Saturday, 24 May 2014

वास्तव मेँ असली गुरु मिला ही नहीँ

प्रश्न- गुरुकी पहचान क्या है?

उत्तर- गुरुकी पहचान शिष्य नहीँ कर सकता। जो बड़ा होता है, वहीँ छोटेकी पहचान कर सकता है।छोटा बड़ेकी पहचान क्या करे।फिर भी जिसके संगसे अपनेमेँ दैवी-संपत्ति आये,आस्तिकभाव बढ़े,साधन बढ़े,अपने आचरण सुधरेँ,वह हमारे लिए गुरु है।

प्रश्न- गुरु शरीरका नहीँ,तत्त्वका नाम है-इसका क्या तात्पर्य है?

उत्तर- गुरुके द्वारा जब शिष्यको प्रकाश मिलता है,ज्ञान मिलता है,तभी वह 'गुरु' कहलाता है।अब उसको गुरु मानना,उसका आदर,पूजन करना तो शिष्यका काम है,पर वास्तवमेँ गुरु तत्त्वज्ञान ही हुआ; क्योँकि शिष्यको तत्त्वज्ञान होनेसे ही उसकी 'गुरु' संज्ञा सिद्ध होती है।इसलिए भागवतमेँ कहा गया है कि गुरुमेँ मनुष्यबुद्धि और मनुष्यमेँ गुरुबुद्धि करना अपराध है।सन्त कहते हैँ-
जो तू चेला देह को,देह खेह की खान।
जो तू चेला सबद को,सबद ब्रह्मकर मान।।
अर्थात् शब्दसे ही ज्ञान होता है और गुरु शब्दके द्वारा ही तत्त्वज्ञान कराता है।अतः गुरु परमात्मतत्त्व ही हुआ।

प्रश्न- गुरु के बिना गति नहीँ होती,ज्ञान नहीँ होता- यह बात कहाँतक ठीक है?

उत्तर- यह बात एकदम ठीक है,सच्ची है; परंतु केवल गुरु बनानेसे अथवा गुरु बनने से कल्याण,मुक्ति हो जाय-यह बात ठीक जँचती नहीँ।यदि गुरुके भीतर यह भाव रहता है कि 'मेरा एक संप्रदाय (टोली) बन जाय,मैँ एक बड़ा आदमी बन जाऊँ' आदि और शिष्यका भी यह भाव रहता है कि 'एक चद्दर,एक नारियल और एक रुपया देनेसे मेरा गुरु बन जायगा,गुरु मेरे सब पाप हर लेगा' आदि, तो ऐसे गुरु-शिष्यके संबंधमात्रसे कल्याण नहीँ होता।कारण कि जैसे सांसारिक माता-पिता,भाई-भौजाई,स्त्री-पुत्र का संबंध है,ऐसे ही गुरुका एक और संबंध हो गया!

जिनके दर्शन,स्पर्श,भाषण और चिँतनसे हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होते हैँ,हमे शांति मिलती है,हमारेमेँ दैवी-संपत्ति बिना बुलाये आती है और जिनके वचनोँसे हमारे भीतरकी शंकाएँ दूर हो जाती हैँ, शंकाओँका समाधान हो जाता है,भीतरसे परमात्माकी तरफ गति हो जाती है,पारमार्थिक बातेँ प्रिय लगने लगती हैँ,पारमार्थिक मार्ग ठीक-ठीक दीखने लगता है,ऐसे गुरुसे हमारा कल्याण होता है।यदि ऐसा गुरु (संत) न मिले तो जिनके संगसे हम साधनमेँ लगे रहेँ,हमारी पारमार्थिक रुचि बनी रहे,ऐसे साधकोँसे संबंध जोड़ना चाहिए।परंतु उनसे हमारा संबंध केवल पारमार्थिक होना चाहिए,व्यक्तिगत नहीँ।फिर भगवान ऐसी परिस्थिति,घटना भेजेँगे कि हमेँ वह संबंध छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ेगा और वहाँ हमेँ अच्छे संत मिल जायँगे! वे संत चाहे साधुवेशमेँ हो,चाहे गृहस्थवेशमेँ,उनका संग करनेसे हमेँ विशेष लाभ होगा।तात्पर्य है कि भगवान प्रधानाध्यापककी तरह हैँ; वे समयपर स्वतः कक्षा बदल देते हैँ।अतः हमेँ भगवानपर विश्वास करके रुचिपूर्वक साधनमेँ लग जाना चाहिए।

गीतामेँ भगवानने कहा है कि 'जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैँ,वे सब कुछ जान जाते हैँ'(7.29)।अतः भगवानपर विश्वास और भरोसा रखते हुए साधन-संबंधी,भगवत्संबंधी बातेँ सुननी चाहिए और सत्कर्म,सच्चर्चा,सच्चिँतन करते हुए तथा सबके साथ सद्भाव रखते हुए साधन करना चाहिए।फिर किसी संतसे,किसी शास्त्रसे,किसी घटना आदिसे अचानक परमात्मतत्त्वका बोध जाग्रत हो जायगा।

यदि गुरु मिल गया और ज्ञान नहीँ हुआ तो वास्तव मेँ असली गुरु मिला ही नहीँ।असली गुरू मिल जाय और साधक साधनमेँ तत्पर हो तो ज्ञान हो ही जायगा।यह हो ही नहीँ सकता कि अच्छा साधक हो,असली संत मिल जाय और बोध न हो! एक कहावत है-
पारस केरा गुण किसा,पलट्या नहीँ लोहा।
कै तो निज पारस नहीँ,कै बिच रहा बिछोहा।।
तात्पर्य है कि यदि शिष्य गुरुसे दिल खोलकर सरलतासे मिले,कुछ छिपाकर न रखे तो शिष्यमेँ वह शक्ति प्रकट हो जाती है,जिस शक्तिसे उसका कल्याण हो जाता है।

गुरु-तत्त्व नित्य होता है और वह कहीँ भी किसी घटनासे,किसी परिस्थितिसे,किसी पुस्तकसे,किसी व्यक्ति आदिसे मिल सकता है।अतः गुरुके बिना ज्ञान नहीँ होता-यह बात सच्ची है।

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