Monday, 12 May 2014

इन्द्रियां द्वार है

 हम जिसे मन कहते हैं, ... वह साधारणतया हमारी कामनाओं का, आकांक्षाओं का समूह ही होता है ऐसा हम मानते हैं। हम आइने में अपने शरीर को देखते हैं। चित्त के दर्पण पर अपने आप को देखें। वहां मात्र विचारों का, विकारों का समूह है। वही हमारा मन है। यह मन जिस भी इन्द्रिय के साथ लगता है, ... वह बाहर चला जाता है। इन्द्रियां द्वार है, इस द्वार से भीतर भी आया जाता है।
द्वार पर यह चौकीदार, मन, ... मन का दूसरा हिस्सा रहता है। जब यह एकाग्रता से दो का एक होता है। जब यह साधारणतया अवलोकन में, यह देखता है, दूसरा बाहर जाता है। धीरे-धीरे बाहर जाने वाला रुक जाता है। तब यह एक सजगता में ढल जाता है।
पहले चरण में इस ‘एकमन’ को पाना होता है, ... फिर यह एक मन, ... अंतर्मुखी होकर, अंतर्मन में समर्पित हो सकता है,...और जब हम इसको आते और जाते देखते है तो वह चिंतन बन जाता है ......ये विचार चिंतन ही है भाई

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