Thursday, 8 May 2014

बचाओ तो आपका हूँ डुबो दो तो आपका हूँ।

हे मेरे अपने और एकमात्र मेरे अपने श्रीराघव श्रीरघुपति श्रीरामजी आपका विधिविधान साँसारिक क्रम से भिन्न अर्थात विपरीत है सँसार पहले जानने का विषय है फिर मानने का।परन्तु आपके यहाँ खेल विपरीत है अर्थात हे रामजी आप पहले माने जाते हो तो जाने जाते हो।इस न्याय से यह सँसार तो पहले नेत्रोँ से देखा जाता फिर बुद्वि द्वारा जाना जाता है या मन मेँ बसाया जाता है।लेकिन आपतो पहले मन मेँ हृदय मेँ विराजते हो फिर यदि आपकी इच्छा हो तो नेत्रोँ द्वारा आपके दर्शन होते हैँ।हे राघव मुझे नेत्रोँ से आपके दर्शनोँ की प्यास है जो पूरी नहीं हो रही बुझ नहीं रही तो क्या इसका अर्थ यह तो नहीँ. कि मै आपको अपने हृदय मेँ ही यथार्थ रूप मेँ नहीं बसा पाया।कहीँ मेरा आपके. प्रति प्रेम मेरी आपके प्रति भक्ति मेरा सँसार के प्रति और मेरे मन का मेरे प्रति ढोँग पाखण्ड तो नहीँ।जिसे मै अपनी निष्काम भक्ति मान बैठा हूँ कहीँ यह काम मिश्रित प्रलाप मात्र तो नहीँ।मुझे ज्ञान नहीं है प्रभु कि कोइ ऎसी कामना मन मेँ छिपी बैठी हो और मेरी निष्कामता एक पाखण्ड मात्र हो। लेकिन हे नाथ इस विचार के आते ही मेरा दुखी होना डर से सिहर जाना और इस जन्म को भी व्यर्थ खो देने की डाह इस बात का तो प्रमाण है ही कि मेरा भाव मेरी आपको पाने की भावना तो सत्य है।हे रामजी आप ही तो समस्त लोकपरलोक मेँ घटनेवाली हर घटना के सूत्रधार व कर्ता धर्ता हो तो नाथ सत्य या झूठ आप जानो लेकिन आपकी शरण मेँ हूँ मै। आपको अपना स्वामी और स्वयँ को आपका दास इस नाते को निभाने को प्रयत्नशील हूँ।सत्य या बनावटी मै नहीं जानता मेरे नेत्र अश्रु तो बहा रहेहैँ आपकी स्मृति मेँ।मन से अथवा बाहरी तल पर "सियाराम मय सब जग जानि करऊँ प्रणाम जोरि जुग पानि। प्रयत्न भी करता ही हूँ।हे दीन दयाल जब भी आत्मनिरीक्षण करता हूँ तब तब कलेजा मुख को आता है और हे एक मात्र निर्दोष रामजी मुझे मेरे दोष धिक्कारते है। दिन दिन दोषोँ से दूर तो क्या उल्टा अपने आपको इनमेँ फँसा पाता हूँ।रामजी आपकी आपजानो और मेरी भी आप ही जानो।मै सर्वथा निर्बोध जीव अज्ञ हूँ और त्राहि माम हे रामजी त्राहि माम कहता आपकी चरणशरण हूँ।बचाओ तो आपका हूँ डुबो दो तो आपका हूँ।क्योँकि अब तो ठान लिया है कि
"जनम जनम लगी रगर हमारी। बरऊँ राम न त रहऊँ कुँवारी।
इसलिए हे रामजी 
"जहाँ ले चलोगे वही मै चलूँगा।जहाँ नाथ रख दोगे वही मै रहूँगा"
कृपा करो हे दासवत्सल अपने दास पर कृपा करो।

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