जब मन सारी भौतिक सुख सुविधाऔ , वासनाऔ से उब जाता है और फिर भी बैचेन , अशान्त हो जाता है , तब प्रभु परब्रह्म परमात्मा की शरण की ओर मुडता है , तब एक अलौकिक आत्मशान्ति की अनुभूति होती है , लेकिन पहले किये गये अनैतिक और दुर्व्यसन मानसिकता को झँझकोरते रहते है जिनसे निजात पाने के लिये छटपटाते रहना कि कोई राह बताकर इससे छुटकारा दिला देता । तो किये गये पाप कर्म से छुटकारा पाने का सही उपाय है प्रभु शराणागत् होकर अनजाने मे हुये पाप कर्म के लिये पश्चाताप कर उन्हे दौहराने की प्रक्रिया न होने देना एक मात्र उपाय है
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