Sunday, 18 May 2014

मन को निर्मल रखना ही धर्म है

मनुस्मृति में धर्म का स्वरूप उसके दस लक्षणों के माध्यम से बताया गया है -
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिंद्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना - ये दस लक्षण हैं धर्म के और जिस मनुष्य में ये लक्षण हों, वही धार्मिक है।
मध्यकाल में कई भक्त-संत कवियों ने यही बातें उस समय की बोलचाल की भाषा में समझाई। उस समय धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के आडंबर तथा कुरीतियां प्रचलित हो गई थीं। संत कबीर ने इन आडंबरों का विरोध करते हुए धर्म का वास्तविक अर्थ बताया।
जहां दया तहं धर्म है, जहां लोभ तहं पाप।
जहां क्रोध तहं काल है, जहां क्षमा तहं आप॥
गोस्वामी तुलसीदास ने परोपकार को धर्म तथा परपीडा को अधर्म माना-
परहित सरिस धर्म नहीं भाई।
परपीडा सम नहीं अधमाई॥
गुरु नानकदेव ने जीवन से सच्चा आनंद प्राप्त करने की प्यास को ही धर्म कहा।  मन को निर्मल रखना ही धर्म है, बाकी सब कोरे आडंबर।

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