Friday, 23 May 2014

यह सुनते ही भगवान क्रोधित हो गए

एक दिन नारद नारायण, नारायण करते, कर-ताल वीणा लिये घूमते घूमते विष्णु लोक में भगवान विषणु के सन्मुख उपस्थित हुये और सब लोकों के समाचार सुनाने के बाद विदा हुए तो नारद जी ने मुड़ कर देखा तो सुना, भगवान कह रहे थे देवी इस स्थान को शुद्ध कराओं। नारदजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, वे उल्टे पैर लौटे और भगवान से दुखी मन से कारण पुछा- भगवान ने जवाब दिया कि तुम निगुरे हो, तुम्हारा कोई गुरु नहीं है इसलिए तुम शुचि, सम्मानीय नहीं हो।

नारदजी ने भगवान से अभिमान से मन ही मन में हँसते हुए कहा- मेरा गुरु? मेरा गुरु कौन बन सकता है? फिर भी आप कह कहते हो तो आप ही गुरु बता दीजिए भगवान ने कहा- कल प्रातः ब्रहम मुर्हूत में जो भी पहला व्यक्ति मिल जाए उसे ही अपना गुरु बना लेना। नारदजी खुशी खुशी नारायण, नारायण करते अगले दिन मुँंह अंधेरे समुद्र की तरफ चल पड़े, गुरु की खोज में। थंडे थंडे में शीतल समीर में कुछ ही कदम चलें होगें कि सामने से एक मछुआरा (कोली) कांधे पर जाल, हाथ में डंडा (पतवार) और पिछे से आधी लुंगी ऊंची किये आता दिखा। नारद जी ने नाक भौंह सिकोडी और मन मे कहा- यह मच्छीमार मेरा गुरु? नहीं,नहीं, ये मेरा गुरु नहीं हो सकता, कहां मैं इतना, ध्यानी, विद्वान भगवद्‌ भक्त और कहां ये मच्छीमार? छी छी? ये और मेरा गुरु। नारदजी को हंसी आ गई भगवानजी क्या मजाक करतें है,? बड़े कौतुकी है और तुरन्त ही उल्टे पैर जल्दी जल्दी विष्णु लोक को पहुचें और लगे भगवान को सुनाने कि क्या वो र्दुगंध युक्त मच्छीमार मुझ भगवद्‌ भक्त का गुरु नहीं हो सकता?

यह सुनते ही भगवान क्रोधित हो गए और बोले नारद, तुमने गुरु का अपमान किया है, जा तुझे ८४ लाख योनियो में जन्म लेना पड़ेगा, अरे ये क्या हो गया नारदजी ने रोते रोते भगवान के पाँव पकड़ लिये और कहा-प्रभु इतने छोटे अपराध की इतनी बड़ी सजा? अब कृपा करके श्राप का निराकरण भी बता दो। भगवान ने गुस्से में कहा- हमें नही पता, अत्यंत गिड़गड़ाने पर बोले-तेरे उसी गुरु के पास जा, उससे पूछ। नारद जी अत्यंत उदास मन से अगले दिन रात्रि २ बजे ही उस गुरु की प्रतीक्षा में जा बैठे और ज्यों ही दूर से उसकी छाया देखी, तुरन्त दौड़ कर उसके चरणों में लिपट गए-तुम मेरे गुरु हो, मच्छीमार बोला-ये गुरु वुरु क्या होता है बाबा? मेरे को नहीं मालूम, मैं कोई तु्‌म्हारा गुरु नहीं हूँ, लेकिन नारदजी नहीं माने, हारकर उसने गुरु बनना स्वीकार कर लिया फिर नारदजी को पूछा-इतने उदास क्यों हो? दुखी क्यों हो? तब नारदजी ने श्राप की बात बताई कि ८४ लाख योनियों में भटकना पडेगा, मेरा तो जीवन ही बर्बाद हो गया, आप ही इसका उपाय बता सकते हैं गुरुवर, मच्छीमार बोला- तो ऐसा है, नारद तुम ऐसा करो की समद्र की रेत पर ८४ लाख योनियों के चित्र बनाओ तब तक मैं २-३ घंटे मच्छी पकड़ कर लाता हूं। करीब ३ घंटे पश्चात आकर गुरु ने पूछा-सब चित्र बन गए तो नारद जी ने कहा, हाँ अब?

मच्छीमार गुरु बोला-अब पेट के बल लेटकर सबके उपर से निकलजा, जा हो गया श्राप पूरा-सोचिए कितने कठिन श्राप का कितनी आसानी से गुरु ने विमोचन कर दिया।

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