Monday, 12 May 2014

पर प्रभु तो प्रेम के भूखे है,

वृंदावन में एक कथा प्रचलित है कि एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का परम भक्त था। 

एक बार उसने एक महाजन से कुछ रुपये उधार लिए। 
हर महीने उसे थोड़ा- थोड़ा करके वह चुकता करता था। 

जब अंतिम किस्त रह गई तब महाजन ने उसे अदालती नोटिस भिजवा दिया कि अभी तक उसने उधार चुकता नहीं किया है, इसलिए पूरी रकम मय व्याज वापस करे।

ब्राह्मण परेशान हो गया। 

महाजन के पास जा कर उसने बहुत सफाई दी, अनुनय-विनय किया, लेकिन महाजन अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ। 

मामला कोर्ट में पहुंचा। 

कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही, 
मैंने सारा पैसा चुका दिया है। 
महाजन झूठ बोल रहा है। 

जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। 

कुछ सोच कर उसने कहा, 
हां, मेरी तरफ से गवाही बांके बिहारी देंगे। 

अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने बताया, बांके बिहारी, वल्द वासुदेव, बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन। 

उक्त पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। 

पुजारी ने सम्मन को बांके बिहारी जी के सामने रख कर कहा, 
भगवन, आप को गवाही देने कचहरी जाना है। 

गवाही के दिन सचमुच एक बूढ़ा आदमी जज के सामने खड़ा हो कर बता गया कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और फलां- फलां तारीख को रकम वापस की गई थी। 

जज ने सेठ का बही- खाता देखातो गवाही सच निकली। 
रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था। 

जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। 

लेकिन उसके मन में यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन। 

उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि वह तो सर्वत्र रहता है, गरीबों की मदद के लिए अपने आप आता है। 

इस घटना ने जज को इतना उद्वेलित किया कि वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़ कर फकीर बन गया। 

बहुत साल बाद वह वृंदावन लौट कर आया पागल बाबा के नाम से।

आज भी वहां पागल बाबा का बनवाया हुआ बिहारी जी का एक मंदिर है। 

पागल बाबा की दिनचर्या में एक अद्भुत चीज़ शामिल थी - उनकी भोजन पद्धति | 
वो प्रतिदिन जो साधू संतो का भंडारा होता उसके बाहर जाते वहा पर उनकी जूठन बटोरते फिर उसका आधा प्रभु द्वारिकाधीश को अर्पित करते और आधा स्वयं खाते| 

उनको लोग बड़ी हेय द्रष्टि से देखते थे पागल तो आखिर पागल |

पर प्रभु तो प्रेम के भूखे है, 
एक दिन सभी साधुओ ने फैसला किया आज देर से भोजन किया जायेगा औरकुछ जूठन भी नहीं छोड़ी जाएगी | 

पागल बाबा भंडारे के बाहर बैठे इंतज़ारकर रहे थे की कब जूठे पत्तल फेके जाये और वो भोजन करे...

इसी क्रम में दोपहर हो गयी वो भूख से बिलखने लगे| 

दोपहर के बाद जब बाहर पत्तल फेके गए तो उनमे कुछ भी जूठन नहीं थी | 

उन्होंने बड़ी मुश्किल से एक एक पत्तल पोछ कर कुछ जूठन इकट्ठी की अब शाम हो चुकी थी | 
वो अत्यंत भूखे हो गए थे |

उन्होंने वो जूठन उठाई और अपने मुह में डाल ली | 
पर मुह में उसको डालते ही उनको याद आया की अरे आज जो बाके बिहारी को अर्पित किये बिना ही भोजन, ऐसा कत्तई नहीं होगा | 

अब उनके सामने बड़ी विषम स्थिति थी वो भोजन को अगर उगल देंगे तो अन्न का तिरस्कार और खा सकते नहीं क्योकि प्रभु को अर्पित नहीं किया | 

इसी कशमकश में वो मुख बंद कर के बैठे रहे और प्रभु का स्मरण करते रहे, वो निरंतर रोते जा रहे थे की प्रभु इस विपत्ति से कैसे छुटकारा पाया जाये| 

पर द्वारिकाधीश तो सबकी लाज रखते है - 

रात को बाल रूप में उनके पास आये और बोले क्यों रोज़ सबका जूठा खिलाते हो और आज अपना जूठा खिलाने में संकोच कर रहे हो | 

उनकी आँखों से निरंतर अश्रु निकलते जा रहे थे | 

प्रभु ने उनकी गोद में बैठ कर उनका मुख खोला और कुछ भाग निकाल कर बड़े प्रेम से उसको खाया | 

अब पागल बाबा को उनकी विपत्ति से छुटकारा मिला | 

ऐसे थे अपने पागल बाबा - और प्रभु द्वारिकाधीश

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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