Tuesday, 6 May 2014

तब उस अभिमानी ने माना कि भगवान् ही सबका पालक है।

एक राजा को बहुत अभिमान था कि मै राजा हूँ तो सम्पूर्ण जगत का मै ही पालक हूँ, मनु आदि शास्त्रकारों ने व्यर्थ भगवान् विष्णु को जगत पालक कहकर शास्त्रो में लिख दिया है।
एक बार एक संन्यासी शहर के बाहर एक पेड़ के नीचे आ बैठे । लोग उसके ज्ञान की बातो को सुन ने के लिए वहा आने लगे। राजा भी वहा गया और कहने लगा ," मै ही सब लोगो का पालक हूँ ". संन्यासी ने कहा ,"अच्छा तो ये बता तेरे राज्य में कितने कौए कुत्ते और मकौड़े है। "
राजा चुप हो गया। संन्यासी ने कहा ," जब तुझे ये भी नहीं मालुम तो उनको भोजन कैसे भेजेगा??"
राजा ने कहा" तो अच्छा भगवान् करते है ये सब काम है न पर मै नहीं मानता आप ही समझाए। अच्छा तो ये बताये कि इस कीड़े को भी भोजन भगवान् ही देते है ?"
संन्यासी ने कहा," हाँ "
तो राजा ने कहा," ठीक है मै इसे डिबिया में बंद कर देता हूँ देखता हूँ इसे भोजन कैसे मिलता है" और राजा ने उस कीड़े को खुद डिबिया में बंद कर दिया।
दूसरे दिन राजा ने संत के पास जाकर वो डिबिया खोली तो उसमे कीड़ा चावल का दाना खा रहा था वह चावल तो डिबिया बंद करते वक्त राजा के मस्तक से गिर पड़ा था। तब उस अभिमानी ने माना कि भगवान् ही सबका पालक है।
परिजनो के प्रति अपने दायित्वो का निर्वाह करते वक्त हमें कभी अहंकार नहीं करना चाहिए कि हम उनका पालन करते है वस्तुतः . सबका पालक और रक्षक तो भगवान् ही है।

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