Thursday, 8 May 2014

छिलका श्रीहरि के मुख में दे रही हैं।

शबरी प्रेमा भक्ति का मूर्त-रुप है। प्रेम और समर्पण का एक अदभुत संगम। ब्राह्म-महूर्त में अंधेरे ही उठकर मार्ग को बुहारती है। मार्ग में कहीं कोई कंटक न रह जाये ताकि प्रभु के कोमल चरणों में व्यथा हो। सेवा भी करनी है और गोपन भी रखनी है। कदाचित कोई वनवासी ऋषि-मुनि न देख लें। उसकी तपस्या भिन्न है सो तपस्वियों के जागने से पहले ही उसे मार्ग बुहारना है। अपना कार्य करके अपनी कुटिया में जाकर अदृश्य हो जाना है। कैसा विश्वास ! प्रभु श्रीराम आयेंगे ! कब आयेंगे इससे कोई तात्पर्य नहीं पर वे आयेंगे ! भक्त, भगवान को खोजता है और आज प्रभु अपने भक्त को खोज रहे हैं। जिन्होंने वर्षों तक तपस्या की है; प्रभु उन्हें प्रणाम करते हुए अपनी शबरी का निवास पूछ रहे हैं ! मुनिजन उनसे विश्राम की कह रहे हैं पर प्रभु को विश्राम कहाँ ? विश्राम तो शबरी के पास ही करना है। आदर करने वाले तो बहुत होते हैं पर ऐसे दुर्लभ प्रेमी तो युगों में होते हैं ! अहा ! कैसा दुर्लभ क्षण ! भगवान के द्वारा भक्त की खोज !
युग बीता। द्वापर में प्रभु विदुर की कुटिया पर पधारे हैं। विदुरानी की सुधि-बुधि बिसर गयी है। प्रभु, विदुरानी के सामने आसन पर बैठे हैं और विदुरानी उन्हें केलों का प्रसाद पवा रही हैं। कैसा प्रसाद ! विदुरानी, केले का छिलका निकालकर, उसका गूदा फ़ेंक रही हैं और छिलका श्रीहरि के मुख में दे रही हैं। मेरे श्यामसुन्दर कितने प्रेम से, कृतज्ञता से बाल-भोग कर रहे हैं और उन्हें विदुरानी को देखकर स्मरण हो आती है शबरी ! वही प्रेम, वही समर्पण ! ऐसे भक्तों का ऋण क्या कभी चुकाया जा सकता है ! आज भक्त दे रहा है और श्रीहरि ले रहे हैं; चिर-ऋणी होने के लिये !
युग बीते और आज नामदेव महाराज, नदी के तट पर अपने ठाकुर के भोग के लिये रसोई बना रहे हैं। कैसी रसोई ? जो भी उपलब्ध है, वही अर्पण करना है। कुछ पत्थर जमा कर, लकड़ियाँ जलाकर चूल्हा बनाया है और थोड़ा सा आटा है, जिसे वह प्रेम से मथकर टिक्कड़ बना रहे हैं। हाथ से टिक्कड़ को आकार देते हुए मानो संकीर्तन ही चल रहा है। चूल्हे की लकड़ियों पर ही वह टिक्कड़ सेकने के लिये डाल दिया है। प्रेम-मग्न हैं।जिह्वा से सतत नाम-संकीर्तन हो रहा है। आज प्रभु को भी अदभुत लीला सूझी है। आज तो टिक्कड़ ही पाना है। नामदेव देंगे तो सही परन्तु अभी समय लगेगा। आज भोग के लिये प्रभु अधीर हो उठे हैं। अब और धैर्य नहीं है। तो क्या करें ? ऐसे तो नामदेव देंगे नहीं; रहा जाता नहीं सो धर लिया श्वान का रुप ! अधिक से अधिक भक्त दो-चार लकड़ियाँ ही तो जमा देगा। भक्त से पिटने का भी एक अलग ही आनन्द है। नामदेव अपने हाथ धो रहे हैं और इधर श्वान ने सूखे अधसिके टिक्कड़ को मुख में दबा लिया है और भाग रहे हैं। नामदेव महाराज की दृष्टि पड़ी और वे भी भाग रहे हैं; हाथ में घी का छोटा सा पात्र लिये ! प्रभु ! मेरे प्राणाधार ! क्या लीला कर रहे हो ? कृपा करो, थोड़ा सा घी तो लगा लेने दो !
इस सूखे टिक्कड़ में भी वही है जो शबरी के बेरों में था, विदुरानी के केलों के छिलकों में था !

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