Thursday, 8 May 2014

वह पकड़ता ही नहीं और पकड़ लिया तो बिना "कल्याण" किये छोड़ता ही नहीं

क्या कहें उस नन्दनन्दन, घनश्याम, मनमोहन सांवरे के प्रेम की कैसी-कैसी अदभुत-रहस्यमयी लीला-कथायें। शरद-पूर्णिमा को श्रीयमुना-पुलिन पर वंशीवादन के त्रैलोक्य-मोहिनी स्वरों से गोपियों को उनका चिर-प्रतीक्षित अभीप्सित वर देने के लिये स्वयं ही बुला रहा है और जब वे बावरी, बेसुध सी दौड़ी आती हैं तो उनसे कह देते हैं कि यहाँ क्यों आयी हो ? भले घरों की कुल-वधुओं को यह शोभा नहीं देता ! जाओ ! लौट जाओ ! जिन गोपियों का एक ही लक्ष्य है, जो उसके अतिरिक्त किसी को देखती ही नहीं। जो अपने सारे कार्य इसलिये करती हैं कि सांवरे को सुख मिले। जो श्रृंगार भी इसलिये करती हैं कि सांवरा प्रसन्न हो। जिनका डिंडिमघोष है कि - "बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ, जो साँवरो छाड़ि निहारति गोरो। धोखेहु दूसरो नाम कढ़े रसना, मुख काढ़ि हलाहल बौरों॥ [वे आँखें जल जायें, जो सांवरे सलोने ब्रजराजकुमार को छोड़कर दूसरे को देखती हैं। यदि धोखे से भी जिहवा से दूसरा नाम निकल जाये तो जिहवा को मुँह से निकालकर विष में डुबो दें] ऐसी अपनी अनन्य भक्ति की आचार्य गोपियों को वह "धर्म" सिखाते हैं। चिर-प्रतीक्षीत अभिलाषा पूर्ण करने से पहले सिद्ध गोपियों की अंतिम परिक्षा लेने से भी नहीं चूकते। और उधर दूसरी ओर, बालघातिनी पूतनाके नन्द-भवन में प्रवेश करते ही वह अदभुत मुस्कान बिखेरते हुए अपने नेत्र बंद कर लेते हैं। पूतना उन्हें पालने में से निकाल लेती है और कन्हैया मुस्करा रहे हैं, कोई प्रतिकार नहीं ! कोई शब्द नहीं ! मानो उसकी ही तो प्रतीक्षा थी ! शब्द कहीं लीला में व्यवधान न बन जायें सो मौन, प्रफ़ुल्लित ! मैया आयी है ! बड़ी दूर से, बड़ी अभिलाषा लिये ! नन्दलाल को स्तन-पान कराना है ! नन्दलाल तो प्रात: से ही सजे-धजे तैयार पालने में पड़े हैं ! कब आवेगी ! पूतना ने अपनी गोद में लेकर आँचल से ढकते हुए उनके श्रीमुख में अपना स्तन दे दिया है और वे ऐसे पी रहे हैं कि जैसे अमृत मिल गया हो ! उन्हें तो पूतना की इच्छा पूरी करनी है सो वे विष लगे स्तन से अपना श्रीमुख हटाते ही नहीं ! कुभाव से ही आयी ! आयी तो धात्री बनकर ! अभिलाषा कैसे पूरी न होती ! नन्दलाल तो ऐसे चिपके कि अब पूतना के छुड़ाने से भी उसका स्तन नहीं छोड़ते ! पूतना चित्कार कर रही है -"छोड़ दे ! छोड़ दे !" परन्तु वह भला कैसे छोड़ दे ! वह पकड़ता ही नहीं और पकड़ लिया तो बिना "कल्याण" किये छोड़ता ही नहीं ! पूतना की देह शांत हो गयी और वह फ़िर भी उसके वक्ष-स्थल पर मुस्कराते हुए खेल रहा है ! कौन है जो ऐसे नन्दनन्दन पर मुग्ध न हो जाये, स्वयं को न्यौछावर न कर दे ! ब्रजवासी उसके लिये यूँ ही बावरे नहीं हैं !

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