Thursday, 8 May 2014

मैं अपना मन आपको अर्पण करता हूँ

सुप्रसिद्ध मुगल सम्राट अकबर के फ़ुफ़ेरे भाई और मन्त्री नबाब अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। भगवान की सेवा में उपस्थित होकर वे क्या कहते है -
"जब रत्नाकर [समुद्र] आपका घर है और लक्ष्मीजी आपकी गृहणी हैं, तब हे जगदीश्वर, आप ही बतलाइये कि आपको देनेयोग्य क्या वस्तु बच रही ? हाँ, एक बात है, कि श्रीराधिकाजी ने आपका मन चुरा लिया है, वही आपके पास नहीं है, इसलिये मैं अपना मन आपको अर्पण करता हूँ, कृपया ग्रहण कीजिये !!"
और माखन-चोर की कृपा प्राप्त कर लेने पर रहीम को संसार का कोई डर नहीं रहता और वे डिंडिमघोष करते हैं कि -
रहिमन को कोऊ का करे, ज्वारी, चोर, लबार।
जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥

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