Thursday, 8 May 2014

काल, समय दे न दे

जब तक इस लौकिक संसार में सुख और आनन्द प्रतीत हो रहा है तभी तक हम श्रीहरि से दूर हैं। यह भी एक मानदन्ड है। अपनी देह, गृह, व्यापार और कुटुम्ब-संबधी और नाना प्रकार के सांसारिक भोगों में रमते हुए श्रीहरि की कृपा को पूर्णरुप से अनुभव नहीं किया जा सकता। जब तक "ये मेरा/मेरे हैं इसलिये प्रिय हैं" यह भाव छूटकर "सब प्रभु के हैं और इसलिये मुझे प्रिय हैं और इन रुपों में भी मैं ही हूँ"; की चित्त में स्थापना न होगी तब तक श्रीहरि से हम अपना जो लगाव दिखाते हैं, वह दिखावा ही है; यह अलग तथ्य है कि वे इस पर भी अपनी उदारता में न्यूनता नहीं करते। हमारी इन्द्रियाँ जब तक बहिर्मुखी बनी रहेंगी तब तक वास्तविक रस नहीं मिलेगा। नेत्र खोलने पर संसार ही दिखेगा; जब तक श्रीहरि की अहैतुकी कृपा न हो। लीला-चिंतन के लिये चर्म-चक्षुओं को बंदकर अंतर्चक्षु खोलने होंगे। मोती की खोज है तो सागर की अनन्त गहराईयों में उतरना ही होगा, कल्पनातीत एक दिव्य-लोक ! दिव्य संसार ! जिसने देखा, वह ही जाने ! वह बतावे भी तो हम कब मानेंगे ? तट पर खड़े रहकर वह आनन्द न ले सकोगे ! कोई महूर्त नहीं देखना, इसी क्षण छलांग न लगायी तो पता नहीं फ़िर कभी लगे न लगे ! काल, समय दे न दे ! शुभस्य शीघ्रं !

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