हरि ने मोसूँ आप छिपायो,
गुरु दीपक दे ताही दिखायो ।
फिर हरि बंध मुक्ति गति लाये,
गुरु ने सब ही भरम मिटाये ।
चरणदास पर तन मन वारूँ,
गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ ।।
परमात्मा ने तो अपने आप को जीव मात्र से छिपा रखा है, धन्य है मेरे गुरु, जिन्होंने ज्ञान का दीपक देकर उस प्रसन्न स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया । ईश्वर ने जीव को उत्पत्ति, विकास और विनाश (सत, रज और तम) में उलझा रखा है। इस बंधन और मुक्ति के भ्रम को मिटाने वाला मेरे सदगुरु चरणदासजी साहब पर मैं तन, मन और प्राण न्यौछावर करने को तैयार हूँ । इस प्रकार भक्तिन सहजो बाई गुरु का त्याग नहीं कर सकती, चाहे भगवान उनसे छूट क्यों न जाये
गुरु दीपक दे ताही दिखायो ।
फिर हरि बंध मुक्ति गति लाये,
गुरु ने सब ही भरम मिटाये ।
चरणदास पर तन मन वारूँ,
गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ ।।
परमात्मा ने तो अपने आप को जीव मात्र से छिपा रखा है, धन्य है मेरे गुरु, जिन्होंने ज्ञान का दीपक देकर उस प्रसन्न स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया । ईश्वर ने जीव को उत्पत्ति, विकास और विनाश (सत, रज और तम) में उलझा रखा है। इस बंधन और मुक्ति के भ्रम को मिटाने वाला मेरे सदगुरु चरणदासजी साहब पर मैं तन, मन और प्राण न्यौछावर करने को तैयार हूँ । इस प्रकार भक्तिन सहजो बाई गुरु का त्याग नहीं कर सकती, चाहे भगवान उनसे छूट क्यों न जाये
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