बूढा हो, जवान हो, गरीब या अमीर हो, भोगी हो या त्यागी हो, हर मनुष्य में जीने की इच्छा सबसे पहली और आखिरी होती है। कोर्इ मरना नहीं चाहता। बड़े से बड़ा त्यागी, तपस्वी भी जीना चाहता है। आखिर क्यों जीना चाहता है? विचार में तो सबसे प्रमुख कारण सुख ही है, यह बात अलग है कि हर मनुष्य अलग अलग बातों में सुख महसूस करता है। जिसे खाने का शौक होता है उसको बढिया खाने में सुख मिलता है। और गाने वाले में गाने में सुख महसूस करते हैं। संगीत प्रेमी संगीत में सुख अनुभव करते हैं। संक्षिप्त में सामान्य मनुष्य इंद्रियों के विषय में सुख महसूस करता है, और सारा जीवन उन सुखों को प्राप्त करने में ही लगाता है। उसके ऊपर उठकर वे लोग होते हैं जिन्हें विषय विशेष पसंद नहीं आते, लेकिन वे कुछ अन्य बातों में सुख अनुभव करते हैं। माता पिता अपनी संतान को सुख पाते देख कर सुखी होते हैं। विव्दान उनके अनुरुप ज्ञान में सुख महसूस करते हैं। परोपकारी दूसरों का कल्याण कर सुख पाते हैं और दुष्ट दूसरों का दु:ख देखकर सुख अनुभव करते हैं। क्या यही हमारे जीवन का अर्थ है? हमें जीने की इच्छा क्या इन सभी बातों की वजह से होती है। यदि हम किसी विषय में सुख महसूस नहीं करते तो क्या हमें जीने का कोर्इ अधिकार नहीं है? कबीर साहब तो कहते हैं – तन धारण करने के बाद सुख तो किसी को भी नहीं मिला है, क्योंकि हम हमारे कर्मबंधन के कारण यहाँ पर आये हैं, उसे हमें भुगतना ही पडेगा।
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