Sunday, 18 May 2014

जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं

गुरु और ईश्वर : गुरु भक्ति और ईश्वर भक्ति में कोई भेद नहीं होते हुए भी गुरु को परमेश्वर से ऊँचे स्थान पर रखा गया है, क्यों‍कि गुरु के ज्ञान के बिना वह सर्वव्याप्त परमात्मा भी अज्ञात है। कबीर दासजी ने गुरू की महीमा का बखान करते हुए कहा है कि
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय। 
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।
शिव भगवान स्वयं कहते हैं-
यो गुरु: स शिव: प्रोक्तो य: शिव: स गुरुस्मृत:।
अर्थात जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं।
गुरू को साक्षात परब्रह्म की संज्ञा दी गई है।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरूर देवो महेश्वराय।
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै ‍श्री गुरुवे नम:।।
गुरु और शिष्य : गुरु एक परिवर्तनकारी बल है। जहाँ गुरु की कृपा है, वहाँ विजय है। गुरु-शिष्य का संबंध तर्क के बजाय आस्था, श्रद्धा और भक्ति पर केंद्रित होता है। भावना का उफान या उत्तेजना गुरु भक्ति नहीं है। भक्ति का आशय समर्पण है। शिष्य का गुरु के प्रति जितना समर्पण होगा, उतना ही गुरु-शिष्य का संबंध प्रगाढ़ होगा। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह गुरु का चयन करते समय तर्क-वितर्क, सत्य-असत्य जैसे तमाम पहलुओं को अच्छी तरह परखे। मन में कोई संशय बाकी नहीं रहना चाहिए, क्योंकि समर्पण के अभाव कें गुरु भक्ति निरर्थक है।
प्रमुख शिष्य और उनके गुरु
श्रीराम : गुरु वशिष्ठ
श्री कृष्ण : महर्षि सांदीपनि
आरु‍‍णि : धौम्य ऋषि
उपमन्यु : धौम्य ऋषि
संत एकनाथ : श्री जनार्दन स्वामी
स्वामी विवेकानन्द : स्वामी रामकृष्ण परमहंस

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