Wednesday, 14 May 2014

जो बुद्धी के परे है

आत्मा परमात्मा का अंश तथा उससे अभिन्न है,फिर भि भक्त अपनि आत्मा की अपेक्षा परमात्मा को अधिक महत्व देता है ! वह एक मात्र परमात्मा को ही समस्त शांति और आनंद का निधान मानता है ! हमे अपने भितर देखने तथा उनहे अपने हृ्दय में विराजित करने का प्रयत्न करना चाहिये ! "हमारी देह भगवान का जिवंत मंदिर है" सभी शास्त्रों में इस मान्यता पर बल दिया गया है लेकिन माहान अवतार ,ऋषीगण एव्ं गुरुदेव ही भगवान के सर्वश्रेष्ठ मंदिर है इसलिये उनका प्रभाव सर्वाधिक होता है ! जिन लोगो ने अपनी आत्मा में सत्य का साक्षात्कार किया है,वे ही दुसरो को साक्षात्कार का मार्ग सिखा सकते है !! परमात्मा सदा हमारे अंत:करण के,हमारे व्यक्तित्व के पार्श्र्व मे विध्यमान है और आंतरिक्ता से प्रार्थना करने पर ही प्रार्थना सुनी जा सकती है,अन्यथा नही !प्रार्थना करते समय कभी भी सांसारिक सुख की बात नही सुननी चाहिये सामान्यत: जिसे सुख समझा जाता है,वह अध्यात्मिक जिवन का मापदंड,अध्यात्मिक अनुभुति का प्रमाण कभी नही माना जा सकता !! अध्यात्मिक आनंद भिन्न प्रकार का होता है! वह परमात्मा की "शांति है जो बुद्धी के परे है !! 

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