Thursday, 15 May 2014

यह विज्ञान भी जानता है

               ब्रह्मांड की उतपत्ति निराकार ईश्वर से होती है। आदि काल में ब्रह्मांड शून्य था अर्थात इसमें निराकार ईश्वर के अलावा कुछ भी नहीं था। ईश्वर ने जब एक से अनेक होने की इच्छा की तब ईश्वर ने निराकार से साकार होना शुरु किया। चूंकि ब्रह्मांड में कोई भी खाली जगह नहीं होती सब जगह ईश्वर व्याप्त रहता है। अतः जब ईश्वर निराकार से साकार होने के लिए अपना आकार बढ़ाता है तब ब्रह्मांड में असीमित दबाव उतपन्न होता है जिससे असीमित उर्जा उतपन्न होती है बाद में दबाव के कारण इसमें विस्फोट होने लगते हैं जिससे सूर्य तारों ग्रहों उपग्रहों आदि का निर्माण होता है। ब्रह्मांड की उतपत्ति के संबंध में विज्ञान एवं धर्म के प्रायः एक ही सिद्धांत है, चूंकि विज्ञान का कथन है कि पूरे ब्रह्मांड की उतपत्ति एक बार में हुई परंतु ब्रह्मांड में रोज नए तारों का जन्म एवं पुराने तारों की मृत्यु होती ही रहती हैं यह क्रिया आदि काल से चल रही है यह विज्ञान भी जानता है विज्ञान ने यह भी पता कर लिया है कि ब्रह्मांड फैल रहा है। यह उसी प्रकार होता रहता है, जिस प्रकार पृथ्वी पर प्राणियों का जन्म एवं मृत्यु होती रहती है। तारों या सूर्य में विस्फोट के समय जो पिंड अलग होकर अंतरिक्ष में फैल जाते हैं वह ग्रह एवं उपग्रह बन जाते हैं एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने सूर्य का चक्कर लगाने लगते हैं। चूंकि सूर्य स्वयं उर्जा उत्सर्जित करने में सक्षम होते हैं परंतु विस्फोट से अलग हुए पिंड स्वयं उर्जा उत्सर्जित नहीं कर सकते अतः यह धीरे धीरे ठंडे होकर उर्जा रूप से वायु, द्रव और ठोस रूप में बदलने लगते हैं। हमारी पृथ्वी भी इसी प्रकार का आदि काल में सूर्य से अलग हुआ एक पिंड है। सूर्य सहित सूर्य से अलग हुए सभी ग्रह हमारी पृथ्वी पर जलवायु, प्राणियों, वनस्पतियों आदि के जीवन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इनमें से चंद्रमा या किसी ग्रह के न होने से पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन संभव नहीं है। मनुष्य जीवन सहित पृथ्वी पर होने वाले सभी क्रिया कलापों पर इनका प्रभाव होता है, इसलिए सूर्य सहित सभी ग्रहों की देवता के रूप में पूजा आराधना की जाती है। यह हम सब को जान लेना चाहिए कि मनुष्य एवं अन्य प्राणियों सहित हमारे सौर मंडल में जो कुछ भी है वह सूर्य का ही अंश है। 

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