विगत दिनों एक ब्रज-चौरासी-कोस की यात्रा के मध्य राजस्थान के एक संभ्रात भक्त, जो एक बड़े कालेज के सेवानिवृत प्रिन्सीपल थे; सत्संग-वार्ता के मध्य उन्होंने अपने गुरुजी के बारे में बताया कि कुछ वर्षों पहले उन्होंने करीब १५० वर्ष की अवस्था में समाधि ली और अब ऐसे त्रिकालदर्शी सिद्धात्मा महात्मा दृष्टिगोचर नहीं होते। वे भविष्य की बातों को देख लेते थे और विशेष कृपा-स्वरुप अनेकों बार उन्हें पूर्व-संकेत भी देते रहते थे। यह कहते समय उनके नेत्र, वाणी और ह्रदय, गुरुदेव के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता से भरे हुए थे। ऐसे सिद्धात्मा, पुण्यात्मा, महात्मा के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हुए दास केवल यही कह सका कि " जिसने अलौकिक को देख लिया, उसके लिये लौकिक को देखना कौन से आश्चर्य की बात है ?"
यही सत्य भी है, अनेकों संतो/भक्तों के पास आज भी श्रीहरि की कृपा से यह क्षमता है। जिसने निर्देशक को जान लिया, उसका ग्रीन-रुम देख लिया, वह क्या "नाटक" की कहानी न समझेगा ? परन्तु मर्यादा यही है कि मौन ही रहा जाये, अनन्त-काल तक चलने वाले "नाटक" को स्वाभाविक रुप से ही चलने दिया जाये, संकेत भी तभी दिये जायें, जब श्रीहरि का संकेत हो। जो भी निर्देशक के साथ पर्दे के पीछे खड़ा है, उसे तो नाटक में सहयोग ही देना है, सब-कुछ जानते हुए भी ! यही आत्म-समर्पण है, शरणागति है, भक्ति है !
यही सत्य भी है, अनेकों संतो/भक्तों के पास आज भी श्रीहरि की कृपा से यह क्षमता है। जिसने निर्देशक को जान लिया, उसका ग्रीन-रुम देख लिया, वह क्या "नाटक" की कहानी न समझेगा ? परन्तु मर्यादा यही है कि मौन ही रहा जाये, अनन्त-काल तक चलने वाले "नाटक" को स्वाभाविक रुप से ही चलने दिया जाये, संकेत भी तभी दिये जायें, जब श्रीहरि का संकेत हो। जो भी निर्देशक के साथ पर्दे के पीछे खड़ा है, उसे तो नाटक में सहयोग ही देना है, सब-कुछ जानते हुए भी ! यही आत्म-समर्पण है, शरणागति है, भक्ति है !
No comments:
Post a Comment