Tuesday, 6 May 2014

सचमुच ही यह कितना आश्चर्यजनक है,

**जीवन~मृत्यु**
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सचमुच ही यह कितना आश्चर्यजनक है, हम सब भली-भाँति जानते है कि हमें एक दिन मर जाना है फिर भी हमारी लक्ष्यहीन एवँ अंतहीन दौड़ जारी है जैसे हमें तो यहीं रहना है हमेशा-हमेशा के लिए .... कहीं से भी विचार करना शुरू करें, मृत्यु पर विचार हमें एक ही जगह ले आता है :~~
जीवन का अंत .... !!
हम सब भलीभांति जानते हैं कि हममें से हरेक की मृत्यु यकीनी है, हमारे जीवन की पूर्णाहुति है तथा हमारे होने की नियति है फिर भी उसे बरसों-बरस भुलाये रहते हैं .... हम भूले रहते हैं कि हम दरअसल उस मंजिल की तरफ क्रमशः बढ़ रहे हैं जिसका कोई विकल्प भी नहीं और चुनाव की स्वतंत्रता भी नहीं है .... हम इस भ्रम में जीते हैं और जीते रहना चाहते हैं कि यह भयावह सच्चाई हमें और हमारे अपनों को छोड़ शेष दुनिया के लिए ही लागू है .... बस यही इस सच्चाई की खूबसूरती है और यूँ लक्ष्यहीन दौड़ते रहने का अभिशाप भी .... कितनी अजीब बात है कि हम लगातार मौत के साए में जीते हैं लेकिन उससे लगातार बहुत दूर होने का भ्रम भी पाले रहते हैं .... भौतिकता में आकंठ डूबे प्राणियों तक "शायद" मौत का विचार पहुँचता ही नहीं लेकिन जब भी कभी खुद के "नश्वर" होने की चेतना जागती है, यही वो बिंदु होता है जहाँ से आध्यात्मिकता हमारे जीवन में दस्तक देती अथवा प्रवेश करती है और अंतरात्मा के भीतर से यह सवाल उठता है कि इस फानी दुनिया और इस नश्वर जीवन का हमारे लिए मतलब आखिर क्या है और यदि यह सब छलावा अथवा झूठ है तब फिर सत्य क्या है :~~
सत्य ही प्रेम है और प्रेम ही सत्य है क्योंकि सत्य एवँ प्रेम दोनों ही प्राकृतिक अथवा मौलिक अनुभूतियाँ हैं और प्रकृति ईश्वर का ही दूसरा रूप है .... दरअसल जीवन-मृत्यु, प्रकृति, प्रेम और सत्य परस्पर अनुपूरक नहीं अपितु पर्यायवाची हैं एवँ ईश्वर के ही विभिन्न आयाम हैं :~~
प्रेम ही जीवन है और घृणा ही मृत्यु. 
धर्म ही जीवन है और अधर्म ही मृत्यु. 
त्याग ही जीवन है और मोह ही मृत्यु.
हँसना ही जीवन है और क्रंदन है मृत्यु.
जीवन एक तथ्य है और सत्य है मृत्यु.
अहिंसा ही जीवन है और हिंसा ही मृत्यु.
चेतन ही जीवन है और अचेतन ही मृत्यु.
दोस्ती ही जीवन है और दुश्मनी ही मृत्यु.
संयम ही जीवन है और असंयम ही मृत्यु.
विवेक ही जीवन है और अविवेक ही मृत्यु.
वीरत्व ही जीवन है और कायरता ही मृत्यु.
विद्या ही जीवन है और अविद्या ही मृत्यु.
परोपकार ही जीवन है और स्वार्थ ही मृत्यु. 
उदारता ही जीवन है और कृपणता ही मृत्यु. 
जागना ही जीवन है और सो जाना ही मृत्यु.
चलना ही जीवन है और ठहर जाना ही मृत्यु.
पुरुषार्थ ही जीवन है और आलस्यता ही मृत्यु. 
पवित्रता ही जीवन है और अपवित्रता ही मृत्यु. 
ब्रह्मचर्य ही जीवन है और व्यभिचार ही मृत्यु.
संतोष ही जीवन है और लोभ (तृष्णा) ही मृत्यु.

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