Wednesday, 14 May 2014

तोड़कर देखना आरम्भ कर दिया

राज्याभिषेक पर श्री रामचंद्रजी ने सभी मुनियों एवं ब्राह्मणों को दान दिए ! सुग्रीव , अंगद आदि वानरों को भी उपहार दिए ! तभी माता जानकी जी ने हनुमान जी को अपने कंठ का मुक्ताहार प्रदान किया !
वह हनुमान जी ने पहन तो लिया , किन्तु उसमे उन्हें कुछ आनंद नहीं आ रहा था ! उन्होंने उसे गले से उतारकर देखा परखा - कहीं राम - नाम नहीं मिला तो हनुमान तो उन्होंने मोतियों को तोड़कर देखना आरम्भ कर दिया !
लोगो में काना फूंसी होने लगी की वानर जाति का है ! क्या जाने मोती की कीमत ! विभीषणजी से रहा नहीं गया , बोले इस हार को को इस प्रकार नष्ट - भ्रष्ट क्यों कर रहे हो कपीश्वर ?
हनुमानजी ने कहा देख रहा था की इन दानो के भीतर ही मेरे प्रभु का नाम अंकित हो , बाहर तो कहीं नहीं है !
विभीषणजी ने कहा - इन जड़ से मोतियों में तो प्रभु का नाम नहीं किन्तु आपकी पर्वत जैसी काया में है क्या ? हनुमान जी बोले अवश्य देखो !
और उन्होंने अपने दोनों हाथ वक्षस्थल पर रखकर नखो के द्वारा चीरकर दिखा दिया - उनके रोम रोम में भगवान् की छवि और नाम अंकित था ! विभीषण उनके चरणों में गिर पड़े सभी लोग पुकार उठे परम भक्त हनुमानजी की जय ! अंजनी पुत्र की जय !
प्रभु के कर स्पर्श से उनका शरीर पूर्ववत स्वस्थ्य हो गया !

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