परमात्मा ने दुनिया की रचना करते हुए मनुष्य, जीव जन्तु, पेड़-पौधे इत्यादि की उत्पति के लिए जिन पाँच तत्वों का प्रयोग किया, वह हैं – पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि। दुनियाँ के सभी जीव और पेड़-पौधे इन पाँचों के मेल से बने हैं। हिन्दु धर्म के अनुसार इन जीवों को चौरासी लाख योनियों में बाँटा गया है। हर योनि के अनुसार इन पाँच तत्वों में से कुछ जागृत होते हैं और कुछ सुप्त। जैसे शाक-सब्ज़ी में केवल एक तत्व पानी की अधिकता होती है यानि केवल पानी जागृत अवस्था में होता है। कीड़े –मकौड़ों में दो तत्वों की प्रधानता होती है। पक्षियों में तीन तत्व (जल, वायु और अग्नि) होते हैं। पशुओं में चार तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि) की प्रधानता होती है। केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है जिसमें पाँचों तत्व जाग्रत अवस्था में होते हैं। जो पांचवाँ तत्व केवल मनुष्य में होता है वह है आकाश, जो मनुष्य को विवेक की शक्ति देता है यानि मनुष्य ही केवल अच्छे और बुरे में फर्क कर सकने की क्षमता रखता है ।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह पाँचों तत्व एक दूसरे के दुश्मन हैं। जल पृथ्वी का शत्रु है, जल इसको निगल लेता है। जल को अग्नि सोख लेती है। अग्नि को वायु खा जाती है और वायु को आकाश निगल लेता है। लेकिन परमात्मा की शक्ति (आत्मा) इन सब को बांधे रखती है।
इस के अतिरिक्त परमात्मा द्वारा बनाई गई बाकी चीज़ों के बारे में विचार करें तो पायेंगे कि परमात्मा द्वारा बनाई गई कोई भी वस्तु द्वैत रहित है। सूरज सभी प्राणियों को एक समान धूप प्रदान करता है; अच्छे या बुरे व्यक्ति में भेद नहीं करता । इसी प्रकार पेड़ – पौधे भी व्यक्ति के अच्छे या बुरे स्वभाव को न देखते हुए सभी को छाया और फल देते हैं। बारिश सभी पर समान रूप से बरसती है। हवा सभी पर समान रूप से बहती है। मनुष्य इन से अद्वैत की भावना सीख सकता है।
परमात्मा द्वारा रचित पशु पक्षी हालांकि मनुष्य योनि की बनिस्बत निम्न माने गये हैं लेकिन उनसे भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। जैसे कौआ किसी को पसंद नहीं। उसकी आवाज़ कर्कश है; रंग काला है। लेकिन उसमें एक खासियत है कि जब भी उसको कहीं खाने का कुछ दिखाई देगा, वह शोर करके और साथियों को भी बुला लेगा। यह नहीं कि अकेला ही खाने लग जाये। यानि बांट कर खाने में विश्वास रखता है। चींटियों से आप बुरे समय के लिए अपने खाने का जुगाड़ बना कर रखना सीख सकते हैं। वे बरसात आदि खराब मौसम के लिए खाने का पहले से ही इंतज़ाम कर लेती हैं। महाभारत में दुर्योधन द्वारा पांडवों को लाक्षाग्रह में जला कर मारने से बचने के लिए विदुर ने पांडवों को चूहे की आदत का उदाहरण देकर समझाया था। चूहा जहाँ भी अपनी बिल बनाता है, शत्रु के आने की आशंका को ध्यन में रखते हुए, बिल में से निकलने का एक रास्ता पहले ही ज़रूर बना लेता है। कुत्ते से हम रहने की जगह को साफ रखने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे।
संतमत की एक मान्यता यह भी है कि यह दुनिया परमात्मा के हुक्म का एक खेल है। यह संसार न तो अपने आप बना है और न ही इसका काम आज अपनी मर्ज़ी से चल रहा है। सब कुछ परमात्मा के चाहे अनुसार सुनियोजित ढ़ंग से चल रहा है। आत्माओं को संसार में भेजना और फिर कर्मानुसार फल देना तथा उनको वापिस अपने पास बुलाने के लिए संतों को उनकी सहायता के लिए भेजना भी इस दुनिया का एक हिस्सा है। गुरुवाणी कहती है “हुकमी सहजे सृस्ट उपाई। कर कर वेखै अपनी वडिआई। “ दुनियावी वस्तुएँ तो जीव को अपने कर्मों के आधार पर मिलती हैं, लेकिन आत्मा केवल उस परमात्मा की दया-मेहर से ही इस संसार से मुक्त हो सकती है। गुरु नानक साहिब ने फरमाया है “करमी आवै कपड़ा, नदरी मोख दुआर”
कहते हैं कि जिस मनुष्य को परमात्मा अपने से मिलाना चाहता है, उस पर पहली कृपा वह स्वयं करता है जब वह उसका एक पूर्ण संत से मिलाप करवा देता है। दूसरी कृपा संत के माध्यम से आती है जो मनुष्य को नाम या शब्द का भेद देकर उसे परमात्मा की सच्ची भक्ति का रास्ता दिखाता है। तीसरी कृपा मनुष्य को खुद अपने ऊपर करनी होती है कि वह संत सतगुरु द्वारा बताई गई विधि से परमात्मा की भक्ति करके इस असार संसार से मुक्त होकर वापिस सचखण्ड पहुँच जाए यानि परमात्मा में समा सके।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह पाँचों तत्व एक दूसरे के दुश्मन हैं। जल पृथ्वी का शत्रु है, जल इसको निगल लेता है। जल को अग्नि सोख लेती है। अग्नि को वायु खा जाती है और वायु को आकाश निगल लेता है। लेकिन परमात्मा की शक्ति (आत्मा) इन सब को बांधे रखती है।
इस के अतिरिक्त परमात्मा द्वारा बनाई गई बाकी चीज़ों के बारे में विचार करें तो पायेंगे कि परमात्मा द्वारा बनाई गई कोई भी वस्तु द्वैत रहित है। सूरज सभी प्राणियों को एक समान धूप प्रदान करता है; अच्छे या बुरे व्यक्ति में भेद नहीं करता । इसी प्रकार पेड़ – पौधे भी व्यक्ति के अच्छे या बुरे स्वभाव को न देखते हुए सभी को छाया और फल देते हैं। बारिश सभी पर समान रूप से बरसती है। हवा सभी पर समान रूप से बहती है। मनुष्य इन से अद्वैत की भावना सीख सकता है।
परमात्मा द्वारा रचित पशु पक्षी हालांकि मनुष्य योनि की बनिस्बत निम्न माने गये हैं लेकिन उनसे भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। जैसे कौआ किसी को पसंद नहीं। उसकी आवाज़ कर्कश है; रंग काला है। लेकिन उसमें एक खासियत है कि जब भी उसको कहीं खाने का कुछ दिखाई देगा, वह शोर करके और साथियों को भी बुला लेगा। यह नहीं कि अकेला ही खाने लग जाये। यानि बांट कर खाने में विश्वास रखता है। चींटियों से आप बुरे समय के लिए अपने खाने का जुगाड़ बना कर रखना सीख सकते हैं। वे बरसात आदि खराब मौसम के लिए खाने का पहले से ही इंतज़ाम कर लेती हैं। महाभारत में दुर्योधन द्वारा पांडवों को लाक्षाग्रह में जला कर मारने से बचने के लिए विदुर ने पांडवों को चूहे की आदत का उदाहरण देकर समझाया था। चूहा जहाँ भी अपनी बिल बनाता है, शत्रु के आने की आशंका को ध्यन में रखते हुए, बिल में से निकलने का एक रास्ता पहले ही ज़रूर बना लेता है। कुत्ते से हम रहने की जगह को साफ रखने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे।
संतमत की एक मान्यता यह भी है कि यह दुनिया परमात्मा के हुक्म का एक खेल है। यह संसार न तो अपने आप बना है और न ही इसका काम आज अपनी मर्ज़ी से चल रहा है। सब कुछ परमात्मा के चाहे अनुसार सुनियोजित ढ़ंग से चल रहा है। आत्माओं को संसार में भेजना और फिर कर्मानुसार फल देना तथा उनको वापिस अपने पास बुलाने के लिए संतों को उनकी सहायता के लिए भेजना भी इस दुनिया का एक हिस्सा है। गुरुवाणी कहती है “हुकमी सहजे सृस्ट उपाई। कर कर वेखै अपनी वडिआई। “ दुनियावी वस्तुएँ तो जीव को अपने कर्मों के आधार पर मिलती हैं, लेकिन आत्मा केवल उस परमात्मा की दया-मेहर से ही इस संसार से मुक्त हो सकती है। गुरु नानक साहिब ने फरमाया है “करमी आवै कपड़ा, नदरी मोख दुआर”
कहते हैं कि जिस मनुष्य को परमात्मा अपने से मिलाना चाहता है, उस पर पहली कृपा वह स्वयं करता है जब वह उसका एक पूर्ण संत से मिलाप करवा देता है। दूसरी कृपा संत के माध्यम से आती है जो मनुष्य को नाम या शब्द का भेद देकर उसे परमात्मा की सच्ची भक्ति का रास्ता दिखाता है। तीसरी कृपा मनुष्य को खुद अपने ऊपर करनी होती है कि वह संत सतगुरु द्वारा बताई गई विधि से परमात्मा की भक्ति करके इस असार संसार से मुक्त होकर वापिस सचखण्ड पहुँच जाए यानि परमात्मा में समा सके।
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