Monday, 12 May 2014

उसके लिए दरवाजा खुल जाता है

लगी है प्यास जोरों से ढूँढता हूँ सरोवर को | 
सुहाता है नहीं  कोई मुझे अब दूसरा कुछ भी || 

जब इतनी तृष्णा बढती है,तब भगवान का आसन डोल जाता है, उन्हें आना पडता है वैकुण्ठ छोड़कर उस रूप के प्यासे मतवाले भक्त को अतुल सौन्दर्य-सुधा पिला कर सदा के लिए तृप्त और संतुष्ट कर देने के लिये | भगवान के इस मनोहर मिलन से संसार की समस्त ज्वालाये शान्त हो जातीं है, उसकी जन-मनोहर अनोखी वाणी सुनते है अविद्या की बेड़िया पटापट टूट जाती है, कर्मों का बंधन खुल पढता है | अमावस्या की घोर निशा शरद-पूर्णिमा के अमृत भरे प्रकाश के रूप में परिणत हो जाती है |
धन, मान, कुल, विद्या और वर्ण का सारा अभिमान उस प्रियतम के प्रेम की बाढ़ में बह जाता है – माया का लेंन देन चुक जाता है | उसके लिए दरवाजा खुल जाता है, उस सर्वर्त्र अबाधित परमात्मा के परम धाम का | उसके लिए कोई भी अपना-पराया नही रह जाता, सर्वत्र केवल उस एक का अपार विस्तार | ऐसी स्तिथि में वह उसी में अनुरक्त, उसी में तृप्त और उसी में संतुस्ट रहता है  | उसके लिए फिर कोई भी कर्तव्य शेष नही रह जाता               

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