परमब्रह्म की ऊँची सोच रखने वाला मेरा यह भारत कैसे चमड़े के खेल में उलझ गया? युग-ऋषि श्रीराम ‘आचार्य’ जी कार्यकर्ताओं के बढ़ते अहं को देखकर कई बार बड़े नाराज होते थे। एक बार उन्होंने मानव का पूरा कंकाल मंगवाया। शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में स्वयं को पहचानने के लिए पाँच दर्पण लगे है उन पर लिखा है ‘अंह ब्रह्मस्मि’, ‘अयमात्मा परमब्रह्म’ ‘तत्वमसि’ ‘सोऽहम्’ ‘शिवोऽहम्’
जिससे व्यक्ति अपने आत्मरूप को, शिव स्वरूप को पहचाने। उन्होंने कहा पाँचों दर्पणों के साथ यह कंकाल भी टाँग दो ताकि व्यक्ति को यह भी पता चले कि जिस शरीर के लिए वह अनमोल मानव जीवन गंवा देता है उसकी असलियत क्या है? सुनते है कुछ दिन वह कंकाल टंगा रहा तत्पश्चात् उतार दिया गया। उसको देखकर कुछ महिलाएँ व बच्चे डर गए थे।
एक बार राजा जनक की सभा में महातपस्वी अष्टावक्र पधारें। राजा जनक विद्वानों का बड़ा आदर करते थे। अष्टावक्र जी आठ जगह से टेढ़ा-मेढ़ा शरीर लिए घूमते थे। उनको दरबार में आता देख राजा के सभासदों को उनके विचित्र शरीर पर हँसी आ गई। अष्टावक्र जी भी जोर-जोर से हँसने लगे एवं राजा जनक से बोले आप जैसे ज्ञानी राजा के दरबार में कोई तो विद्वान होगा परन्तु यहाँ तो सभी चर्मकार भरें पड़े हैं। जो केवल शरीर के चमड़े को देखते हैं आत्मा की महानता को नहीं। ऋषि की गम्भीर वाणी सुनकर सभी सभासद लज्जित हुए और ऋषि के चरणों में गिर कर माँफी माँगने लगे। अष्टावक्र जी के ब्रह्मज्ञान का अमृत पा राजा जनक विदेह हो गए अर्थात् शरीर की भौतिक सीमा से ऊपर उठ कर परमब्रह्म में लीन रहने लगे।
आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की इस परकाष्ठा तक पहुँचने के लिए आत्मा को प्रधानता देनी होगी। यदि हम शरीर व उससे सम्बिंधित चीजों की ही चिन्ता करते रहे तो हम आत्म-कल्याण के इस अनमोल अवसर से वंचित रह जाएँगे। शरीर निर्वाह के लिए साधनों का समुचित उपयोग व अधिक संग्रह की वृत्ति का परित्याग यही सन्देश देते है।
अपने खून-पसीने की कमाई से धन कमाना एवं मुक्तखोरी, कामचोरी और रिश्वतखोरी को न अपनाना
यह सन्देश देता है ऋषि पतंजलि का अस्तेय का सूत्रः-
हमारे शास्त्रों में तीन महत्वपूर्ण सूत्र देखने को मिलते हैं।
1. आत्मवत् सर्वभुवेषु-सबको अपनी आत्मा के समान समझो।
2. मातृवत् पर्दावेषु- अर्थात् अपनी पत्नी को पवित्र अन्य सभी को माँ के रूप में देखों।
3. लोस्थवत् परद्रव्येषु-अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझों।
हम किसी के धन पर बुरी दृष्टि ना जमाएँ, धन के उपार्जन में अनैतिक न हो जो कुछ परमात्मा ने हमें दिया है, उसी में सन्तोष करना सीखें। आज समाज में व्यक्ति दूसरों को देखकर ईष्र्या अथवा प्रतिद्वन्दिता करने लगता है यदि पड़ौस की औरत कोई आभूषण खरीद के लाई है तो हमारे पास भी वह आभूषण होना चाहिए। यदि पड़ौसी ने बड़ी गाड़ी खरीदी है तो हमारे पास भी बड़ी गाड़ी होनी चाहिए। चाहें मुझे उसकी आवश्यकता हो या न हो, चाहे मेरी सामथ्र्य उतनी हो या न होऋ फिर व्यक्ति उस चक्कर में उल्टे-सीधे तरीकों से धन कमाने की कोशिश करता है व अपना सुख, चैन, स्वास्थ्य सब कुछ खो बैठता है पता नहीं वह गाड़ी व आभूषण व्यक्ति को सुख दे पाएगी या नहीं परन्तु उसकी प्राप्ति के लिए जो कलह-क्लेश उत्पन्न होता है उससे उसके जीवन की शान्ति जरूर चली जाती है।
भारतीय समाज में यह समस्या हर जगह व्याप्त है। सामाजिक संस्थाओं में बड़े-बड़े पदों को अपनाने के लिए लोगों में खूब छीना-छपटी, मारपीट तक होती है। लोग हर प्रकार हथकंड़े अपना कर बड़े पदों को हथियाना चाहते है। दूसरे के हक को न मारे; अपने आप को व्यर्थ में प्रदर्शित न करें, पैसे की दौड़ में न दौड़े, बल्कि परिश्रम और सेवा का रास्ता अपना कर आत्म-सन्तोष के साथ प्रसन्न मन से जीवन जीएँ
जिससे व्यक्ति अपने आत्मरूप को, शिव स्वरूप को पहचाने। उन्होंने कहा पाँचों दर्पणों के साथ यह कंकाल भी टाँग दो ताकि व्यक्ति को यह भी पता चले कि जिस शरीर के लिए वह अनमोल मानव जीवन गंवा देता है उसकी असलियत क्या है? सुनते है कुछ दिन वह कंकाल टंगा रहा तत्पश्चात् उतार दिया गया। उसको देखकर कुछ महिलाएँ व बच्चे डर गए थे।
एक बार राजा जनक की सभा में महातपस्वी अष्टावक्र पधारें। राजा जनक विद्वानों का बड़ा आदर करते थे। अष्टावक्र जी आठ जगह से टेढ़ा-मेढ़ा शरीर लिए घूमते थे। उनको दरबार में आता देख राजा के सभासदों को उनके विचित्र शरीर पर हँसी आ गई। अष्टावक्र जी भी जोर-जोर से हँसने लगे एवं राजा जनक से बोले आप जैसे ज्ञानी राजा के दरबार में कोई तो विद्वान होगा परन्तु यहाँ तो सभी चर्मकार भरें पड़े हैं। जो केवल शरीर के चमड़े को देखते हैं आत्मा की महानता को नहीं। ऋषि की गम्भीर वाणी सुनकर सभी सभासद लज्जित हुए और ऋषि के चरणों में गिर कर माँफी माँगने लगे। अष्टावक्र जी के ब्रह्मज्ञान का अमृत पा राजा जनक विदेह हो गए अर्थात् शरीर की भौतिक सीमा से ऊपर उठ कर परमब्रह्म में लीन रहने लगे।
आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की इस परकाष्ठा तक पहुँचने के लिए आत्मा को प्रधानता देनी होगी। यदि हम शरीर व उससे सम्बिंधित चीजों की ही चिन्ता करते रहे तो हम आत्म-कल्याण के इस अनमोल अवसर से वंचित रह जाएँगे। शरीर निर्वाह के लिए साधनों का समुचित उपयोग व अधिक संग्रह की वृत्ति का परित्याग यही सन्देश देते है।
अपने खून-पसीने की कमाई से धन कमाना एवं मुक्तखोरी, कामचोरी और रिश्वतखोरी को न अपनाना
यह सन्देश देता है ऋषि पतंजलि का अस्तेय का सूत्रः-
हमारे शास्त्रों में तीन महत्वपूर्ण सूत्र देखने को मिलते हैं।
1. आत्मवत् सर्वभुवेषु-सबको अपनी आत्मा के समान समझो।
2. मातृवत् पर्दावेषु- अर्थात् अपनी पत्नी को पवित्र अन्य सभी को माँ के रूप में देखों।
3. लोस्थवत् परद्रव्येषु-अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझों।
हम किसी के धन पर बुरी दृष्टि ना जमाएँ, धन के उपार्जन में अनैतिक न हो जो कुछ परमात्मा ने हमें दिया है, उसी में सन्तोष करना सीखें। आज समाज में व्यक्ति दूसरों को देखकर ईष्र्या अथवा प्रतिद्वन्दिता करने लगता है यदि पड़ौस की औरत कोई आभूषण खरीद के लाई है तो हमारे पास भी वह आभूषण होना चाहिए। यदि पड़ौसी ने बड़ी गाड़ी खरीदी है तो हमारे पास भी बड़ी गाड़ी होनी चाहिए। चाहें मुझे उसकी आवश्यकता हो या न हो, चाहे मेरी सामथ्र्य उतनी हो या न होऋ फिर व्यक्ति उस चक्कर में उल्टे-सीधे तरीकों से धन कमाने की कोशिश करता है व अपना सुख, चैन, स्वास्थ्य सब कुछ खो बैठता है पता नहीं वह गाड़ी व आभूषण व्यक्ति को सुख दे पाएगी या नहीं परन्तु उसकी प्राप्ति के लिए जो कलह-क्लेश उत्पन्न होता है उससे उसके जीवन की शान्ति जरूर चली जाती है।
भारतीय समाज में यह समस्या हर जगह व्याप्त है। सामाजिक संस्थाओं में बड़े-बड़े पदों को अपनाने के लिए लोगों में खूब छीना-छपटी, मारपीट तक होती है। लोग हर प्रकार हथकंड़े अपना कर बड़े पदों को हथियाना चाहते है। दूसरे के हक को न मारे; अपने आप को व्यर्थ में प्रदर्शित न करें, पैसे की दौड़ में न दौड़े, बल्कि परिश्रम और सेवा का रास्ता अपना कर आत्म-सन्तोष के साथ प्रसन्न मन से जीवन जीएँ
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