सूर्य के जीवनकाल में पृथ्वी की कई बार पुनर्संरचना हो जाती है, इसे प्रलय कहते हैं। प्रलय भी दो प्रकार का होता है।
1. प्रलय। इसमें पृथ्वी की पुनर्संरचना होती है।
2. महाप्रलय। इसमें सूर्य सहित पूरे सौरमंडल के ग्रह एवं उपग्रहों का अंत हो जाता है एवं फिर इनका पुनर्जन्म नहीं होता।
प्रलयः- जब पृथ्वी पूरी तरह प्रदूषित हो जाती है एवं पृथ्वी पर मनुष्य सहित अन्य प्राणियों एवं वनस्पितियों का जीवन कष्टप्रद हो जाता है तथा मनुष्य में ज्ञान का लोप होकर अज्ञान अपने चरम पर पहुंच जाता है, तब सूर्य में प्रज्वाल उठते हैं जिससे पृथ्वी पर अत्याधिक ताप बढ़ता है। ताप बढ़ने से बर्फ पिघलने लगती है जिससे समुद्र के पानी का जल स्तर बढ़ने से सारी पृथ्वी जलमग्न हो जाती है एवं प्राणियों वनस्पितियों का जीवन समाप्त हो जाता है। इसके बाद सारा जल सूखकर वायुमंडल में विलीन हो जाता है और पृथ्वी गरम होकर लावा एवं उर्जा रूप में बदल जाती है पृथ्वी के साथ साथ सभी गृहों पर भी तापमान में वृद्धि होती है। जब सूर्य पर प्रज्वाल समाप्त हो जाते हैं एवं सूर्य सामान्य अवस्था में आ जाता है तब पृथ्वी पुनः ठंडी होने लगती है एवं वाष्प के बादल पृथ्वी को ढक लेते हैं जिससे सैकड़ों वर्षों तक पृथ्वी पर पानी बरसता रहता है शुरू के कई वर्षों तक यह पानी पृथ्वी की सतह तक न पहुंचकर उपर ही वाष्प में बदलता रहता है जब यह सतह तक पहुंचने लगता है तब समुद्र नदियों आदि का निर्माण होने लगता है। लगातार पृथ्वी कई वर्षों तक बादलों से ढकी रहने के कारण सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाता जिससे हिमयुग शुरू होता है इस हिम युग के कारण पृथ्वी की परत कई किलोमीटर नीचे तक ठंडी हो जाती है। जब बादल समाप्त होते हैं और सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने लगता है तब पृथ्वी पर पुनः प्राणी एवं वनस्पतियों का जीवन शुरु होता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में करोड़ों वर्षों का समय लगता है।
1. प्रलय। इसमें पृथ्वी की पुनर्संरचना होती है।
2. महाप्रलय। इसमें सूर्य सहित पूरे सौरमंडल के ग्रह एवं उपग्रहों का अंत हो जाता है एवं फिर इनका पुनर्जन्म नहीं होता।
प्रलयः- जब पृथ्वी पूरी तरह प्रदूषित हो जाती है एवं पृथ्वी पर मनुष्य सहित अन्य प्राणियों एवं वनस्पितियों का जीवन कष्टप्रद हो जाता है तथा मनुष्य में ज्ञान का लोप होकर अज्ञान अपने चरम पर पहुंच जाता है, तब सूर्य में प्रज्वाल उठते हैं जिससे पृथ्वी पर अत्याधिक ताप बढ़ता है। ताप बढ़ने से बर्फ पिघलने लगती है जिससे समुद्र के पानी का जल स्तर बढ़ने से सारी पृथ्वी जलमग्न हो जाती है एवं प्राणियों वनस्पितियों का जीवन समाप्त हो जाता है। इसके बाद सारा जल सूखकर वायुमंडल में विलीन हो जाता है और पृथ्वी गरम होकर लावा एवं उर्जा रूप में बदल जाती है पृथ्वी के साथ साथ सभी गृहों पर भी तापमान में वृद्धि होती है। जब सूर्य पर प्रज्वाल समाप्त हो जाते हैं एवं सूर्य सामान्य अवस्था में आ जाता है तब पृथ्वी पुनः ठंडी होने लगती है एवं वाष्प के बादल पृथ्वी को ढक लेते हैं जिससे सैकड़ों वर्षों तक पृथ्वी पर पानी बरसता रहता है शुरू के कई वर्षों तक यह पानी पृथ्वी की सतह तक न पहुंचकर उपर ही वाष्प में बदलता रहता है जब यह सतह तक पहुंचने लगता है तब समुद्र नदियों आदि का निर्माण होने लगता है। लगातार पृथ्वी कई वर्षों तक बादलों से ढकी रहने के कारण सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाता जिससे हिमयुग शुरू होता है इस हिम युग के कारण पृथ्वी की परत कई किलोमीटर नीचे तक ठंडी हो जाती है। जब बादल समाप्त होते हैं और सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने लगता है तब पृथ्वी पर पुनः प्राणी एवं वनस्पतियों का जीवन शुरु होता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में करोड़ों वर्षों का समय लगता है।
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