Sunday, 11 May 2014

और फ़िर किसी ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं

निर्वाणी साधना और द्वैत साधना में फ़र्क कैसे करें ? और कालदूत साधुओं को कैसे जानें ?

सबसे पहली बात है कि आप दूसरों में दोष बाद में देखें । खुद अपना ही दोष जानें । जब द्वैत अद्वैत कुण्डलिनी मंत्र तंत्र हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी धार्मिक मत एक स्वर में कहते हैं कि - SUPREME POWER सिर्फ़ 1 ही है । और उसके सिवा दूसरा कोई नहीं हैं । और तुम भी वही हो । ये अखिल सृष्टि प्रकृति आदि जो कुछ भी दृश्य अदृश्य है । सब उसी से है । फ़िर भी आप बहुत को या 2 को मानते हो । तो सबसे पहले दोष आपका ही है । जबकि आप भी वही हो । जो अज्ञान रूपी अहम वश खुद को " मैं " और अलग मान रहे हो । यदि सिर्फ़ इसी सिद्धांत को गहरायी से अटल होकर स्वीकार कर लो । तो फ़िर कोई काल दूत हो । या और कुछ । आपका कुछ नहीं बिगाङ सकते । और फ़िर किसी ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं । लेकिन ? बिना आंतरिक परिवर्तन के दरअसल इस भाव में स्थिर होना बहुत कठिन ही नहीं असंभव है । और ये ज्ञान ( बोध ) पहचान परिवर्तन सिर्फ़ सदगुरु ( सदगुरु का अर्थ - सत्य प्रकाश या सत्य ज्ञान को जानने वाला ) द्वारा ही संभव है । अतः द्वैत ( लगभग ) मिथ्या होते हुये भी एक अकाटय और कठोर सत्य भी है । और आप मूल रूप से अमर अजर अविनाशी आत्मा होते हुये भी जन्म मरण के कष्टदायक जीवात्मा के रूप में आत्म बोध न होने तक बेहद पीङा और तंगी युक्त जिन्दगी के लिये विवश हो ।
इसलिये मूल रूप से द्वैत के काल दूतों की चर्चा करते हैं । जो आपको इस भीषण कष्ट से निकलने ही नहीं देते । और आप इन्हीं के चरणों में - महाराज महाराज स्वामी जी कहते हुये नतमस्तक होते जाते हो । और बङा आसान है । इस काल ( पुरुष ) और इसके कालदूतों को जानना समझना ।
लेकिन इससे पहले आप अपनी जीव स्थिति को जानिये । आप बहुत छोटे दायरे छोटी सोच में अल्प ज्ञान में माया की करतूत से बंधे हुये हो । इसलिये प्रथ्वी ( तत्व ) जल ( तत्व ) अग्नि ( तत्व ) वायु ( तत्व ) को भी तत्व रूप से न जानते हुये सिर्फ़ इनके स्थूल रूप से व्यवहार करते हो । पाँचवें आकाश ( तत्व ) से आपका कभी वास्ता नहीं पङता । और उच्च स्थितियों का सभी खेल आकाश से ही शुरू होता है । जो भी स्वर्ग आदि प्राप्तियाँ हैं । उनमें आकाश को तत्व रूप जानना होता है । और फ़िर उसके ऊपर भी ।

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