Monday, 12 May 2014

जिसके मन में जो आये सो कहे


 जगत के किसी भी भोग्य पदार्थ की तृष्णा मनुष्य को बन्धन में डाल देती है तृष्णा हो तो एक प्यारे मनमोहन के मुखकमल दर्शन की हो, जिससे त्रिविध तापों का सदा के लिए नाश हो जाता है | परन्तु वह  तृष्णा उन्ही भाग्यवानों को नसीब होती है, जो भोगो की तृष्णा को विषवत त्याग देते हैं, जो जगत के केवल देखने में रमणीय पदार्थों के असली जहरीले रूप को पहचान कर उनसे मुहँ मोड़ लेते हैं, उन्ही के अन्त:करण में भगवद्चरण-दर्शन की तीव्र पिपासा उत्पन्न होती है | फिर वे पागल हो उठते है उस रूप माधुरी का दर्शन के लिए | उन्हें दूसरी बात सुहाती नहीं | जगत के विषयी लोग कोई उन्हें पागाल समझते है, कोई मुर्ख समझते है, कोई निकम्मा समझते है, कोई अशक्त समझते है और कोई अविवेकी समझते है, परन्तु वे अपनी धुन में इतने मस्त रहते है की निन्दकों की और ताकने की भी उनको फुर्सत नहीं मिलती |
प्यास के मारे जिसके प्राण छटपटाते हों, वह जल को छोड़ कर दूसरी और कैसे ताकेगा ? उसे जब तक जल नहीं मिल जायेगा, तब तक जगत की गप्पें कैसे सुहायेंगी ! वह  तो दौड़ेगा वहीं पर जहाँ उसे जल दीखेगा | वह क्यों परवाह करेगा लोगो के जुबान की ? जिसके मन में जो आये सो कहे, उसे तो अपने काम से काम | जो जगत की और ताकते है, उनकी बात सुनने और जबाब देने के लिए ठहरते है, उन्हें पूरी प्यास नहीं होती, वे प्यास की अधिकता से छटपटाने नहीं लगते | इसलिये उन्हें सुनना, ठहरना और जबाब देना सूझता है  |

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