यहाँ तो बहुत काल कलेश दुख पीङा है
तब मैंने कहा - हे खेमसरी सुन । यह काल निरंजन का देश है । उसके जाल में फ़ँसने का जो अंदेशा है । वह सत्यपुरुष के नाम से दूर हो जाता है ।
तब खेमसरी बोली - हे साहिब ! आप मुझे वह नामदान ( दीक्षा ) दीजिये । और काल के पंजो से छुङाकर अपनी आत्मा ( गुरु की ) बना लीजिये । हे साहिब ! हमारे घर में भी जो अन्य जीव हैं उन्हें भी ये नाम दीजिये ।
हे धरमदास ! तब मैं खेमसरी के घर गया । और सभी जीवों को सत्यनाम उपदेश किया । सब नर नरी मेरे चरणों में गिर गये ।
तब खेमसरी अपने घरवालों से बोली - हे भाई ! यदि अपने जीवन की मुक्ति चाहते हो । तो आकर सदगुरु से शब्द उपदेश गृहण करो । ये यम के फ़ंदे से छुङाने वालें हैं । तुम यह बात सत्य जानों ।
खेमसरी के इन वचनों से सबको विश्वास हो गया । और सब ने आकर विनती की ।
हे साहिब ! हे बन्दीछोङ गुरु हमारा उद्धार करो । जिससे यम का फ़ंदा नष्ट हो जाये । और जन्म जन्म का कष्ट ( जीवन मरण ) मिट जाये ।
तब मैंने उन सबको नामदान करते हुये ध्यान साधना ( नाम जप ) के बारे में, समझाया । और सार नाम से हँस जीव को बचाया ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! इस तरह सतयुग में मैं 12 जीवों को नाम उपदेश कर सत्यलोक चला गया । हे धर्मदास ! सत्यलोक में रहने वाले जीवों की शोभा मुख से कही नहीं जाती । वहाँ एक हँस ( आत्मा ) का दिव्य प्रकाश 16 सूर्यों के बराबर होता है ।
फ़िर मैंने कुछ समय तक सत्यलोक में निवास किया । और दोबारा भवसागर में आकर अपने दीक्षित हँस जीवों धोंधल खेमसरी आदि को देखा । मैं रात दिन संसार में गुप्त रूप से रहता हूँ । पर मुझको कोई पहचान नहीं पाता ।
फ़िर सतयुग बीत गया । त्रेता आया । तब त्रेता में मैं मुनीन्द्र स्वामी के नाम से संसार में आया । मुझे देखकर काल निरंजन को बङा अफ़सोस हुआ । उसने सोचा । इन्होंने तो मेरे भवसागर को ही उजाङ दिया । ये जीव को सत्यनाम का उपदेश कर सत्यपुरुष के दरबार में ले जाते हैं । मैंने कितने छल बल के उपाय किये । पर उससे ज्ञानी जी को कोई डर नहीं हुआ । वे मुझसे नहीं डरते हैं । ज्ञानी जी के पास सत्यपुरुष का बल है । उससे मेरा बस इन पर नहीं चलता है । और न ही ये मेरे काल माया के जाल में फ़ँसते हैं ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! जैसे सिंह को देखकर हाथी का ह्रदय भय से कांपने लगता है । और वह प्रथ्वी पर गिर पङता है । वैसे ही सत्यपुरुष के नाम से काल निरंजन भय से थरथर कांपता है ।
तब मैंने कहा - हे खेमसरी सुन । यह काल निरंजन का देश है । उसके जाल में फ़ँसने का जो अंदेशा है । वह सत्यपुरुष के नाम से दूर हो जाता है ।
तब खेमसरी बोली - हे साहिब ! आप मुझे वह नामदान ( दीक्षा ) दीजिये । और काल के पंजो से छुङाकर अपनी आत्मा ( गुरु की ) बना लीजिये । हे साहिब ! हमारे घर में भी जो अन्य जीव हैं उन्हें भी ये नाम दीजिये ।
हे धरमदास ! तब मैं खेमसरी के घर गया । और सभी जीवों को सत्यनाम उपदेश किया । सब नर नरी मेरे चरणों में गिर गये ।
तब खेमसरी अपने घरवालों से बोली - हे भाई ! यदि अपने जीवन की मुक्ति चाहते हो । तो आकर सदगुरु से शब्द उपदेश गृहण करो । ये यम के फ़ंदे से छुङाने वालें हैं । तुम यह बात सत्य जानों ।
खेमसरी के इन वचनों से सबको विश्वास हो गया । और सब ने आकर विनती की ।
हे साहिब ! हे बन्दीछोङ गुरु हमारा उद्धार करो । जिससे यम का फ़ंदा नष्ट हो जाये । और जन्म जन्म का कष्ट ( जीवन मरण ) मिट जाये ।
तब मैंने उन सबको नामदान करते हुये ध्यान साधना ( नाम जप ) के बारे में, समझाया । और सार नाम से हँस जीव को बचाया ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! इस तरह सतयुग में मैं 12 जीवों को नाम उपदेश कर सत्यलोक चला गया । हे धर्मदास ! सत्यलोक में रहने वाले जीवों की शोभा मुख से कही नहीं जाती । वहाँ एक हँस ( आत्मा ) का दिव्य प्रकाश 16 सूर्यों के बराबर होता है ।
फ़िर मैंने कुछ समय तक सत्यलोक में निवास किया । और दोबारा भवसागर में आकर अपने दीक्षित हँस जीवों धोंधल खेमसरी आदि को देखा । मैं रात दिन संसार में गुप्त रूप से रहता हूँ । पर मुझको कोई पहचान नहीं पाता ।
फ़िर सतयुग बीत गया । त्रेता आया । तब त्रेता में मैं मुनीन्द्र स्वामी के नाम से संसार में आया । मुझे देखकर काल निरंजन को बङा अफ़सोस हुआ । उसने सोचा । इन्होंने तो मेरे भवसागर को ही उजाङ दिया । ये जीव को सत्यनाम का उपदेश कर सत्यपुरुष के दरबार में ले जाते हैं । मैंने कितने छल बल के उपाय किये । पर उससे ज्ञानी जी को कोई डर नहीं हुआ । वे मुझसे नहीं डरते हैं । ज्ञानी जी के पास सत्यपुरुष का बल है । उससे मेरा बस इन पर नहीं चलता है । और न ही ये मेरे काल माया के जाल में फ़ँसते हैं ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! जैसे सिंह को देखकर हाथी का ह्रदय भय से कांपने लगता है । और वह प्रथ्वी पर गिर पङता है । वैसे ही सत्यपुरुष के नाम से काल निरंजन भय से थरथर कांपता है ।
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