Monday, 5 May 2014

हरिनाम संकीर्तन सिद्ध औषधि है।

‘कीर्तन बाजारी वस्तु नहीं है |’ यह भक्त की परम आदरणीय प्राण-प्रिय वस्तु है | इसलिये कीर्तन करने वाले इतना ध्यान रखें कि कहीं यह बाजारू लोकमनोरंजन की चीज न बन जाये | इसमें कही दिखलाने का भाव न आ जाये | कीर्तन करने वाला भक्त केवल यह समझे कि ‘बस, मैं केवल अपने भगवान के सामने ही कीर्तन कर रहा हूँ, यहाँ और कोई दूसरा है, इस बात की स्मृति भी उसे न रहे | दो बाते कभी नहीं भूलनी चाहिये | मन में भगवान के स्वरुप का ध्यान और प्रेम भरी वाणी के द्वारा मुख से अपने प्रभु के पवित्र नाम की ध्वनि | ऐसा करते-करते वास्तविक प्रेम की दशाएं प्रगट होंगी और भगवान कहते है कि फिर मेरा भक्त त्रिभुवन को तार देगा 
‘प्रेम से भक्त वाणी गद-गद हो जाती है,  चित द्रवीभूत हो जाता है, वह कभी जोर-जोर से रोता है,कभी हँसता है, कभी लज्जा छोड़ कर गाता है, कभी नाचने लगता है, ऐसा मेरा परम भक्त त्रिभुवन को पवित्र कर देता है |’

संसार के जो द्वंद्व हैं मान-अपमान, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि उन सब को मिटाने में हरिनाम संकीर्तन सिद्ध औषधि है। सिद्ध का अर्थ है जो कभी विफल न जाए। सिद्ध शब्द वहाँ प्रयोग होता है जो परिपक्व हो गया हो। जब चावल पक जाता है, तब बंगाल में कहते हैं कि चावल सिद्ध हो गया। वैसे ही जब साधक पक जाता है तो उसको सिद्ध कहते हैं। संसार के सभी द्वंद्वों को, सभी रोगों को मिटाने में  'हरिनाम'  सिद्ध औषधि है। 

अज्ञानरूपी बड़ी विशाल रात्रि को मिटाने में भगवान भास्कर की तरह 'हरिनाम' है। हमारे जीवन में अज्ञान की जो मिथ्या रात्रि विशाल होती जा रही है, अंधेरे को प्रगाढ़ करती जा रही है, इस रात्रि को मिटाने में 'भगवन्नाम' भगवान सूर्य की तरह है। इसकी प्रत्येक किरण उसको मिटा देती है। 
इन सबसे उत्तम शिखर पर है नाम संकीर्तन। यह सब औषधि है, ध्यान देना! नाम संकीर्तन ऐसी औषधि है जो रोग को दबाती नहीं है, पहले साफ कर देती है और उसके बाद वो तुम को धन्य-धन्य कर देती है। नाम संकीर्तन अद्भुत है। कीर्तन में कभी-कभी एक बोलता है और आप श्रवणीय कीर्तन कर रहे हैं लेकिन संकीर्तन में सब बोलने लगते हैं। 

वैसे ही संकीर्तन में सब बोलेंगे तो उसको, प्रभु को कहना पड़ता है कि अब हद हो गई, अब ये लोग घेरा डालेंगे। इसलिए भक्त कहता है कि तुम कहाँ तक छिपे रहोगे? हम देखते हैं तुम्हारी कितनी ताकत और तुम्हारे नाम की कितनी ताकत है। जरा मुकाबला कर लो, तुम भी सुन लो। शायद तुम्हें भी तुम्हारे नाम की महिमा का पता नहीं है, जितना भक्त लोग जानते हैं। तुम कब तक आँख मिचौली करोगे, कब तक पर्दा रखोगे जब हम बेनकाब होकर आ गए है अब आना ही होगा

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