Thursday, 22 May 2014

यह जो शरीर है वह सिर्फ हाड़-माँस का टुकडा नहीं बल्कि यह एक महल है जिसमें आत्मा रूपी स्त्री और परमात्मा पति है । अब हैरत की बात यह है कि मालिक भी अन्दर है और आत्मा भी अन्दर है । पति-पत्नी एक ही महल में करोड़ों युगों से इकठ्ठे रहते हैं, परन्तु एक दुसरे से मिलाप नहीं । कबीर साहिब कह रहे हैं कि वह मालिक जो हमारा प्यारा है, जिससे हमें मिलना है, वह हमारे शरीर के अन्दर है । काम क्रोध मद लोभ बिसारो । सील संतोष छिमा मत धारा । कबीर साहिब फरमा रहे हैं कि अगर उस परवरदिगार से मिलना चाहते हो तो पहले अपने दिल को पाक-साफ़ करो । अगर तुम्हारे दिल में मैल है तो ध्यान अन्दर नहीं जायेगा । सबसे पहले काम छोड़ दो । काम और राम-नाम का विरोध है ये तो दिन रात की तरह हैं जो कभी नहीं मिलते । जहाँ काम है वहाँ राम-नाम नहीं । राम-नाम हमें ऊँचे रूहानी मण्डलों पर ले जाता है जबकि काम का रुख नीचे की तरफ है । अपनी स्त्री के सिवा किसी भी स्त्री को मलिन दृष्टी से नहीं देखना चाहिए और यही नियम स्त्रियों के लिए भी है, अर्थात अपने पति के सिवाय पराये पुरुष मलिन भाव से नहीं देखना चाहिये । काम में आत्मा नीचे गिरती है, क्रोध में फैलती है और अहंकार आत्मा को ऊँचे मंडलों में जाने से रोकता है । लोभ और मोह से आत्मा की ज़कड़ माया की तरफ बदती है । मनुष्य में कितने भी शुभ गुण क्यों न हो, यदि लोभी है तो संसार उससे नफरत करता है । मोह के कारण आदमी गलत काम करने से नहीं चूकता । काम की जगह शील धारण करो, क्रोध की जगह क्षमा, लोभ की जगह सन्तोष, मोह की जगह विवेक, अहंकार की जगह नम्रता, दीनता और आजिजी । उस राम-नाम की डोर पकड़ कर अपने असली घर लौट जा और इस मनुष्य-जन्म को सफल कर ले 

No comments:

Post a Comment