सुप्रसिद्ध मुगल सम्राट अकबर के फ़ुफ़ेरे भाई और मन्त्री नबाब अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। भगवान की सेवा में उपस्थित होकर वे क्या कहते है -
"जब रत्नाकर [समुद्र] आपका घर है और लक्ष्मीजी आपकी गृहणी हैं, तब हे जगदीश्वर, आप ही बतलाइये कि आपको देनेयोग्य क्या वस्तु बच रही ? हाँ, एक बात है, कि श्रीराधिकाजी ने आपका मन चुरा लिया है, वही आपके पास नहीं है, इसलिये मैं अपना मन आपको अर्पण करता हूँ, कृपया ग्रहण कीजिये !!"
और माखन-चोर की कृपा प्राप्त कर लेने पर रहीम को संसार का कोई डर नहीं रहता और वे डिंडिमघोष करते हैं कि -
रहिमन को कोऊ का करे, ज्वारी, चोर, लबार।
जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥
"जब रत्नाकर [समुद्र] आपका घर है और लक्ष्मीजी आपकी गृहणी हैं, तब हे जगदीश्वर, आप ही बतलाइये कि आपको देनेयोग्य क्या वस्तु बच रही ? हाँ, एक बात है, कि श्रीराधिकाजी ने आपका मन चुरा लिया है, वही आपके पास नहीं है, इसलिये मैं अपना मन आपको अर्पण करता हूँ, कृपया ग्रहण कीजिये !!"
और माखन-चोर की कृपा प्राप्त कर लेने पर रहीम को संसार का कोई डर नहीं रहता और वे डिंडिमघोष करते हैं कि -
रहिमन को कोऊ का करे, ज्वारी, चोर, लबार।
जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥
No comments:
Post a Comment