Sunday, 4 May 2014

क्षणिक सुख स्वर्गादि में भोग कर अति नीच गति को प्राप्त होते हैं

वे राक्षस स्वभाव के कहा करते हैं कि मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? यज्ञ करूंगा, दान दूंगा, मौज मनाऊँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित अनेक प्रकार से चित वाले मोह जाल में फंसे विषयों में विशेष आसक्त (राक्षस लोग) घोर गंदे नरक में गिरते हैं।
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गीता अध्याय 16 श्लोक 17 से 20 तक का भावार्थ है कि जो शास्त्र विधि रहित मनमानी पूजा {तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिवजी तथा अन्य निम्न देवों की पूजा करना, पितर पूजना (श्राद्ध निकालना) भूत पूजना (पिण्ड भरवाना, तेरहवीं-सतरहवीं करना), फूल (अस्थियाँ) उठा कर क्रिया कर्म करवाने ले जाना आदि शास्त्र विधि रहित पूजा है, प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 18 तथा 20 से 23 तथा गीता अध्याय 9श्लोक 22से 25तक में है} करने वाले पापियों, घमण्डियों, एक दूसरे की निंदा करने वालों को जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वालों क्रुरकर्मी नीच व्यक्तियों को मैं (ब्रह्म) बार-बार असुर योनियों में डालता हूँ। वे मूर्ख मुझे न प्राप्त होकर अर्थात् मेरे महास्वर्ग मे (जो ब्रह्मलोक में बना है) न जाकर क्षणिक सुख स्वर्गादि में भोग कर अति नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरक में गिरते हैं। फिर इसी से सम्बन्धित गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में है कि जो व्यक्ति शास्त्र विधि को त्याग कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण (पूजा) करते हैं वह न तो सुख प्राप्त करता है, न कोई कार्य सिद्ध होता है तथा न ही परमगति को प्राप्त होता है। इसलिए अर्जुन जो भक्ति करने तथा न करने योग्य पूजा विधि है, उनके लिए तो शास्त्रा ही प्रमाण हैं। अन्य किसी व्यक्ति विशेष या संत,ऋषि विशेष के द्वारा दिए भक्ति मार्ग को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जो शास्त्र विरुद्ध हो।

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