Wednesday, 14 May 2014

वह ही सही है

संत कबीर साहिब के अनुसार काल की भक्ति से प्रसन्न होकर परमात्मा ने संसार के संचालन का ज़िम्मा काल देते हुए आत्माओं को उसके हवाले कर दिया। अब काल नहीं चाह्ता कि कोई भी जीव उसके चंगुल से निकल कर परमात्मा से वापिस मिलाप कर सके। इसीलिए उसने मन को सभी जीवों के पीछे लगा रखा है। जीव को काबू में रखने के लिए मन के पाँच हथियार हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। यह पाँचों ही जीव के घोर शत्रु हैं। यह जीव को परमात्मा की राह पर चलने से रोकते हैं। काम पशुओं वाले कर्म करवाकर मनुष्य को पशु समान ही बना देता है। क्रोध जीव की सारी नेकी और आत्मा के सारे गुणों को जलकर राख कर देता है। लोभ सांसारिक और नाशवान पदार्थों का दास बना देता है। मोह इसे संसार से बांधे रखता है और अहंकार इन पाँचों में विशेष रूप से विनाशकारी है। यह सभी विकारों के बाद ही अपनी हार स्वीकार करता है। अहंकारी व्यक्ति हमेशा यह मानता है कि जो कुछ वह कर रहा है, वह ही सही है।जब भी कोई मनुष्य परमात्मा की राह पर चलने की कोशिश करता है, ये विकार उसको भटकाने की कोशिश करते हैं। इसीलिए संत कहते हैं:....“काम तजे तो क्रोध न जाई, क्रोध तजे तो लोभा।लोभ तजे अहंकार न जाई, मान बड़ाई शोभा। “अर्थात कोई न कोई विकार मनुष्य को मालिक के रास्ते से भटका ही देता है।इन पाँच विकारों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि इनके मालिक मन को वश में किया जाये। यही कारण है कि गुरु नानक देव जी ने,,,, “मन जीते, जग जीत” ....और कबीर साहिब ने “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ” का संदेश दिया है। लेकिन मन भी कोई छोटी चीज़ नहीं है। यह् भी त्रिकुटी या ब्रह्म का अंश है। बहुत शक्तिशाली है। केवल ब्रह्म या काल से अधिक शक्ति ही मन को वश में कर सकती है। मन रसों, स्वादों और लज़्ज़तों का आशिक है। इसलिए जब तक इसको कोई इनसे ऊँची और सच्ची लज़्ज़त नहीं मिलती, यह कभी भी इन भोगों की तरफ़ से अपना मुँह नही मोड़ता। संसार की सभी चीज़ें नाशवान हैं यानि झूठी हैं और इनकी लज़्ज़त भी झूठी या अस्थायी है। इसलिए दुनियावी वस्तुओं की लज़्ज़त मन को स्थायी रूप से वश में नहीं कर सकती।संतजन मन को वश में करने के दो साधन बतलाते हैं – एक तो पूर्ण संत की शरण और दूसरा पूर्ण संत से नाम का भेद लेकर नाम का अभ्यास। क्योंकि नाम रूपी अमृत – धारा सचखण्ड से आ रही है, जो त्रिकुटी से ऊपर है, इसलिए यह काल से अधिक शक्तिशाली है। इसी लिए कहा गया है “अमृत नाम महारस मीठा” और “नाम मिलै मन त्रिपतीऐ” । यानि नाम मन की सभी तृष्णाओं को शान्त कर देता है। कबीर साहिब भी संकेत करते हैं कि मन बंदर के समान चंचल है, कहीं ठहरता नहीं। लेकिन सच्चे नाम रूपी रस्सी से ही उसे बांधा जा सकता है। :
“कबीर मन मरकट भया, नेक न कहुँ ठहराय।सत्तनाम बाँधे बिना, जित भावै तित जाय। “चौथी पातशाही गुरु राम दास जी फरमाते हैं:“मन खिन खिन भरम भरम बहु धावै, तिल घर नहीं वासा पाईऐ।गुर अंकस शब्द दारू सिर धारिओ, घर मंदर आन वसाईऐ। “हमारा मन क्षण – क्षण कहीं न कहीं दौड़ता रहता है, यह अपने स्थान तीसरे तिल (दोनों आँखों के बीच का स्थान) पर बिल्कुल टिक कर नहीं बैठता। इसको टिकाने के लिए क्या करना होगा। गुरू का शब्द यानि नाम रूपी अंकुश से ही इस हाथी रूपी मन को वश में कर सकते हैं। जब मन वश में आ जायेगा तो यह पाँच शत्रु या विकार भी वश में आ जाते हैं और इनकी जगह शील, क्षमा, संतोष, विवेक और नम्रता आदि गुण ले लेते हैं, जो आत्मा के स्वभाविक गुण हैं।

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