात्य मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने
कहा है, कि सामान्य मनुष्य अपने मस्तिष्क
का मात्र ३ से ४ प्रतिशत ही उपयोग करता है,
शेष मस्तिष्क सुसुप्ताता कि अवस्था में
निष्क्रिय रहता है, एक क्रिया योगी अपनी
योग साधना से अपने उस सुसुप्त –निष्क्रिय
पड़े मस्तिस्क को जागृत कर
परमपिता परमेश्वर की समस्त
लीला का साक्षात्कार कर परमात्मा से
एकाकार हो जाता है.
सनातन धर्म के साथ ही अनेक अन्य धर्म
भी कर्म फल का सिद्धांत स्वीकार करते हैं,
कि हम जो भी कर्म करते हैं उस किये गए कर्म
का कर्म फल अवस्य मिलता है, हर दुःख व
सुख रुपी कार्य का एक कारण होता है, और
कारण सदैव भूतकाल में निर्मित होता है. वह
भूत काल चाहे इस जीवन का हो या विगत
जीवन का. यह सिद्धांत प्रमाणित है. आज हम
जैसा भी जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसके कारण
के निर्माता हम खुद हैं, अपने वर्तमान जीवन
का निर्माण भूतकाल में हमने
ही कभी किया है.सिगमंड फ्रायड ने यह विचार
प्रकट किया है कि मनुष्य जो भी अच्छे व बुरे
कर्म करता है वह उसके अवचेतन मस्तिस्क में
चली जाती है, अर्थात दर्ज हो जाती है, और
फिर अवचेतन मन में दर्ज हुए कर्म रुपी वह
संस्कार भविष्य के जीवन को नियंत्रित करते
है. इस विचार से यह सिद्ध होता है कि हम
अपने भविष्य के निर्माता स्वयं है, तथा हम
अपना जन्म व पुनर्जन्म स्वतः चुनते हैं .
उपरोक्त कारणों के कारण ही भारतीय
ऋषियों, महयोगियों ने नियमित, सयंमित व
साधनात्मक जीवन जीने, एवम् आत्म विकास
के लिए विभिन्य
साधना पद्दतियों को विकसित किया,
जो समस्त संसार के लिए सुलभ है.
क्रिया योगी अपने जीवन को अभ्यास व
साधना मार्ग पर अग्रसर कर निरंतर अभ्यास
द्वारा समाधी कि अवस्था में पहुँच कर
अवचेतन मन में जन्म जन्मान्तरो के दर्ज
अच्छे-बुरे कर्म रुपी संस्कार को मिटा कर,
स्वयं को कर्म फल के बंधन से मुक्त कर
लेता है, अर्थात पुर्णतः समाप्त कर देता है.
और जब कोई संस्कार ही शेष नहीं बचते,
तो कार्य के होने का कारण ही शेष नहीं बचता.
अर्थात आत्मा का अंतिम लक्ष्य दुखों से
निवृति , अर्थात मोक्ष कि प्राप्ति होती है,
और दुःख रुपी संसार में आवागमन से
मुक्ति मिल जाती है. इसी लिए हमारे ऋषि व
महयोगियों के द्वारा प्रणीत इस
विधा क्रिया योग कि महत्ता को आधुनिक
वैज्ञानिको ने भी स्वीकारा है.
भारत का प्राचीन काल से आत्म ज्ञान से
परिपूर्ण गौरवशाली इतिहास रहा है,
यंहा जीवन के मूलभूत प्रश्न पर हमारे ऋषि,
महयोगियों रुपी वैज्ञानिको ने
अपनी तपस्या व शोध से ऐसे
सिद्धांतो का प्रतिपादन किया, तथा समस्त
विश्व समुदाय के समक्ष रखा जिसे अपना कर
समस्त विश्व अपना आत्म कल्याण कर
सकता है.
सदियों की दासता,प्रताड़ना तथा मिटा देने
कि कोशिश के बावजूद, आज
हमारी जो विरासत बची हुई है, उसकी तरफ
समस्त विश्व देख रहा है. भारत
की भूमि कभी भी ऋषियों,महयोगियों तथा समस्त
मानव समाज का काया कल्प कर देने वाले
ज्ञानियों से रिक्त नहीं रहा है. यह भूमि हर
सताब्दी में एक अम्बर का पैगाम देने वाले
पैगम्बर अर्थात “ईश्वरीय ज्ञान देने
वाला युग महापुरुष, इश्वर दूत” उत्त्पन्न
करती है.
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थ्सनमधर्मस्य तदात्मानं
सृजाम्यहम्।। (भगवद्गीता.4.7)
जब जब धर्म की हानि होने लगती है और
अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं
की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं ।
सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और
धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न
युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
भारतीय सनातन धर्म, चार वेदों, 108-
उपनिषदों, 18-पुराणों और 12-दर्शन पर
आधारित है, अनेक मान्यतायें सिर्फ एक
दर्शन का समर्थन करते हैं, परंतू भारत
की भूमि कि आधारशिला 12-दर्शनों पर
आधारित है, 6 दर्शन आस्तिक व 6 दर्शन
नास्तिक. यह भूमि घोर नास्तिक चार्वाक
दर्शन को भी अंगीकृत करती है, क्यूँ
कि सनातन धर्म
सबकी विचारधारा को आत्मसात
कर सभी का सम्मान करता है. इसके बाद
भी सनातन धर्म नेति-नेति कहता है. अर्थात
यही इति नहीं है, इसके आगे और भी बहूत कुछ
जानने के लिये शेष है, क्यूँ कि परमात्मा अनन्त
है. परमात्मा की बनायीं सृष्टि भी अनन्त है .
मनुष्य तभी तक सामान्य है जब तक वह
प्रकृति के ऊपर विजय नहीं प्राप्त कर
लेता,या प्रकृति से ऊपर नहीं उठ जाता, इस
प्रकृति के अन्दर केवल वे ही नियम लागू
नहीं होते, जो हमारी परमाणुविक
सरंचना को नियंत्रित करते हैं, बल्कि इनमे ऐसे
सूक्ष्म नियम भी है जो दिखाई देने
वाली प्रकृति को संचालित करने
वाली अन्तःस्चेतन प्रकृति को भी संचालित
करते है. दृष्ट संसार को जीतना आसान होता है,
परंतू आन्तरिक संसार को जीतना परम
पुरुषार्थ कहलाता है. यह परम पुरुषार्थ हमें
क्रियायोग की साधना व अभ्यास प्रदान
करता है .
हमारा बाहरी संसार जितना विचित्र एवं
विशिष्ट है, उतना ही रहस्यमय व अलौकिक
दृष्टी संपन्न हमारा अंतर्जगत है. इस
अलौकिक रहस्य कि दुनिया में यात्रा करने के
लिए, व यह जानने के लिए कि आज हम ऐसे
क्यूँ हैं ? इसका कारण क्या है ? हमारा अंतिम
लक्ष्य क्या है? तथा पांच प्रकार के दुखो १,
अविद्या २, अस्मिता ३, राग ४, द्वेष तथा ५,
अभिनिवेश जो सारे दुखों के कारण हैं, से
मुक्ति के लिए आइये क्रिया योग
को अपना वाहन बनायें और अपने लौकिक
जीवन के व्यस्त समय से कुछ समय अपने
उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निकालें
जो हमारा अंतिम ध्येय व लक्ष्य है..
अर्थात ..भोग नहीं भोगे गये (भोगो को हमने
नहीं भोगा), किन्तु हमी भोगे गये; तप
नहीं तपे ,हमी तप गये; समय नहीं बीता,किन्तु
हम ही बीत गये,तृष्णा जीर्ण नहीं हुई ,किन्तु
हम ही जीर्ण हो गये:
एक साधक कि कलम स
जब हम योग शब्द के अर्थ पर विचार करते हैं,
तो इसके मुख्यतः दो अर्थ निकलते हैं, प्रथम
जीव और ईश्वर या आत्मा और
परमात्मा का मिलन, अर्थात अद्वैत होने
की अनुभूति, दूसरा, अभ्यास व वैराग्य के
द्वारा चित्तवृतियों को एकाग्र कर
समाधी की स्थिती में पहुँच कर परम
पिता परमेश्वर से एकाकार होना . जैसा की योग
शब्द का शाब्दिक अर्थ ऊपर
लिखा जा चूका है, की आत्मा जिस मार्ग पर
चल कर परमात्मा का दर्शन लाभ करता है उस
मार्ग को क्रिया योग कहते हैं, अथवा यों कहें
कि चित्तवृतियों के विकारों को दूर कर के
अपने अभीष्ट और अंतिम लक्ष्य
परमात्मा के साथ एकाकार होने की क्रिया को
क्रिया योग कहते हैं. जब कि आज कल शरीर
को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया व्यायाम
को ही योग नाम दे दिया गया है, व्यायाम
सम्पूर्ण योग नहीं है, यह मात्र सम्पूर्ण योग
का एक अन्श या पक्ष मात्र है .
परमात्मा के साक्षात्कार के अनेक
साधनात्मक मार्ग हैं, उन सभी के साथ भी योग
नाम जुड़ गया है. इस प्रकार प्राचीन काल से
ही योग कि अनेक शाखायें प्रचलित हैं उनमे से
कुछ निम्न हैं :-
(1 )क्रिया योग (2) राज योग (3) हठ योग (4)
जप योग (5) लय योग (6) मन्त्र योग (7)
शब्द योग (8) ज्ञान योग (9) कर्म योग (10)
भक्ति योग (11) प्राण योग (12) हंस योग
(13) तंत्र योग (14) स्वर योग (15) शिव योग
(16) भृगु योग (17) ध्यान योग. … इत्यादी-
इत्यादी.
क्रिया योग को व्यावहारिक व सरल इस लिए
भी कहते हैं, कि इसमें जो भी विषय वस्तु बताई
व सिखाई जाती है उसकी प्रत्यक्ष
अनुभूति साधक कर सकतें हैं. इसी कारण
क्रिया योग को सर्वोच्च माना गया है,
क्रिया योग कि इन्ही विशिष्टताओं को देख
हम कह सकते हैं कि यह कोई चमत्कार
नहीं मात्र एक विज्ञान है, जो विज्ञान
की धरातल पर प्रमाणित है. हमारे ऋषियों,
महयोगियों न भारत कि इस अनमोल धरोहर
क्रिया योग को आज भी बचा कर रखा है
जिसकी महत्ता आज के वैज्ञानिक
भी स्वीकार करते हैं.
हजारो वर्षो से योग बल से सशरीर उपस्थित
कालजयी, इतिहास पुरुष महायोगी महावतर
बाबा ने क्रियायोग विज्ञान को अपने योग्य
शिष्यों के माध्यम से समस्त विश्व
को अवगत कराया, महावतर बाबा व उनके
शिष्यों जिन्होंने इतिहास रच दिया व इतिहास
पुरुष बन गए, उनके सम्बन्ध में कुछ
लिखना सूरज को दीपक दिखाने के समान
होगा .
पुरुष (आत्मा) सदैव दुखों से मुक्ति का प्रयास
करता रहता है, अर्थात यह सिद्ध हुआ
कि दुःख आत्मा का निज स्वरूप नहीं है, दुःख
आत्मा का धेय नहीं. आत्मा सुद्ध निर्मल
स्वरुप है जो दुखो से मुक्ति के लिये ज्ञान
प्राप्ति की खोज निरंतर करती रहती है. ज्ञान,
दुखों से मुक्ति का कारण है, इसके विषय में हम
यह कह सकते हैं, हमें ज्ञान कि प्राप्ति पांच
प्रकार से होती है, पहला ज्ञान हमारे माता-
पिता देतें हैं, अर्थात पहले गुरु हमारे माता-
पिता हुए, दूसरा ज्ञान अच्छी पुस्तके देती हैं,
अर्थात दूसरी गुरु पुस्तके होती हैं,
तीसरा ज्ञान हमें हमारा वास्तविक गुरु देतें हैं,
चाहे वह अध्यात्मिक हो या व्यवहारिक,
चौथा ज्ञान हमारा अनुभव होता है, जिसे
प्रतिदिन हम अनुभव जनित ज्ञान के रूप में
प्राप्त करते रहते हैं, पांचवा ज्ञान हमें ध्यान
“समाधी” कि स्थिती में प्राप्त होता है,
समाधी कि अवस्था में आत्मा का परमात्मा से
साक्षात्कार होता है, अर्थात आत्मा और
परमात्मा का मिलन होता है और जब
ऐसा होता है तब जानने, समझने के लिए कुछ
शेष नहीं बचता-नहीं बचता क्यूँ कि,
परमात्मा अपना निज स्वरुप स्वयं प्रकट कर
देता है, और जब ऐसा होता है तो जानने के लिए
कुछ शेष बचा नहीं रहता, क्यूँ कि समस्त
ब्रह्माण्ड के जनक परमात्मा के आगे कुछ
नहीं है. सदैव हमें प्रयाश करना चाहिये
कि उपरोक्त पांचो प्रकार का ज्ञान हमारे
जीवन में रहें.
महाविस्फोट (Big-Bang) की धारणा पर
विचार करें तो समस्त अणु एक पिंड से अलग
हो अपनी यात्रा क्रम में वर्तमान ब्रह्माण्ड
की शक्ल धारण कर अस्तित्व में हैं. इन्ही अणु
से निर्मित हम जीवों ने भी अपने क्रमिक
विकास कि यात्रा को वर्तमान तक सम्पूर्ण
की है, चार्ल्स डार्विन का क्रमिक विकाश
का सिद्धांत भी यही प्रतिपादित करता है.
अतः यह सुनिश्चित हुआ कि महाविस्फोट से
आज तक की यात्रा की समस्त अनुभूतियाँ/
स्मृतियाँ हमारे मस्तिक में समाहित है . जब एक
क्रिया योगी ध्यान व समाधी की अवस्था में
जा कर अपने अवचेतन मस्तिस्क
की गहराइयों में पड़ी इन सुसुप्त स्मृतियों/
अनुभूतियों को चैतन्य कर लेता है तो योगी के
लिए कुछ भी अज्ञेय नहीं रह जाता, योगी इस
सृष्टी के गोपनीय रहस्यों से परिचित
हो जाता है, वह इसके आदि और अंत
का ज्ञाता हो अर्थात उसके दिव्य चक्षु खुल
जाते हैं. और वह त्रिकालदर्शी हो जाता है.
(svetasvatara upanishad 2.12)
जब पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश प्रकट
होतें है, अर्थात पांच तत्वों का जय हो जाता है,
तब फिर न योगी के लिए रोग है, न जरा है, न
दुःख है, क्यूँ कि उसने वह शारीर पा लिया है,
जो योग की अग्नि से बना है.
पास्चात्य मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने
कहा है, कि सामान्य मनुष्य अपने मस्तिष्क
का मात्र ३ से ४ प्रतिशत ही उपयोग करता है,
शेष मस्तिष्क सुसुप्ताता कि अवस्था में
निष्क्रिय रहता है, एक क्रिया योगी अपनी
योग साधना से अपने उस सुसुप्त –निष्क्रिय
पड़े मस्तिस्क को जागृत कर
परमपिता परमेश्वर की समस्त
लीला का साक्षात्कार कर परमात्मा से
एकाकार हो जाता है.
सनातन धर्म के साथ ही अनेक अन्य धर्म
भी कर्म फल का सिद्धांत स्वीकार करते हैं,
कि हम जो भी कर्म करते हैं उस किये गए कर्म
का कर्म फल अवस्य मिलता है, हर दुःख व
सुख रुपी कार्य का एक कारण होता है, और
कारण सदैव भूतकाल में निर्मित होता है. वह
भूत काल चाहे इस जीवन का हो या विगत
जीवन का. यह सिद्धांत प्रमाणित है. आज हम
जैसा भी जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसके कारण
के निर्माता हम खुद हैं, अपने वर्तमान जीवन
का निर्माण भूतकाल में हमने
ही कभी किया है.सिगमंड फ्रायड ने यह विचार
प्रकट किया है कि मनुष्य जो भी अच्छे व बुरे
कर्म करता है वह उसके अवचेतन मस्तिस्क में
चली जाती है, अर्थात दर्ज हो जाती है, और
फिर अवचेतन मन में दर्ज हुए कर्म रुपी वह
संस्कार भविष्य के जीवन को नियंत्रित करते
है. इस विचार से यह सिद्ध होता है कि हम
अपने भविष्य के निर्माता स्वयं है, तथा हम
अपना जन्म व पुनर्जन्म स्वतः चुनते हैं .
उपरोक्त कारणों के कारण ही भारतीय
ऋषियों, महयोगियों ने नियमित, सयंमित व
साधनात्मक जीवन जीने, एवम् आत्म विकास
के लिए विभिन्य
साधना पद्दतियों को विकसित किया,
जो समस्त संसार के लिए सुलभ है.
क्रिया योगी अपने जीवन को अभ्यास व
साधना मार्ग पर अग्रसर कर निरंतर अभ्यास
द्वारा समाधी कि अवस्था में पहुँच कर
अवचेतन मन में जन्म जन्मान्तरो के दर्ज
अच्छे-बुरे कर्म रुपी संस्कार को मिटा कर,
स्वयं को कर्म फल के बंधन से मुक्त कर
लेता है, अर्थात पुर्णतः समाप्त कर देता है.
और जब कोई संस्कार ही शेष नहीं बचते,
तो कार्य के होने का कारण ही शेष नहीं बचता.
अर्थात आत्मा का अंतिम लक्ष्य दुखों से
निवृति , अर्थात मोक्ष कि प्राप्ति होती है,
और दुःख रुपी संसार में आवागमन से
मुक्ति मिल जाती है. इसी लिए हमारे ऋषि व
महयोगियों के द्वारा प्रणीत इस
विधा क्रिया योग कि महत्ता को आधुनिक
वैज्ञानिको ने भी स्वीकारा है.
भारत का प्राचीन काल से आत्म ज्ञान से
परिपूर्ण गौरवशाली इतिहास रहा है,
यंहा जीवन के मूलभूत प्रश्न पर हमारे ऋषि,
महयोगियों रुपी वैज्ञानिको ने
अपनी तपस्या व शोध से ऐसे
सिद्धांतो का प्रतिपादन किया, तथा समस्त
विश्व समुदाय के समक्ष रखा जिसे अपना कर
समस्त विश्व अपना आत्म कल्याण कर
सकता है.
सदियों की दासता,प्रताड़ना तथा मिटा देने
कि कोशिश के बावजूद, आज
हमारी जो विरासत बची हुई है, उसकी तरफ
समस्त विश्व देख रहा है. भारत
की भूमि कभी भी ऋषियों,महयोगियों तथा समस्त
मानव समाज का काया कल्प कर देने वाले
ज्ञानियों से रिक्त नहीं रहा है. यह भूमि हर
सताब्दी में एक अम्बर का पैगाम देने वाले
पैगम्बर अर्थात “ईश्वरीय ज्ञान देने
वाला युग महापुरुष, इश्वर दूत” उत्त्पन्न
करती है.
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थ्सनमधर्मस्य तदात्मानं
सृजाम्यहम्।। (भगवद्गीता.4.7)
जब जब धर्म की हानि होने लगती है और
अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं
की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं ।
सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और
धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न
युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
भारतीय सनातन धर्म, चार वेदों, 108-
उपनिषदों, 18-पुराणों और 12-दर्शन पर
आधारित है, अनेक मान्यतायें सिर्फ एक
दर्शन का समर्थन करते हैं, परंतू भारत
की भूमि कि आधारशिला 12-दर्शनों पर
आधारित है, 6 दर्शन आस्तिक व 6 दर्शन
नास्तिक. यह भूमि घोर नास्तिक चार्वाक
दर्शन को भी अंगीकृत करती है, क्यूँ
कि सनातन धर्म
सबकी विचारधारा को आत्मसात
कर सभी का सम्मान करता है. इसके बाद
भी सनातन धर्म नेति-नेति कहता है. अर्थात
यही इति नहीं है, इसके आगे और भी बहूत कुछ
जानने के लिये शेष है, क्यूँ कि परमात्मा अनन्त
है. परमात्मा की बनायीं सृष्टि भी अनन्त है .
मनुष्य तभी तक सामान्य है जब तक वह
प्रकृति के ऊपर विजय नहीं प्राप्त कर
लेता,या प्रकृति से ऊपर नहीं उठ जाता, इस
प्रकृति के अन्दर केवल वे ही नियम लागू
नहीं होते, जो हमारी परमाणुविक
सरंचना को नियंत्रित करते हैं, बल्कि इनमे ऐसे
सूक्ष्म नियम भी है जो दिखाई देने
वाली प्रकृति को संचालित करने
वाली अन्तःस्चेतन प्रकृति को भी संचालित
करते है. दृष्ट संसार को जीतना आसान होता है,
परंतू आन्तरिक संसार को जीतना परम
पुरुषार्थ कहलाता है. यह परम पुरुषार्थ हमें
क्रियायोग की साधना व अभ्यास प्रदान
करता है .
हमारा बाहरी संसार जितना विचित्र एवं
विशिष्ट है, उतना ही रहस्यमय व अलौकिक
दृष्टी संपन्न हमारा अंतर्जगत है. इस
अलौकिक रहस्य कि दुनिया में यात्रा करने के
लिए, व यह जानने के लिए कि आज हम ऐसे
क्यूँ हैं ? इसका कारण क्या है ? हमारा अंतिम
लक्ष्य क्या है? तथा पांच प्रकार के दुखो १,
अविद्या २, अस्मिता ३, राग ४, द्वेष तथा ५,
अभिनिवेश जो सारे दुखों के कारण हैं, से
मुक्ति के लिए आइये क्रिया योग
को अपना वाहन बनायें और अपने लौकिक
जीवन के व्यस्त समय से कुछ समय अपने
उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निकालें
जो हमारा अंतिम ध्येय व लक्ष्य है..
अर्थात ..भोग नहीं भोगे गये (भोगो को हमने
नहीं भोगा), किन्तु हमी भोगे गये; तप
नहीं तपे ,हमी तप गये; समय नहीं बीता,किन्तु
हम ही बीत गये,तृष्णा जीर्ण नहीं हुई ,किन्तु
हम ही जीर्ण हो गये:
एक साधक कि कलम स
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