Thursday, 8 May 2014

परन्तु किसी के भी जानने का अन्त नहीं हुआ।

उस मनमोहन साँवरे ने अपनी नित्य-लीला को प्रपन्च में प्रकट किया। नित्य के प्राकटय का नाम ही लीला है। लीला हुयी और अब तक हो रही है। प्रश्न यह है कि लीला का साक्षी कौन है ? इस लीला को किसने जाना ? इस प्रश्न के उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि इस लीला को सम्पूर्ण और सम्यक-रुप से न कोई जान सका है और न जान सकेगा। जिसकी जितनी शक्ति या अधिकार है वह उतना ही जान सका है या जानेगा। लीलामय अनन्त हैं और लीला भी अनन्त है। अनन्त का जब अन्त नहीं है तब उस अनन्त को जानने का भी अन्त कैसे हो सकता है ? अनन्त भी यदि अपनी लीला को जानना चाहे तो वैसा नहीं कर सकता। यदि कहीं अनन्त का अन्त है तो इसी बात में है कि वह अपने को पूरी तरह नहीं जान सकता। हमारी इस भारतभूमि के लीलावादी भक्तों ने इसे देखा है। भक्त निकले तो थे अनन्त के अन्त का अन्वेषण करने पर उन्होंने अन्त भी देखा तो कहाँ देखा ? नवद्वीप में। क्या देखा ? यही देखा कि अनन्त अपने प्रेम में आप ही पागल है, अपने प्रति आप ही ऋणी है, अपने ही नाम पर आप ही मतवाला हो रहा है और अपने रुप पर आप ही अपनी सुध-बुध भूल रहा है। इसी का नाम अनन्त है !
जिन लोगों ने अपनी-अपनी शक्ति और अधिकार के अनुसार श्रीकृष्ण और उनकी लीला को यत्किंचित जानकर प्रेम प्राप्त किया, उनका भी इसे जानने और प्राप्त करने का शेष हो गया हो, ऐसा नहीं है। उनमें से बहुतों के जानने और प्राप्त करने का प्रारम्भ हुआ, बहुतों ने पहले कुछ जाना और प्राप्त किया। परन्तु किसी के भी जानने का अन्त नहीं हुआ। वे अनन्त काल तक जानते और पाते रहेंगे। हर समय वे नये ढ़ग से इस चिर-नवीन श्रीकृष्ण को और उनकी नित्य-नवीन लीलाओं के रहस्यों को जानते और पाते रहेंगे। न लीला का अन्त है और न ही जानने, पाने एवं बनने का अन्त है। "पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते" इसी का नाम अनन्त जीवन और नित्य-लीला है।
भगवत्प्राप्ति या भगवद्दर्शन जीवन का अन्त नहीं है, यह तो सत्य जीवन का प्रारम्भमात्र है। भगवत्प्राप्ति या भगवद्दर्शन लय नहीं है, मृत्यु नहीं है, वह है नव-जन्म-लाभ। ससीम में मरकर असीम में जन्म ग्रहण करना। नित्य का दर्शन, नित्य का बोध और उस दर्शन एवं बोध के द्वारा संचालित होकर नित्य की सेवा में आत्मसमर्पण, यही जीवन सत्य जीवन है। इसी का नाम नित्य-लीला में प्रवेश है। 

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