गीता अध्याय 16 के श्लोक 6में कहा है कि इस संसार में दो प्रकार के व्यक्तियों का समुह है। एक संत स्वभाव के दूसरे राक्षस स्वभाव के। साधु स्वभाव वालों के लक्षण तो ऊपर (1,2,3श्लोकों में) विस्तार से बताए हैं। अब राक्षसी स्वभाव वाले व्यक्तियों के लक्षण सुन। गीता अध्याय 16 के श्लोक 7 में कहा है कि राक्षस स्वभाव के व्यक्ति प्रवृति व निवृति को भी नहीं जानते। उनमें न तो शुद्धि है, न आचरण ठीक है,सच्चाई भी नहीं जानते हैं। गीता अध्याय 16 के श्लोक 8 में कहा है कि वे राक्षस स्वभाव वाले कहा करते हैं कि संसार निराधार है। असत्य तथा बिना भगवान के है अपने आप (नर-मादा के संयोग से) उत्पन्न है। केवल काम (सैक्स) ही इसका कारण है। गीता अध्याय 16 के श्लोक 9 राक्षस वृति के व्यक्ति मिथ्या ज्ञान का अनुसरण करके ये नष्ट आत्मा (गिरी हुई आत्मा) मंद बुद्धि हैं। वे अपकार (बुरा) करने वाले क्रूरकर्मी (भयंकर कर्म करने वाले) जगत के नाश के लिए ही उत्पन्न होते हैं।
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गीता अध्याय 16 का श्लोक 10 ::
राक्षस वृति के व्यक्ति पाखण्ड, मान, मद्य युक्त, मुश्किल से पूर्ण होने वाली इच्छाओं का आश्रय लेकर मोह (अज्ञान) वश मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण किए हुए घूमा करते हैं। गीता अध्याय 16के श्लोक 11में कहा है कि उन राक्षस स्वभाव के व्यक्तियों का मरने के बाद भी यह स्वभाव समाप्त नहीं होता। असंख्य चिंताओं के आधारित, विषय भोगों में तत्पर रहने वाले इसी को सुख मान कर निश्चय करने वाले होते हैं।
गीता अध्याय 16 के श्लोक 12में कहा है कि वे राक्षस स्वभाव वाले चाहे वे संत कहलाते हैं, चाहे उनके उपासक या स्वयं ही शास्त्र विधि रहित साधना करने वाले व्यक्ति आशाओं की सैकड़ों फंसियो से बन्धे हुए काम-क्रोध के आश्रित हो कर विषय भोगों के लिए अन्याय पूर्वक धन इक्कट्ठा करने की कोशिश करते हैं तथा भक्ति भी शास्त्र विधि रहित ही करते हैं।
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गीता अध्याय 16 के श्लोक 13 का भाव है कि राक्षस स्वभाव वाले कहा करते हैं कि मैंने आज ज्यादा धन प्राप्त किया है। मैं ये कर दूंगा, वह प्राप्त कर लूंगा, मेरे पास इतना धन है, फिर भविष्य में इतना और हो जाएगा। अध्याय 16 के श्लोक 14 का अर्थ है कि वे राक्षस वृति के व्यक्ति कहा करते हैं कि वे शत्रु मेरे द्वारा मार दिए गए हैं। उन दूसरे शत्रुओ को भी मैं मार डालूंगा। मैं भगवान हूँ- ऐसे करने वाला हूँ, मैं सिद्ध, बलवान व सुखी हूँ।
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गीता अध्याय 16 का श्लोक 10 ::
राक्षस वृति के व्यक्ति पाखण्ड, मान, मद्य युक्त, मुश्किल से पूर्ण होने वाली इच्छाओं का आश्रय लेकर मोह (अज्ञान) वश मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण किए हुए घूमा करते हैं। गीता अध्याय 16के श्लोक 11में कहा है कि उन राक्षस स्वभाव के व्यक्तियों का मरने के बाद भी यह स्वभाव समाप्त नहीं होता। असंख्य चिंताओं के आधारित, विषय भोगों में तत्पर रहने वाले इसी को सुख मान कर निश्चय करने वाले होते हैं।
गीता अध्याय 16 के श्लोक 12में कहा है कि वे राक्षस स्वभाव वाले चाहे वे संत कहलाते हैं, चाहे उनके उपासक या स्वयं ही शास्त्र विधि रहित साधना करने वाले व्यक्ति आशाओं की सैकड़ों फंसियो से बन्धे हुए काम-क्रोध के आश्रित हो कर विषय भोगों के लिए अन्याय पूर्वक धन इक्कट्ठा करने की कोशिश करते हैं तथा भक्ति भी शास्त्र विधि रहित ही करते हैं।
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गीता अध्याय 16 के श्लोक 13 का भाव है कि राक्षस स्वभाव वाले कहा करते हैं कि मैंने आज ज्यादा धन प्राप्त किया है। मैं ये कर दूंगा, वह प्राप्त कर लूंगा, मेरे पास इतना धन है, फिर भविष्य में इतना और हो जाएगा। अध्याय 16 के श्लोक 14 का अर्थ है कि वे राक्षस वृति के व्यक्ति कहा करते हैं कि वे शत्रु मेरे द्वारा मार दिए गए हैं। उन दूसरे शत्रुओ को भी मैं मार डालूंगा। मैं भगवान हूँ- ऐसे करने वाला हूँ, मैं सिद्ध, बलवान व सुखी हूँ।
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