Monday, 5 May 2014

यानी जैसा किया । वैसा प्राप्त होगा ।

तेरी सत्ता के बिना । हिले न पत्ता । खिले न एक हू फ़ूल । हे मंगल मूल ।
जलचर जीव बसे जल मांहि । तिनको जल में भोजन देय । वनचर जीव बसे वन मांहि । तिनको वन में भोजन देय । थलचर जीव बसे थल मांहि । तिनको थल में भोजन देय । नभचर जीव बसे नभ मांहि । उनको भी तो भोजन देय । ..अरे..ऐसे प्रभु को भोग लगाना । लोगन राम खिलौना जाना ..?? और ये परमात्मा की केन्द्र सत्ता है । जिसमें भक्ति से भाग्य आदि बनता है । त्रिलोक की सत्ता कर्मफ़ल पर आधारित है । यानी जैसा किया । वैसा प्राप्त होगा । और आप यकीन मानें । दोनों ही सत्ताओं का बेहद कडा नियम है । कि तौल में चीनी के एक दाने के बराबर हेरफ़ेर नहीं हो सकता । चींटी जैसे तुच्छ जीव का यहां पूरा पूरा हिसाब रहता है । फ़िर आप सोच सकते हैं कि इतना सख्त राज्य है । तो खुशहाली होनी चाहिये ? आप अपना पिछले कर्मफ़ल का प्रारब्ध ( भाग्य ) लेकर आये हैं । आगे का आपको अभी बनाना है । अब जैसा भी आप ले के आये हैं । उसको हर हालत में भोगना ही है ।मनुष्य के जीवन को इसीलिये क्षणभंगुर या पानी का बुलबुला बताया गया है ।परमात्मा के यहाँ तो कोई जात नहीं वहां तो सब एक है एक नूर ते सब जग उपज्या । कौन भले कौन मंदे । तो इंसान क्यूँ सिर्फ आज के बारे में ही सोचता है क्योंकि इंसान अज्ञात नशे में चूर है । झूठे सुख से सुखी है । मानत है मन मोद । जगत चबैना काल का । कछू मुख में कछू गोद । ) woh apne aane wale kal ki kyun nahi sochta.? ( कुछ ही लोग सोचते हैं । अगर सभी सोचने लगें । तो क्या बात है । क्यों कोई दूसरों को सताता ही क्यूँ? लोग सोचते हैं कि रावण कंस आदि राक्षस कोई अलग राक्षस जाति के थे । पर वे इंसानों में ही थे । और स्वभाव से राक्षस थे ।उन्हें भी अपना कर्म फल भोगना पड़ा इसलिये ये कर्मयोनि है । इसलिये ये कर्मक्षेत्र है । इसलिये हे अर्जुन.. युद्ध कर । निरन्तर युद्ध कर । तभी विजय प्राप्त होगी । 

कोई ना काहू सुख दुख कर दाता । निज कर कर्म भोग सब भ्राता । इसलिये ..बीती ताहि विसारि दे । आगे की सुधि लेय । भक्ति स्वतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग ना पावहि प्राणी । विश्वास रखें । वह सिर्फ़ भाव का भूखा है । आप भाव से उससे प्रार्थना करेंगे । तो वो हर बात सुनेगा । जा पर कृपा राम की होई । तापर कृपा करे सब कोई । निज अनुभव तोहे कहहुं खगेशा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा । ....जय श्री कृष्णा .

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