Sunday, 4 May 2014

ये पिछले जन्मों से भक्ति करते हुए आ रहे हैं तभी उनके स्वभाव देव पुरुषों

**।। सुर व असुर स्वभाव के व्यक्तियों का वर्णन।।**

विशेष: ======
अध्याय 16 श्लोक नं. 1 से 3 तक उन पुण्यात्माओं के लक्षण वर्णित हैं जो पिछले जन्मों में वेदों अनुसार अर्थात् शास्त्र अनुकूल ब्रह्म साधना ओ3म् नाम से किया करते थे या पूर्ण परमात्मा की भक्ति तत्वदर्शी संत से प्राप्त करके करते थे जो पार नहीं हो सके,जब कभी मानव जन्म प्राप्त होता है तो वे निम्न लक्षणों वाले होते हैं।
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गीता अध्याय 16 के श्लोक 1 से 3 तक में भगवान ब्रह्म (काल) दैवी स्वभाव (उदार आत्माओं) का वर्णन करते हैं वे निर्भय, निर्वैरी, धार्मिक अनुष्ठान करने वाले मृदुभाषी, किसी की निन्दा नहीं करते, कामी (सैक्सी) क्रोधी, लोभी, लालची, अहंकारी नहीं होते। वे किसी से भी अपना सम्मान नहीं करवाते। वे लाज (शर्म) वाले होते हैं। ये पिछले जन्मों से भक्ति करते हुए आ रहे हैं तभी उनके स्वभाव देव पुरुषों अर्थात् संतों जैसे होते हैं।
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गीता अध्याय 16के श्लोक 4में कहा है कि जिन व्यक्तियों में पाखण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान है वे राक्षस वृति (स्वभाव) के हैं जो इन राक्षसी वृति को साथ लिए हुए उत्पन्न हुए हैं अर्थात् इन आत्माओं को पिछले जन्म में संतों का संग नहीं मिला। जो शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण करते रहे अर्थात् आन उपासना (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव की तथा भूत-पितर, देवी व भैरवों आदि की) करते रहे। जब कभी उन्हें मानव शरीर प्राप्त होता है तो भी साधना उसी पूर्व स्वभाववश ही करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप वे उच्च विचारों (मत) वाले नहीं हुए। 
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अध्याय 16 के श्लोक 5 में कहा है कि जो व्यक्ति संत स्वभाव वाले हैं वे भक्ति करके मुक्ति प्राप्ति के लिए जन्में हैं। यदि पूर्ण संत गुरु मिल गया तो मुक्ति है यदि पूरा गुरु (सतनाम व सारनाम देने वाला) नहीं मिला तो गलत साधना से जीवन व्यर्थ चला जाएगा , और जो राक्षसी स्वभाव के व्यक्ति हैं वे भक्ति नहीं करते, यदि भक्ति करते भी हैं तो शास्त्र विधि रहित व पाखण्ड युक्त लोकवेद अनुसार, साथ में विकार (तम्बाखु सेवन, मांस, मदिरा सेवन) भी करते रहते हैं, जो विकार नहीं करते तो भी स्वभाव वश आन-उपासना पर ही आरूढ़ रहते हैं। कोई समझाने की कोशिश करता है तो नाराज हो जाते हैं। वे अशुभ कर्मों के बन्धन में बंध जाते हैं अर्थात् चैरासी लाख जूनियों के बन्धन में जकड़े जाते हैं। अर्जुन आप (दैवी) साधु स्वभाव के साथ उत्पन्न हुए हो। इसलिए चिंता मत कर।

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